Satya Report: भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी केवल एक दिग्गज राजनेता ही नहीं थे, बल्कि एक महान कवि भी थे। उनके व्यक्तित्व में ‘राजनेता’ और ‘कवि’ इस कदर घुलेमिले थे कि उनकी राजनीति में कविता की संवेदना और उनकी कविता में राष्ट्र के प्रति संकल्प साफ झलकता था। अटल जी की कविताएं केवल शब्दों का मेल नहीं थीं, बल्कि उनके जीवन के अनुभवों का निचोड़ थीं। उनकी रचनाओं में जहां एक ओर करुणा और मानवीय संवेदना है, वहीं दूसरी ओर अन्याय के खिलाफ विद्रोह और राष्ट्रवाद का स्वर भी मुखर है। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति, “हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा”, आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। ऐसे में यहां हम आपके लिए अटल जी की कुछ मशहूर कविताएं लेकर आए हैं।

1. गीत नहीं गाता हूं
बेनकाब चेहरे हैं दाग बड़े गहरे है,
टूटता तिलस्म आज सच से भय खाता हूं,
गीत नहीं गाता हूं
लगी कुछ ऐसी नज़र,
बिखरा शीशे सा शहर,
अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं
गीत नहीं गाता हूं
पीठ में छुरी सा चांद,
राहु गया रेख फांद,
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूं
गीत नहीं गाता हूं
2. क्या खोया, क्या पाया जग में
क्या खोया, क्या पाया जग में,
मिलते और बिछड़ते मग में,
मुझे किसी से नहीं शिकायत,
यद्यपि छला गया पगपग में,
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें
पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी,
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएं,
यद्यपि सौ शरदों की वाणी,
इतना काफी है अंतिम दस्तक पर खुद दरवाजा खोलें.
जन्ममरण का अविरत फेरा,
जीवन बंजारों का डेरा,
आज यहां, कल कहां कूच है,
कौन जानता, किधर सवेरा,
अंधियारा आकाश असीमित, प्राणों के पंखों को तौलें.
अपने ही मन से कुछ बोलें
3. एक बरस बीत गया
एक बरस बीत गया,
झुलासाता जेठ मास
शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया
सीकचों मे सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अम्बर तक
गूंज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया
पथ निहारते नयन,
गिनते दिन पल छिन,
लौट कभी आएगा,
मन का जो मीत गया,
एक बरस बीत गया।
4. जीवन बीत चला
कल कल करते आज,
हाथ से निकले सारे,
भूत भविष्यत की चिंता में,
वर्तमान की बाजी हारे
पहरा कोई काम न आया,
रसघट रीत चला,
जीवन बीत चला
हानि लाभ के पलड़ों में,
तुलता जीवन व्यापार हो गया,
मोल लगा बिकने वाले का,
बिना बिका बेकार हो गया
मुझे हाट में छोड़ अकेला,
एक एक कर मीत चला,
जीवन बीत चल।
5. सच्चाई यह है कि
सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलगथलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटाबंटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं, ,मजबूरी है
ऊंचाई और गहराई में
आकाशपाताल की दूरी है
जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है
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