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56 साल पुराने चर्च संपत्ति विवाद में हाई कोर्ट ने एसएमएनसी के पक्ष में फैसला

रांची
 हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने संताल मिशन आफ नार्दर्न चर्चेज और ट्रस्ट एसोसिएशन आफ नार्दर्न इवेंजेलिकल लूथरन चर्च के बीच लगभग 56 वर्षों से चले आ रहे चर्च संपत्ति विवाद पर अहम निर्णय सुनाया है।

56 साल पुराने चर्च संपत्ति विवाद में हाई कोर्ट ने एसएमएनसी के पक्ष में फैसला

गुरुवार को खंडपीठ ने एसएमएनसी के खिलाफ दायर दोनों अपील याचिकाओं को खारिज करते हुए वर्ष 1992 में एकल पीठ द्वारा दिए गए निर्णय को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि 10 फरवरी 1968 को किया गया ट्रस्ट ट्रांसफर कानून के अनुरूप था और उसे अवैध घोषित करने का कोई आधार नहीं है।

यह विवाद वर्ष 1880 में स्थापित संताल मिशन आफ नार्दर्न चर्चेज से जुड़ा है। इस मिशन की स्थापना संताल परगना क्षेत्र में शिक्षा, सामाजिक उत्थान और ईसाई मिशनरी कार्यों के उद्देश्य से की गई थी। मिशन के नाम पर बड़ी संख्या में चल और अचल संपत्तियां खरीदी गईं और उनके संचालन के लिए ट्रस्ट बनाया गया।

बाद में वर्ष 1956 में कंपनी अधिनियम के तहत ट्रस्ट एसोसिएशन आफ नार्दर्न इवेंजेलिकल लूथरन चर्च का गठन हुआ। इसके बाद 10 फरवरी 1968 को तत्कालीन ट्रस्टियों ने एक दस्तावेज के माध्यम से एनईएलसी को नया ट्रस्टी नियुक्त कर दिया।

इसी हस्तांतरण को लेकर विवाद शुरू हुआ। वर्ष 1971 में दायर टाइटल सूट में कुछ लाभार्थियों ने आरोप लगाया कि ट्रस्टियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए 1968 का हस्तांतरण किया। उन्होंने ट्रस्ट के प्रबंधन के लिए नई योजना बनाने, ट्रस्टियों को हटाने और ट्रांसफर को अवैध घोषित करने की मांग की।

परस्पर विरोधी दोनों निर्णय को पहले पटना हाई कोर्ट में चुनौती दी गई
एनईएलसी ने मिशन की संपत्तियों पर अपने अधिकार की घोषणा और विरोधी पक्ष को हस्तक्षेप से रोकने की मांग की। 28 जून 1985 को ट्रायल कोर्ट ने पहले मुकदमे में 1968 के ट्रांसफर को अवैध और प्रभावहीन घोषित कर दिया तथा ट्रस्ट की संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक लगा दी। पांच फरवरी 1986 को दूसरे मुकदमे में ट्रायल कोर्ट ने एनईएलसी के पक्ष में फैसला सुनाया।

इस तरह दोनों मामलों में परस्पर विरोधी निर्णय सामने आए। बाद में दोनों फैसलों को पटना हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। 30 जून 1992 को एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें 1968 के ट्रांसफर को अवैध घोषित किया गया था, और एनईएलसी के पक्ष में दिए गए निर्णय को बरकरार रखा।

झारखंड राज्य गठन के बाद दोनों अपील झारखंड हाई कोर्ट स्थानांतरित हो गए। खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि सुनवाई के दौरान यह साबित नहीं हो सका कि ट्रस्टियों ने ट्रस्ट का दुरुपयोग किया या न्यासभंग किया। जब कुप्रबंधन का आरोप सिद्ध नहीं हुआ तो केवल ट्रांसफर दस्तावेज को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने स्वयं ट्रस्टियों को हटाने या नया प्रबंधन गठित करने जैसी मुख्य मांगें स्वीकार नहीं की थीं, इसलिए केवल ट्रांसफर को अवैध घोषित करना कानूनी रूप से उचित नहीं था।

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