India

​इजराइल: नहीं मिला बहुमत तो क्या? सरकार बनाने के ये 5 विकल्प रहेंगे

इजराइल में हुए आम चुनाव की मतगणना शुरू हो चुकी है. चार नवंबर को नतीजे आने वाले हैं. संसद की 120 सीटों के लिए लगभग तीन दर्जन दल मैदान में हैं. ऐसे में यह चुनाव बेहद रोचक मोड़ पर है. किसी को बहुमत मिलने की संभावना दूरदूर तक नहीं दिखाई दे रही है. सिर्फ और सिर्फ गठबंधन सरकार का विकल्प बनता हुआ दिखाई देता है. आइए, इस चुनाव के बहाने समझते हैं कि चार नवंबर को बहुमत नहीं मिला तो इजराइल में सरकार बनाने के लिए कौनकौन से विकल्प बचेंगे?

​इजराइल: नहीं मिला बहुमत तो क्या? सरकार बनाने के ये 5 विकल्प रहेंगे

इजराइल के चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनना और सरकार बना पाना, दो अलगअलग बातें हैं. यहां मतदाता प्रधानमंत्री को सीधे नहीं चुनते. वे पार्टी को वोट देते हैं. 120 सदस्यों वाली संसद, जिसे नेसेट कहा जाता है, में सरकार बनाने के लिए आम तौर पर 61 सदस्यों का समर्थन चाहिए. 4 नवंबर को घोषित होने वाले आधिकारिक नतीजे यह साफ करेंगे कि हर पार्टी को कितनी सीटें मिलीं. शुरुआती एग्जिट पोल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन और उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी गादी आइज़ेनकोट के विपक्षी खेमे में से किसी को भी स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिखा. हालांकि, एग्जिट पोल अंतिम नतीजे नहीं होते. विशेष मतदान केंद्रों के मत और अंतिम गिनती सीटों का समीकरण बदल सकते हैं.

राष्ट्रपति सरकार बनाने को किसे बुलाएंगे?

नतीजों के बाद राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग संसद में चुनी गई पार्टियों के नेताओं से बात करेंगे. फिर वे उस सांसद को सरकार बनाने का मौका देंगे जिसके पास बहुमत जुटाने की सबसे बेहतर संभावना हो. जरूरी नहीं कि यह सबसे बड़ी पार्टी का नेता ही हो. निर्णायक बात यह होगी कि कौन 61 सांसदों का समर्थन हासिल कर सकता है. चुने गए नेता को गठबंधन बनाने के लिए 28 दिन मिलते हैं. जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति 14 दिन की अतिरिक्त मोहलत भी दे सकते हैं. इस दौरान पार्टियां मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी, नीतियों, बजट और प्रमुख पदों पर बातचीत करती हैं. समझौते के बाद नई सरकार को नेसेट में विश्वास मत जीतना होता है.

क्या हैं विकल्प?

  • पहला रास्ता: पीएम नेतन्याहू का खेमा छोटे दलों को साथ लेकर 61 सीटें जुटाने की कोशिश करे और राष्ट्रपति उन पर भरोसा करके सरकार बनाने का मौका दें.
  • दूसरी विकल्प: आइज़ेनकोट और विपक्षी दलों की है. लेकिन मुश्किल यह है कि विपक्ष के भीतर भी विचारों और राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर बड़े मतभेद हैं. इसलिए केवल नेतन्याहूविरोधी दलों का साथ आना अपने आप में बहुमत की गारंटी नहीं है.
  • तीसरा रास्ता: यह रास्ता अरब पार्टियों के समर्थन या सहयोग का हो सकता है. शुरुआती अनुमानों में अरब पार्टियों को उल्लेखनीय सीटें मिलने की संभावना जताई गई है. इससे वे सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. लेकिन उनके साथ गठबंधन करने को लेकर दोनों बड़े खेमों में राजनीतिक और वैचारिक मुश्किलें हैं.
  • चौथा विकल्प: राष्ट्रीय एकता सरकार है. इसमें अलगअलग खेमों की बड़ी पार्टियां साथ आ सकती हैं. ऐसी सरकार के लिए प्रधानमंत्री पद, नीतियों और मंत्रिमंडल के बंटवारे पर सहमति जरूरी होगी. यह रास्ता राजनीतिक गतिरोध कम कर सकता है, लेकिन प्रतिद्वंद्वी नेताओं के बीच गहरे मतभेद इसे कठिन बनाते हैं.
  • पांचवां रास्ता: अल्पमत सरकार भी चर्चा में आ सकती है. ऐसी सरकार के पास अपने दम पर 61 सांसद नहीं होते, लेकिन उसे विश्वास मत या महत्वपूर्ण विधेयकों पर बाहर से समर्थन मिल सकता है. यह विकल्प तभी टिकेगा जब समर्थन देने वाले दलों के साथ लगातार सहमति बनी रहे. इससे सरकार की स्थिरता पर सवाल रह सकता है.

प्रयास विफल हुआ तो क्या?

अगर राष्ट्रपति द्वारा चुना गया नेता समयसीमा में सरकार नहीं बना पाता, तो राष्ट्रपति किसी दूसरे नेता को मौका दे सकते हैं. उसके बाद भी सफलता न मिले, तो नेसेट के 61 सदस्य किसी अन्य सांसद को सरकार बनाने का अवसर देने की मांग कर सकते हैं. अगर इस प्रक्रिया में भी कोई नेता बहुमत नहीं जुटा पाता, तो संसद भंग हो सकती है और नए चुनाव का रास्ता खुल सकता है. इसलिए बहुमत का अभाव अपने आप अगले दिन चुनाव नहीं कराता. पहले गठबंधन बनाने के संवैधानिक और संसदीय प्रयास होते हैं.

इजराइल में पहले कबकब आम चुनाव हुए?

इजराइल में सरकार बनाने के लिए गठबंधन जरूरी होने के कारण पहले भी कई बार चुनाव दोहराने पड़े हैं. इसका सबसे ताजा बड़ा उदाहरण 2019 से 2022 के बीच का राजनीतिक गतिरोध है. इस अवधि में तीन साल से कुछ अधिक समय में पांच आम चुनाव हुए.

  • अप्रैल 2019 के चुनाव के बाद नेतन्याहू बहुमत वाला गठबंधन नहीं बना सके. उस समय लिकुड और बेनी गैंट्ज की ब्लू एंड व्हाइट पार्टी को 3535 सीटें मिली थीं. गठबंधन की बातचीत विफल होने के बाद नेसेट ने खुद को भंग किया और सितंबर 2019 में फिर चुनाव हुआ. यह असामान्य कदम था, क्योंकि सरकार बनने से पहले ही संसद ने खुद को भंग कर दिया था.
  • सितंबर 2019 के चुनाव में भी कोई पक्ष बहुमत नहीं बना पाया. नेतन्याहू और फिर गैंट्ज, दोनों को सरकार बनाने का अवसर मिला, लेकिन बातचीत सफल नहीं हुई.
  • मार्च 2020 में तीसरा चुनाव हुआ. इस बार भी किसी एक पक्ष के लिए अकेले सरकार बनाना आसान नहीं था. अंततः नेतन्याहू और गैंट्ज की पार्टियों ने साझा सरकार बनाई. लेकिन यह सरकार भी लंबे समय तक नहीं चली. बजट को लेकर सहमति नहीं बनी और दिसंबर 2020 में संसद भंग होने का रास्ता बना.
  • मार्च 2021 में चौथा चुनाव कराया गया. उस चुनाव के बाद नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के नेतृत्व में अलगअलग विचारों वाली आठ पार्टियों ने गठबंधन बनाया. सरकार के पास बहुत कम बहुमत था. बाद में कुछ सांसदों के अलग होने से उसका समर्थन कमजोर हुआ और संसद भंग करने का फैसला लिया गया.
  • फिर नवंबर 2022 में पांचवां चुनाव हुआ. इस बार नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी खेमे ने बहुमत हासिल किया और नई सरकार बनाई. यानी हर चुनाव का कारण केवल किसी पार्टी का सबसे बड़ी पार्टी न बनना नहीं था. असली समस्या थी पर्याप्त समर्थन जुटाने या गठबंधन को टिकाए रखने में विफलता.

इजराइली संसद को ‘नेसेट’ कहते हैं, यह शब्द प्राचीन ‘नेसेट हगदोला’ यानी ‘ग्रेट असेंबली’ से निकला है. फोटो: Getty Images

इस बार दोबारा चुनाव कितनी जल्दी हो सकता है?

अगर 4 नवंबर के नतीजों के बाद कोई भी खेमा बहुमत नहीं जुटा पाता, तो पहले राष्ट्रपति की सलाहमशविरा प्रक्रिया और सरकार बनाने के प्रयास होंगे. इसमें कई सप्ताह लग सकते हैं. अगर एक उम्मीदवार असफल होता है, तो दूसरा नेता मौका पा सकता है. इस बीच मौजूदा सरकार कार्यवाहक सरकार के रूप में काम करती रह सकती है. नया चुनाव तभी एक वास्तविक विकल्प बनेगा जब तय समयसीमाओं के भीतर कोई सरकार न बन सके या संसद भंग करने का फैसला हो.

2019 से 2022 का अनुभव दिखाता है कि लगातार गतिरोध चुनावों को दोहराने तक ले जा सकता है. लेकिन हर चुनाव के बाद यही परिणाम आएगा, ऐसा तय नहीं है. दलों के बीच समझौता, छोटे दलों का रुख और अरब पार्टियों के समर्थन की संभावना इस बार का परिणाम तय करने में अहम हो सकती है.

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply