
लखनऊ। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा है कि फ्लैट का कब्जा देर से लेने से मकान खरीदार कब्जे में देरी के लिए ब्याज मांगने के अपने कानूनी अधिकार से वंचित नहीं हो जाता। अदालत ने कहा कि रियल एस्टेट कानून यानी रेरा में कब्जा देने में देरी के चलते ब्याज के दावे के लिए कोई विशेष सीमित अवधि निर्धारित नहीं है।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने नोएडा के सेक्टर78 स्थित अंतरिक्ष गोल्फ व्यू परियोजना से जुड़े मामले में अंतरिक्ष डेवलपर्स एंड प्रमोटर्स प्राइवेट लिमिटेड की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। मामले के अनुसार, खरीदार श्याम सुंदर अग्रवाल ने वर्ष 2010 में परियोजना में एक फ्लैट बुक किया था। उसे नवंबर 2012 तक फ्लैट का कब्जा मिलना था, लेकिन डेवलपर ने मई 2017 में कब्जा देने की पेशकश की। अदालत के अनुसार, उस समय कब्जा प्रमाणपत्र और अन्य जरूरी दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं कराए गए थे।
दिसंबर 2012 से मई 2017 तक देना होगा ब्याज
रेरा अपीलीय अधिकरण ने डेवलपर को दिसंबर 2012 से मई 2017 तक की अवधि के लिए खरीदार द्वारा जमा राशि पर एमसीएलआर से एक प्रतिशत अधिक की दर से ब्याज देने का निर्देश दिया था। डेवलपर ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
डेवलपर की ओर से दलील दी गई कि कब्जे में देरी राष्ट्रीय हरित अधिकरण के उस आदेश के कारण हुई, जिसमें ओखला पक्षी अभयारण्य की 10 किलोमीटर की परिधि में निर्माण और कब्जा प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक लगाई गई थी।
हाईकोर्ट ने डेवलपर की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि डेवलपर का अपना ही पक्ष था कि परियोजना वर्ष 2014 में पूरी हो गई थी और उसी साल कब्जा प्रमाणपत्र के लिए आवेदन भी किया गया था। ऐसे में देरी के लिए एनजीटी के आदेश को आधार बनाकर जिम्मेदारी से बचने की दलील टिकाऊ नहीं है। अदालत ने रेरा अपीलीय अधिकरण के आदेश को बरकरार रखते हुए डेवलपर की अपील खारिज कर दी।


