
रमेश चन्द्र, लखनऊ/बरेलीः महाभारत की कथाएं आज भी अपने भीतर इतिहास, आस्था और जीवनदर्शन के अनगिनत रहस्य समेटे हुए हैं। ऐसी ही एक कथा बरेली के आंवला क्षेत्र की लीलौर झील से जुड़ी है, जिसे पांडवों के अज्ञातवास और यक्ष के प्रसिद्ध प्रश्नों से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इसी जलाशय के किनारे यक्ष ने युधिष्ठिर की बुद्धि, धर्म और विवेक की परीक्षा ली थी। हजारों वर्ष पुरानी इस कथा की स्मृतियां आज भी झील के शांत जल में जैसे जीवंत नजर आती हैं। कभी उपेक्षा का शिकार रही लीलौर झील अब पर्यटन स्थल के रूप में संवर रही है। प्रकृति, पौराणिक मान्यताओं और स्थानीय लोकविश्वास का यह संगम इसे खास बनाता है।
महाभारत काल का वह समय जब पांडव अज्ञातवास के दौरान जंगल में भटक रहे थे। तेज धूप व लगातर पैदल चलने के कारण वे बेहद थक गए थे। प्यास से उनका गला सूख रहा था। पांडवों में सबसे बड़े युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को निकट जलाशय से पानी लाने भेजा था। एकएक कर पांडु पुत्र पानी की खोज में जाते और फिर वापस नहीं लौटते। अंत में चिंता में डूबे युधिष्ठिर स्वयं पानी की खोज में निकले थे। उन्हें जलाशय के पास सभी भाई मृत अवस्था में पड़े नजर आए, वह अत्यंत दु:खी हुए और विलाप करने लगे। पर उन्होंने धैर्य नहीं खोया, बल्कि अपनी बुद्धि और धर्म निष्ठा का परिचय देते हुए इस विपरीत समय का मुकाबला किया। युधिष्ठिर ने देखा कि उनके भाइयों के शरीर पर कोई बाण अथवा कोई घाव नहीं है, तो वह समझ गए कि यह किसी दैवीय शक्ति का कार्य है। तभी जलाशय के संरक्षक यक्ष ने युधिष्ठिर से जीवनदर्शन से जुड़े गूढ़ सवाल किए। चेतावनी भी दी कि सवालों का जवाब देने के बाद ही उन्हें जलाशय से जल पीने की अनुमति मिलेगी अन्यथा उनका भी उनके भाइयों जैसा हाल होगा।
धर्म के मर्मज्ञ युधिष्ठिर ने यक्ष की चुनौती स्वीकार की और सभी गूढ़ प्रश्नों का जवाब दिया। इस पर यक्ष प्रसन्न हुए और सभी भाइयों को पुनर्जीवित कर दिया। वास्तव में यक्ष कोई ओर नहीं, बल्कि युधिष्ठिर के पिता धर्मराज थे। उन्होंने युधिष्ठिर के ज्ञान की परीक्षा लेने के लिए ऐसा किया था। प्राचीन काल में जिस जलाशय पर यक्ष ने प्रश्न किए थे, वह आज भी प्रदेश के बरेली जिले के आंवला क्षेत्र के रामनगर इलाके में मौजूद है। समय के बदलते प्रवाह में यह ‘यक्ष सरोवर’ अब ‘लीलौर झील’ के नाम से प्रसिद्ध है। लगभग 52 हेक्टेयर में फैली यह झील आज भी शांत व प्राकृतिक रूप में सुंदर है। यह यहां देखने आने वाले लोगों को यह झील प्राचीन काल में हुए यक्ष प्रश्नों की याद दिला रही है।
उपेक्षा झेल चुकी झील के बहुर रहे दिन
महाभारत के हजारों वर्षों बाद इस झील की पूरब व पश्चिम दिशा में आज भी घने पेड़ लगे हुए हैं, जो प्राचीन काल जंगल का एहसास कर रहे हैं। हालांकि उत्तर और दक्षिण दिशा में अब कई गांव बस गए हैं। झील के ठीक बगल में एक प्राचीन शिव मंदिर बना है। बताते हैं कि इस शिव मंदिर में महाभारत कालीन प्राकृतिक तौर पर बना शिवलिंग है। ग्रामीणों के मुताबिक प्राचीन काल के बाद यह शिवलिंग जमीन में दब गया था। एक बुजुर्ग ग्रामीण आसपास पशुओं को चारा देने के लिए घास छीलने आते थे। इसी दौरान उन्हें एक अद्भुत पत्थर मिला। वह इसे अपने साथ घर लेकर चले गए। रात में उन्हें स्वप्न में शिवलिंग होने की जानकारी मिली और पत्थर वहीं वापस रखने को कहा गया। दूसरे दिन वह पत्थर वहीं रखे आए। बाद में खुदाई के दौरान वहां प्राचीन शिवलिंग सामने दिखाई दिया। अब यहां शिवालय बना दिया गया है, जहां आसपास के लोग ही नहीं, बल्कि दूरदराज के लोग भी यहां दर्शन करने आते हैं। झील में स्नान कर यहां पूजापाठ कर अपनी मन्नतें मांगते हैं।
राजा लीलाधर के नाम पर पड़ा ‘लीलौर झील’
महाभारत काल के बाद इस क्षेत्र में लीलाधर नाम के एक राजा हुए थे। उनके नाम से इस झील का नाम ‘लीलौर झील’ हो गया है। स्थानीय लोग बताते हैं कि राजा लीलाधार को कुष्ठ रोग हो गया था। उस समय राजा ने इसी झील में स्नान किया था और इस रोग से ठीक हो गए थे। तभी से इस झील का नाम ‘लीलौर’ पड़ गया। झील की उत्तर व दक्षिण दिशा में स्थित गांवों का नाम भी लीलौर है। इनमें लीलौर सहसा व लीलौर बुजुर्ग शामिल हैं। इन गांवों के बीच क्षेत्र में झील है। ग्रामीण बताते हैं कि प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों के लोग अपनी त्वचा संबंधी बीमारी को ठीक करने के लिए यहां आते हैं और झील में स्नान करते हैं।
पर्यटन के रूप में विकसित हो रही झील
झील अब पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो रही है। राज्य सरकार के निर्देश पर जिला प्रशासन की निगरानी में पर्यटन विभाग इसका सौंदर्यीकरण कर रहा है। अब तक यहां पर्यटकों के रुकने के लिए दो गेस्ट हाउस बनाए गए हैं। यहां लोगों के बैठने का स्थान भी बनाया गया है। परिवार संग बच्चों के साथ झील के चारों ओर घूमने के लिए ‘फैमिली ट्रेन’ का संचालन शुरू किया गया है। झील के चारों ओर बाउंड्री बनाई गई है। झील के सौंदर्यीकरण का कार्य शासनप्रशासन की निगरानी में चल रहा है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार इनकी निगरानी में विकास कार्य को गति मिल रही है। झील की जानकारी पाकर यहां प्रदेश समेत कई राज्यों के लोगों का आवागमन बढ़ गया है। पर्यटक यहां बोटिंग का आनंद भी लेने पहुंच रहे हैं।
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