देश में E85 की बिक्री शुरू हो गई है और E20 पहले से ही बिक रहा है. सरकार का टारगेट आयात होने वाले कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना है. कुल मिलाकर आने वाले समय में पेट्रोल में धीरेधीरे एथेनॉल की मात्रा बढ़ती जाएगी. इस बीच देश में एथेनॉल के फायदे और नुकसान को लेकर बहस चल रही है. लेकिन जानकर हैरानी होगी कि भारत इकलौता देश नहीं है जो एथेनॉल का इस्तेमाल फ्यूल के रूप में कर रहा है. दुनिया के कई देशों ने दशकों पहले ही इस दिशा में काम शुरू कर दिया था. खासकर ब्राजील और अमेरिका ने एथेनॉल को वैकल्पिक ईंधन के रूप में विकसित करने में बड़ी भूमिका निभाई है.

ब्राजील ने 1970 के दशक में ही एथेनॉल की क्षमता को पहचान लिया था. साल 1973 में वैश्विक तेल संकट के बाद देश ने पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने के लिए एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की योजना बनाई. इसके बाद 1975 में ब्राजील सरकार ने “प्रोआल्कोल” नाम से राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया. इसका मकसद गन्ने से बनने वाले एथेनॉल का उत्पादन बढ़ाना और पेट्रोलडीजल पर निर्भरता कम करना था. शुरुआत में पेट्रोल में 10 से 25 प्रतिशत तक एथेनॉल मिलाया जाने लगा. 1970 और 1980 के दशक में ब्राजील ने केवल एथेनॉल पर चलने वाले वाहन भी विकसित किए. सरकारी सहायता और सब्सिडी के कारण इन वाहनों को लोगों ने खूब अपनाया. हालांकि बाद में तेल की कीमतों में गिरावट और एथेनॉल की कमी के कारण इनकी लोकप्रियता कुछ कम हो गई.
फ्लेक्सफ्यूल वाहनों ने बदली तस्वीर
साल 2003 में ब्राजील ने फ्लेक्सफ्यूल वाहन पेश किए. ये वाहन किसी भी अनुपात में एथेनॉल और पेट्रोल के मिश्रण पर चल सकते थे. इस तकनीक ने एथेनॉल उद्योग को नई ताकत दी और लोगों का भरोसा बढ़ाया. स्थिति यह रही कि 2008 तक ब्राजील में बिकने वाली नई कारों में 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी फ्लेक्सफ्यूल वाहनों की हो गई. आज भी ब्राजील में E18 से E27.5 तक एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल अनिवार्य है. आज ब्राजील दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एथेनॉल उत्पादक और निर्यातक देश है.
अमेरिका की एथेनॉल
ब्राजील की तरह अमेरिका भी एथेनॉल उत्पादन में दुनिया का बड़ा खिलाड़ी है. अमेरिका में एथेनॉल का उपयोग 20वीं सदी की शुरुआत से होता रहा है, लेकिन इसका व्यापक उपयोग 1970 के दशक में शुरू हुआ. पहले इसका इस्तेमाल लैंप जलाने के लिए होता था. बाज में वाहनों में इस्तेमाल शुरू हुआ. अमेरिका ने मुख्य रूप से मक्का से बनने वाले एथेनॉल पर ध्यान दिया. दूसरे विश्व युद्ध के बाद इसका उत्पादन कुछ समय के लिए घट गया, लेकिन 1970 के तेल संकट ने एथेनॉल को फिर से चर्चा में ला दिया. तेल आयात पर निर्भरता कम करने के लिए अमेरिकी सरकार ने एथेनॉल को बढ़ावा दिया. 1978 के ऊर्जा नीति अधिनियम के तहत एथेनॉल ईंधन पर टैक्स में राहत दी गई. इससे एथेनॉल उत्पादन और उपयोग में तेजी आई.
2005 बना बड़ा टर्निंग पॉइंट
अमेरिका के एथेनॉल कार्यक्रम को सबसे बड़ी मजबूती 2005 में मिली, जब रिन्यूएबल फ्यूल स्टैंडर्ड लागू किया गया. इसके तहत पेट्रोल में निश्चित मात्रा में एथेनॉल मिलाना अनिवार्य किया गया. बाद में 2007 के एनर्जी इंडिपेंडेंस एंड सिक्योरिटी एक्ट ने और बड़े लक्ष्य तय किए. अमेरिका में E10 पेट्रोल सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है. इसके अलावा E15 और E85 जैसे मिश्रण भी उपलब्ध हैं, हालांकि इनका उपयोग सीमित है. आज अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा एथेनॉल उत्पादक और निर्यातक देश है. वहां एथेनॉल नीति ऊर्जा सुरक्षा, ग्रामीण विकास और पर्यावरण संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है.
भारत का तेजी से बढ़ता सफर
ब्राजील और अमेरिका से सीख लेते हुए भारत ने साल 2003 में एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम शुरू किया था. भारत ने 202122 में 10 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य हासिल किया. इसके बाद 202223 में यह बढ़कर 12.06 प्रतिशत, 202324 में 14.06 प्रतिशत और जुलाई 2025 में 20 प्रतिशत तक पहुंच गया. एथेनॉल मिश्रण बढ़ने से भारत को बड़ा आर्थिक फायदा हुआ है. सरकार के अनुसार 201415 से 2025 तक तक पेट्रोल की जगह एथेनॉल के उपयोग से देश ने लगभग 1.40 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाई है. अब भारत का अगला बड़ा लक्ष्य वर्ष 2030 तक पेट्रोल में 30 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण हासिल करना है. इससे तेल आयात में और कमी आएगी, किसानों की आय बढ़ेगी और पर्यावरण को भी लाभ मिलेगा.



