
Heramba Sankashti Chaturthi Vrat Katha 2026: हिंदू धर्म में चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित मानी जाती है। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को हेरंब संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन भगवान गणेश के हेरंब स्वरूप की पूजा करने की परंपरा है।
पंचांग के अनुसार, इस वर्ष हेरंब संकष्टी चतुर्थी का व्रत 31 अगस्त 2026, सोमवार को रखा जा रहा है। कई स्थानों पर इसे बहुला चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हेरंब गणेश भगवान का पंचमुखी स्वरूप माना जाता है। इस स्वरूप में भगवान गणेश को पांच मुख और दस भुजाओं वाला बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा के साथ गणेश जी की पूजा करने और व्रत कथा पढ़ने या सुनने से जीवन के संकटों से मुक्ति मिलती है।
राजा नल और रानी दमयंती की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में राजा नल और उनकी पत्नी रानी दमयंती का जीवन सुख और समृद्धि से भरा हुआ था। दोनों एक-दूसरे से बेहद प्रेम करते थे और उनका राज्य भी खुशहाल था।
लेकिन समय ने अचानक करवट ली। एक श्राप और विपरीत परिस्थितियों के कारण राजा नल को अपना राज-पाट, धन-संपत्ति और वैभव गंवाना पड़ा। उनका राज्य संकट में घिर गया और धीरे-धीरे सारी संपत्ति उनके हाथ से निकलती चली गई।
राज्य में लूटपाट की स्थिति बन गई। बताया जाता है कि डाकुओं ने राजकोष को लूट लिया और बचे हुए भंडार का बड़ा हिस्सा आग में नष्ट हो गया। राजा के कुछ विश्वासपात्र माने जाने वाले मंत्री भी उनका साथ छोड़कर चले गए।
इन परिस्थितियों में राजा नल को अपना राज्य छोड़कर वन की ओर जाना पड़ा।
अलग हो गए नल और दमयंती
मुसीबतें यहीं खत्म नहीं हुईं। कठिन परिस्थितियों के बीच राजा नल और रानी दमयंती को एक-दूसरे से अलग होना पड़ा।
राजा नल के हाथी और घोड़े भी उनसे छिन गए थे। जीवन चलाने के लिए उन्हें एक दूसरे नगर में घोड़ों की देखभाल करने जैसा काम करना पड़ा। दूसरी ओर रानी दमयंती को भी बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताना पड़ा।
परिवार के दूसरे सदस्य भी अलग-अलग स्थानों पर रहने को मजबूर हो गए। कभी राजसी जीवन जीने वाला परिवार अब अभाव और संघर्ष के दौर से गुजर रहा था।
वन में ऋषि से हुई दमयंती की मुलाकात
एक दिन रानी दमयंती वन में भटकते हुए महर्षि शरभंग के आश्रम तक पहुंचीं। दुख से परेशान दमयंती ने महर्षि को प्रणाम किया और उनसे अपने कष्टों का समाधान पूछा।
रानी ने महर्षि से कहा कि उनके जीवन में लगातार परेशानियां आ रही हैं। वह अपने पति से अलग हो चुकी हैं और उनका परिवार भी बिखर गया है। उन्होंने ऋषि से पूछा कि आखिर वह ऐसा कौन-सा उपाय करें जिससे उनके दुख समाप्त हों और उन्हें अपने पति का साथ दोबारा मिल सके।
महर्षि ने बताया हेरंब गणेश का व्रत
महर्षि शरभंग ने रानी दमयंती को धैर्य रखने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के हेरंब स्वरूप की पूजा और व्रत करने से संकटों से मुक्ति मिल सकती है।
ऋषि ने दमयंती से कहा कि वह पूरे नियम, श्रद्धा और संयम के साथ हेरंब गजानन का व्रत करें और भगवान गणेश की आराधना करें।
दमयंती ने ऋषि की बात को स्वीकार किया और पूरी श्रद्धा के साथ व्रत का पालन शुरू कर दिया।
सात महीने में बदल गई जिंदगी
कथा के अनुसार, रानी दमयंती की भक्ति से भगवान गणेश प्रसन्न हुए। व्रत और पूजा के प्रभाव से उनके जीवन में परिस्थितियां बदलने लगीं।
बताया जाता है कि करीब सात महीने के भीतर रानी दमयंती का अपने पति राजा नल और पुत्र से दोबारा मिलन हो गया। इसके साथ ही राजा नल को उनका खोया हुआ राज्य और पुराना वैभव भी वापस प्राप्त हुआ।
इस तरह लंबे समय से चले आ रहे दुख और संकट समाप्त हुए और परिवार का जीवन फिर से खुशियों से भर गया।
हेरंब संकष्टी चतुर्थी का क्या महत्व है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है। इसलिए संकष्टी चतुर्थी पर उनकी पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है।
मान्यता है कि इस दिन व्रत रखकर भगवान गणेश की पूजा करने और हेरंब संकष्टी चतुर्थी की कथा पढ़ने या सुनने से व्यक्ति को मानसिक मजबूती मिलती है। भक्त भगवान गणेश से अपने जीवन की परेशानियां दूर करने और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
कथा का संदेश भी यही माना जाता है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में धैर्य और विश्वास नहीं छोड़ना चाहिए। श्रद्धा और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने से व्यक्ति मुश्किल समय का सामना करने की शक्ति हासिल कर सकता है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई धार्मिक मान्यताएं और कथा विभिन्न परंपराओं एवं मान्यताओं पर आधारित हैं। इनकी ऐतिहासिक या वैज्ञानिक पुष्टि का दावा नहीं किया जाता। पूजा-व्रत से जुड़े नियमों और तिथियों के लिए स्थानीय पंचांग एवं संबंधित विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।



