
कश्मीर में उग्रवाद के सबसे मुश्किल दौर की एक पुरानी हत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में है। करीब 36 साल पहले एक कश्मीरी हिंदू लेखक और उनके बेटे को कुछ हथियारबंद लोग घर से यह कहकर अपने साथ ले गए थे कि उन्हें एक कमांडर से मिलना है। परिवार को उम्मीद थी कि दोनों जल्द लौट आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कुछ समय बाद पिता-पुत्र के शव पेड़ से लटके मिले।
उस समय मामला दर्ज हुआ, लेकिन जांच आगे नहीं बढ़ सकी। अब वर्षों बाद इस मामले की फाइल दोबारा खोली गई है और जांच एजेंसी पुराने रिकॉर्ड खंगालने के साथ इस हत्याकांड से जुड़े लोगों और घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ने में जुटी है।
कौन थे कश्मीरी हिंदू लेखक ‘प्रेमी’?
हत्या का शिकार हुए पिता कश्मीर में लेखक, कवि और सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर जाने जाते थे। उन्होंने लंबे समय तक शिक्षा विभाग में शिक्षक के रूप में काम किया और बाद में सेवानिवृत्त हो गए।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, उनके आसपास रहने वाले हिंदू और मुस्लिम परिवारों के साथ उनके अच्छे संबंध थे। वह सामाजिक सौहार्द और आपसी भाईचारे के लिए जाने जाते थे।
जब घाटी से लोग जाने लगे, तब भी नहीं छोड़ा घर
1990 के आसपास कश्मीर में उग्रवाद अपने चरम पर था। डर और असुरक्षा के कारण बड़ी संख्या में कश्मीरी हिंदू परिवार घाटी छोड़कर दूसरे इलाकों में जाने लगे थे।
ऐसे माहौल में भी पिता-पुत्र ने अपना घर छोड़ने का फैसला नहीं किया। बताया जाता है कि परिवार लंबे समय तक वहीं बना रहा और उन्हें भरोसा था कि स्थानीय लोगों के साथ उनके रिश्ते उन्हें सुरक्षित रखेंगे।
लेकिन कुछ ही समय बाद हालात ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
बंदूकधारी घर पहुंचे और साथ चलने को कहा
एक दिन कुछ हथियारबंद लोग उनके घर पहुंचे। उन्होंने परिवार को बताया कि एक कमांडर उनसे मिलना चाहता है। इसी भरोसे में पिता और उनका बेटा उन लोगों के साथ घर से निकल गए।
परिवार को उम्मीद थी कि मुलाकात के बाद दोनों वापस लौट आएंगे। मगर दोनों फिर कभी घर नहीं पहुंचे।
काफी तलाश के बाद उनके शव मिलने की खबर सामने आई। दोनों की गोली मारकर हत्या किए जाने के बाद शव पेड़ से लटकाए जाने की बात सामने आई थी। इस घटना ने पूरे इलाके को झकझोर दिया था।
थाने में दर्ज हुआ था मामला, लेकिन जांच अटक गई
घटना के बाद स्थानीय थाने में हत्या का मामला दर्ज किया गया था। उस दौर में घाटी में लगातार हिंसा और आतंकवाद के कारण कई गंभीर आपराधिक मामलों की जांच प्रभावित हुई।
समय बीतता गया और यह मामला भी लंबित मामलों की सूची में चला गया। परिवार को न्याय मिलने का इंतजार रहा, लेकिन हत्याकांड की पूरी सच्चाई सामने नहीं आ सकी।
अब 36 साल बाद फिर खंगाली जा रही पुरानी फाइल
अब प्रशासन के निर्देश के बाद आतंकवाद के दौर में लंबित रह गए पुराने मामलों की दोबारा जांच की जा रही है। इसी कड़ी में पिता-पुत्र की हत्या का मामला भी फिर जांच के दायरे में आया है।
जांच एजेंसी पुराने दस्तावेज, पुलिस रिकॉर्ड और उस समय सामने आई जानकारियों को दोबारा खंगाल रही है। कोशिश यह पता लगाने की है कि हत्या के पीछे कौन लोग थे, इसकी साजिश कैसे रची गई और इतने वर्षों तक जांच किस वजह से आगे नहीं बढ़ सकी।
सिर्फ एक परिवार का नहीं, एक दौर का दर्द
यह मामला सिर्फ एक पिता और बेटे की हत्या तक सीमित नहीं है। यह उस दौर की तस्वीर भी सामने लाता है, जब कश्मीर में आतंकवाद के कारण हजारों परिवारों की जिंदगी बदल गई थी।
कई घटनाओं की जांच वर्षों तक लंबित रही और पीड़ित परिवार जवाब का इंतजार करते रहे। अब पुराने मामलों की फाइलें दोबारा खुलने से उम्मीद जगी है कि दशकों पुराने इन हत्याकांडों में भी सच्चाई सामने आ सकती है और जिम्मेदार लोगों तक जांच पहुंच सकती है।



