आमतौर पर बच्चे के जन्म के बाद हमारे देश में लोग उसके जन्म कुंडली बनाने में अधिक यकीन रखते हैं. आज के युग में डॉक्टरों की मानें तो जन्मकुंडली से अधिक जरुरी हेल्थ कुंडली है. मशहूर कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. नरेश त्रेहन ने टीवी9 भारतवर्ष से खास बातचीत में बताया कि बच्चे के जन्म लेने के साथ ही उसकी हेल्थ कुंडली बनाएं, जिससे कि उसके स्वास्थ्य को समझने का बेहतर अवसर मिल सके. डॉ. त्रेहन ने कहा कि किसी भी बच्चे के परिवार की स्वास्थ्य की स्थिति क्या है, यह पता होना चाहिए.

उन्होंने कहा कि अगर किसी बच्चे के अग्रज डायबटीज, कैंसर या दिल की बीमारी के शिकार रहे हों तो उस बच्चे के लालन पालन में विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है. यह सबकुछ हेल्थ कुंडली से ही संभव हो पाएगा. उन्होंने कहा कि कई बार ऐसा होता है कि बच्चा किसी परेशानी को लेकर आया और उनके परिवार के लोगों को पता ही नहीं होता कि उनके परिवार की स्वास्थ्य संबंधी पृष्ठभूमि क्या है. इसका नुकसान बच्चे को होता है.
मौत के मुंह तक ले जा रही दिल की बीमारी
भारत में कार्डियोवैस्कुलर डिजीज मृत्यु का एक प्रमुख कारण बनकर उभरी हैं. भारत के रजिस्ट्रार जनरल की कॉज ऑफ डेथ 202123′ रिपोर्ट के मुताबिक, देश में होने वाली कुल मौतों में करीब 31% मौतों के लिए ये बीमारियां जिम्मेदार हैं. डॉक्टरों ने यह भी चिंता जताई है कि अब इसका असर कम उम्र के और कामकाजी लोगों में भी बढ़ रहा है. लंबे समय तक बैठे रहने वाली जीवनशैली, असंतुलित खानपान, तंबाकू का सेवन और तनाव को नियंत्रित न कर पाना जैसे कारण 30 और 40 की उम्र के लोगों में भी हृदय संबंधी समस्याओं के बढ़ते मामलों में योगदान दे रहे हैं.
तेजी से बदल रहा इलाज की तकनीक
डॉ. नरेश त्रेहन ने कहा कि रोकथाम, उपचार, सर्जरी और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में हो रही प्रगति किस तरह हृदय संबंधी बीमारियों के इलाज और प्रबंधन के तरीकों को बदल रही है. उन्होंने कहा कि आज हृदय रोगों की चिकित्सा एक महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रही है. जांच और इलाज के क्षेत्र में ऐसी प्रगति हुई है, जिससे उन बीमारियों का इलाज भी संभव हुआ है, जिन्हें कभी बेहद जटिल माना जाता था. इसके बावजूद, कार्डियोवैस्कुलर डिजीज का बोझ अभी भी काफी अधिक है. चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि चिकित्सा के क्षेत्र में हो रही प्रगति का लाभ हर मरीज तक सही समय पर पहुंच सके.
काफी कम जोखिम रह गया है ऑपरेशन में
डॉ. त्रेहन ने कहा कि इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी में अब कम चीरे और कम जोखिम वाले इलाज के विकल्पों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है. साथ ही मरीज की व्यक्तिगत स्थिति के आधार पर इलाज करने की भूमिका भी बढ़ रही है. इसमें हृदय संबंधी गंभीर घटना के बाद एंटीप्लेटलेट दवाओं का सही चुनाव, कमजोर पंपिंग क्षमता वाले हार्ट फेल्योर का इलाज और रोबोटिक या पारंपरिक मिनिमली इनवेसिव हार्ट सर्जरी में से सही विकल्प चुनना शामिल है.


