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कटिहार: चोरी और ‘लूट’ के मामलों को लेकर चर्चा में जुराबगंज बस्ती, गैंग की कथित ट्रेनिंग और नेटवर्क ने बढ़ाई चिंता.

कटिहार: चोरी और ‘लूट’ के मामलों को लेकर चर्चा में जुराबगंज बस्ती, गैंग की कथित ट्रेनिंग और नेटवर्क ने बढ़ाई चिंता.

बिहार के कटिहार जिले की जुराबगंज बस्ती लंबे समय से चोरी और लूट की घटनाओं से जुड़े आरोपों को लेकर चर्चा में रही है। स्थानीय स्तर पर इस बस्ती से जुड़े कुछ गिरोहों पर देश के अलग-अलग हिस्सों में अपराध करने के आरोप लगते रहे हैं। हाल में झारखंड के रांची में पुलिस कार्रवाई के बाद एक बार फिर इस बस्ती और यहां से जुड़े कथित अपराधी नेटवर्क की चर्चा तेज हो गई है।

बताया जा रहा है कि रांची में पुलिस के साथ मुठभेड़ के दौरान इस नेटवर्क से जुड़े एक आरोपी के घायल होने के बाद पुलिस ने तीन संदिग्धों को पकड़ा था। पूछताछ में सामने आई जानकारियों के आधार पर पुलिस कथित गिरोह की गतिविधियों और उसके नेटवर्क की जांच कर रही है।

आरोप है कि यह गिरोह चोरी की बाइक या कार का इस्तेमाल कर लोगों को निशाना बनाता है। सड़क पर राहगीरों से सामान और चेन छीनने के अलावा ट्रेन में यात्रियों को निशाना बनाने की बात भी सामने आती रही है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, गिरोह के सदस्य पहले रेकी करते हैं और उसके बाद अलग-अलग लोगों को अलग-अलग जिम्मेदारियां दी जाती हैं।

जुराबगंज बस्ती को लेकर बताया जाता है कि यहां करीब पांच हजार लोग रहते हैं। जानकारी के मुताबिक, कई दशक पहले राजस्थान से आए एक समुदाय के कुछ परिवार यहां आकर बसे थे। शुरुआती दौर में आर्थिक परेशानियों के कारण छोटे-मोटे अपराध शुरू होने और बाद में संगठित तरीके से चोरी-लूट की घटनाओं में शामिल होने की बात कही जाती है। हालांकि, बस्ती के सभी लोगों को अपराध से जोड़ना उचित नहीं है और ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।

स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा रही है कि इस नेटवर्क का संपर्क बिहार और झारखंड के अलावा देश के दूसरे राज्यों तक फैला हुआ है। आरोप है कि अपराध के लिए अलग-अलग लोगों की भूमिका पहले से तय होती है। कोई रेकी करता है, कोई संदिग्ध व्यक्ति पर नजर रखता है और कोई वारदात को अंजाम देने के बाद भागने में मदद करता है।

कार चोरी को लेकर भी इस गिरोह पर गंभीर आरोप लगते रहे हैं। दावा किया जाता है कि चोरी की गई गाड़ियों को बस्ती में लाकर छिपाया जाता था। पहले हुई पुलिस कार्रवाई में बड़ी संख्या में चोरी की गाड़ियां बरामद किए जाने की बात भी कही जाती है। हालांकि, इन दावों की पुष्टि संबंधित पुलिस रिकॉर्ड और आधिकारिक जांच के आधार पर ही पूरी तरह हो सकती है।

ट्रेन में चोरी के मामलों में भी इस तरह के गिरोहों के सक्रिय होने की बात सामने आती रही है। आरोप है कि गिरोह के सदस्य पहले यात्रियों की गतिविधियों पर नजर रखते हैं और फिर सामान वाले यात्रियों को निशाना बनाते हैं।

सबसे गंभीर दावा यह है कि अपराध करने के तरीकों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए समुदाय के भीतर कथित तौर पर एक तरह की व्यवस्था बनी हुई है। स्थानीय चर्चाओं में समय-समय पर होने वाली बैठकों या पंचायतों का जिक्र किया जाता है, जिनमें अपराध से जुड़े लोगों के शामिल होने और नियम तय किए जाने की बात कही जाती है।

हालांकि, किसी

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