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1933 में बिहार के बैरिस्टर ने सऊदी अरब को दिया था बिजनेस प्लान, जानिए कौन थे मुहम्मद यूनुस.

1933 में बिहार के बैरिस्टर ने सऊदी अरब को दिया था बिजनेस प्लान, जानिए कौन थे मुहम्मद यूनुस.

पटना: भारत के इतिहास में कई ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं, जिनकी कहानियां समय के साथ लोगों की नजरों से दूर हो गईं। बिहार के बैरिस्टर मुहम्मद यूनुस की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। साल 1933 में हज यात्रा के दौरान उन्होंने सऊदी अरब की सरकार को अर्थव्यवस्था, पर्यटन, परिवहन और हज यात्रियों की सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए कई सुझाव दिए थे। दिलचस्प बात यह है कि आगे चलकर वही मुहम्मद यूनुस बिहार के पहले प्रधानमंत्री बने, जिन्हें आज के संदर्भ में राज्य का पहला मुख्यमंत्री कहा जाता है।

1933 में ब्रिटिश दूतावास से भेजी गई थी चिट्ठी

2 जून 1933 को सऊदी अरब के जेद्दा स्थित ब्रिटिश दूतावास से भारत के वायसराय के कार्यालय को एक आधिकारिक पत्र भेजा गया था। इस पत्र में बिहार के बैरिस्टर मुहम्मद यूनुस का उल्लेख किया गया था। बताया गया कि हज यात्रा के दौरान उन्होंने सऊदी सरकार के सामने कई आर्थिक और प्रशासनिक सुझाव रखे थे।

उनके प्रस्ताव केवल धार्मिक यात्रा की व्यवस्थाओं तक सीमित नहीं थे, बल्कि उनमें परिवहन, पशुपालन, पर्यटन और व्यापार से जुड़े विचार भी शामिल थे। हालांकि, सऊदी अरब के तत्कालीन वित्त मंत्री ने इन सुझावों को खास महत्व नहीं दिया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उनके प्रस्तावों में स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों की पर्याप्त समझ नहीं दिखाई दी थी।

भारत सरकार ने बिहार सरकार से मांगी जानकारी

मुहम्मद यूनुस के प्रस्तावों की जानकारी सामने आने के बाद भारत सरकार ने उनके बारे में विस्तृत जानकारी जुटाने का फैसला किया। 5 जुलाई 1933 को वायसराय के कार्यालय से बिहार सरकार को पत्र भेजा गया। इसके जवाब में 20 जुलाई 1933 को बिहार के मुख्य सचिव डब्ल्यू. बी. ब्रेट ने यूनुस के बारे में जानकारी दी।

इस जवाब में बताया गया कि मुहम्मद यूनुस पटना हाई कोर्ट के बैरिस्टर थे। उनके पास पर्याप्त संपत्ति थी और उनकी पूंजी का बड़ा हिस्सा पटना की अचल संपत्ति में लगा हुआ था। वे बिहार विधान परिषद के सदस्य भी रह चुके थे और राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।

हालांकि, सरकारी आकलन में मुस्लिम समाज के भीतर उनके प्रभाव को सीमित बताया गया था। उनका एक छोटा अखबार भी था, लेकिन उसके दैनिक संचालन में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका नहीं मानी गई। बड़े आर्थिक और विकास संबंधी प्रोजेक्ट संभालने के अनुभव को लेकर भी संदेह जताया गया था।

सऊदी अरब के लिए क्या थे मुहम्मद यूनुस के सात सुझाव?

मुहम्मद यूनुस ने हिजाज़ क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और हज यात्रियों की सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए सात प्रमुख सुझाव दिए थे।

1. घोड़ों के प्रजनन और व्यापार को बढ़ावा देना

उन्होंने घोड़ों के प्रजनन को बढ़ाने और उनके व्यापार को विकसित करने पर जोर दिया था। इसके लिए वे नज्द क्षेत्र में पशु चिकित्सक भेजने की पेशकश भी करने को तैयार थे।

2. विदेशी मुसलमानों को हिजाज़ में बसने की अनुमति

उनका सुझाव था कि गैर-अरबी मुसलमानों को हिजाज़ में बसने और जमीन प्राप्त करने की अनुमति दी जाए। उन्होंने इस विचार को उस समय फिलिस्तीन में यहूदी लोगों को बसाने की नीतियों से जोड़कर प्रस्तुत किया था।

3. मक्का से मदीना तक रेलवे सेवा दोबारा शुरू करना

मुहम्मद यूनुस ने हिजाज़ रेलवे को फिर से चालू करने का प्रस्ताव दिया था। उनका मानना था कि इससे यात्रियों की आवाजाही आसान होगी। उन्होंने इस परियोजना में अपनी सेवाएं देने की पेशकश भी की थी।

4. होटल और विश्राम गृहों की सुविधाएं बेहतर बनाना

उन्होंने मौजूदा होटलों की स्थिति सुधारने और मदीना जाने वाले मार्ग पर अधिक विश्राम गृह बनाने की जरूरत बताई थी, ताकि हज यात्रियों को सफर के दौरान बेहतर सुविधाएं मिल सकें।

5. भारत में हज यात्रा का प्रचार करना

उनका सुझाव था कि भारत में हज यात्रा को लेकर बड़े स्तर पर प्रचार अभियान चलाया जाए। इसके लिए पुस्तिकाएं प्रकाशित करने जैसे उपायों का उल्लेख किया गया था। इस काम की जिम्मेदारी खुद संभालने में भी उन्होंने रुचि दिखाई थी।

6. भारतीय मुस्लिम शासकों से संपर्क करना

उन्होंने हिजाज़ी और भारतीय प्रतिनिधियों का एक संयुक्त प्रतिनिधिमंडल बनाने का प्रस्ताव दिया था। यह प्रतिनिधिमंडल भारत की मुस्लिम रियासतों के शासकों से मिलकर उन्हें हज यात्रा के लिए आमंत्रित करता और सड़कों के निर्माण के लिए आर्थिक सहायता जुटाने का प्रयास करता।

7. हरम परिसर में भिक्षावृत्ति पर रोक लगाना

उन्होंने हरम परिसर में भिखारियों के प्रवेश को रोकने का सुझाव भी दिया था। इसका उद्देश्य धार्मिक स्थलों पर व्यवस्थाओं को बेहतर बनाना था।

व्यापार से लेकर रियल एस्टेट तक फैले थे उनके कारोबार

मुहम्मद यूनुस केवल कानून और राजनीति तक सीमित नहीं थे। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, वे कई तरह के कारोबारी हितों से जुड़े हुए थे। उनका पशुओं के व्यापार में निवेश था और वे पटना में रियल एस्टेट के कारोबार से भी जुड़े थे।

इसके अलावा, वे बख्तियारपुर लाइट रेलवे में साझेदार थे और पटना के ग्रैंड होटल के मालिक भी बताए जाते हैं। प्रिंटिंग प्रेस, अखबार और बैंकिंग कारोबार से भी उनका संबंध था।

इन व्यावसायिक गतिविधियों को देखते हुए उनके सऊदी अरब संबंधी कुछ सुझावों में व्यक्तिगत कारोबारी हितों की संभावित भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, किसी विशेष प्रस्ताव के पीछे उनका उद्देश्य क्या था, इसे समझने के लिए ऐतिहासिक दस्तावेजों के विस्तृत अध्ययन की जरूरत है।

1937 में बने बिहार के पहले प्रधानमंत्री

मुहम्मद यूनुस की राजनीतिक यात्रा भी उल्लेखनीय रही। 1937 में बिहार में प्रांतीय सरकार के गठन के दौरान वे राज्य के पहले प्रधानमंत्री बने। उस समय ब्रिटिश शासन के अंतर्गत प्रांतों के प्रमुख को प्रधानमंत्री कहा जाता था। स्वतंत्र भारत में इसी पद के लिए मुख्यमंत्री शब्द प्रचलित हुआ।

इस तरह कानून, कारोबार और राजनीति से जुड़े मुहम्मद यूनुस बिहार के शुरुआती राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण शख्सियत बन गए।

सऊदी शाही परिवार से भी मिला था सम्मान

इस कहानी का एक और दिलचस्प पहलू जून 1937 से जुड़ा है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, जब मुहम्मद यूनुस बिहार के प्रधानमंत्री थे, तब सऊदी अरब के शासक इब्न सऊद की ओर से उनके सम्मान में एक विशेष उपहार भेजा गया था।

इसे उस समय की परंपरा में ‘खिलअत’ कहा जाता था। विवरण के अनुसार, इसमें सोने की टोपी, ऊंट के बालों से बना एक चोगा और एक सुंदर शॉल शामिल थे। यह उपहार इब्न सऊद के प्रधानमंत्री के माध्यम से भेजा गया था।

इस घटना से संकेत मिलता है कि मुहम्मद यूनुस और सऊदी शाही नेतृत्व के बीच संपर्क बना हुआ था। हालांकि, केवल इस उपहार के आधार पर उनके संबंधों की पूरी प्रकृति या निकटता के बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

एक चिट्ठी से सामने आई महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व की कहानी

मुहम्मद यूनुस की यह कहानी उस दौर की है, जब अंतरराष्ट्रीय यात्रा, धार्मिक पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर आज जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। ऐसे समय में एक भारतीय बैरिस्टर का सऊदी अरब की सरकार के सामने रेलवे, होटल, पशुपालन और प्रचार अभियान से जुड़े सुझाव रखना अपने आप में उल्लेखनीय था।

उनके सभी प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया गया, लेकिन यह प्रसंग दिखाता है कि वे कारोबार और विकास की संभावनाओं को व्यापक नजरिए से देखते थे। उनके जीवन के अलग-अलग पहलुओं को समझने के लिए ब्रिटिशकालीन पत्राचार और अन्य ऐतिहासिक अभिलेख महत्वपूर्ण स्रोत हो सकते हैं।

डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें शामिल कुछ दावों, पत्राचार और घटनाओं की स्वतंत्र पुष्टि के लिए मूल अभिलेखों तथा विश्वसनीय ऐतिहासिक स्रोतों का अध्ययन आवश्यक है।

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