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​‘भारत भले ही चांद पर पहुंच गया, लेकिन हाथ से मैला ढोना खत्म नहीं हुआ’; बॉम्बे हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

मुंबई बॉम्बे हाई कोर्ट ने देश में दशकों से चली आ रही हाथ से मैला ढोने की अमानवीय प्रथा पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि भारत 21वीं सदी में चांद के अनछुए हिस्सों तक पहुंचने का दावा करता है, लेकिन जाति व्यवस्था जैसी सामाजिक बुराई के कारण आज भी कुछ लोगों को इंसानी गरिमा के खिलाफ काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

​‘भारत भले ही चांद पर पहुंच गया, लेकिन हाथ से मैला ढोना खत्म नहीं हुआ’; बॉम्बे हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

जस्टिस भारती डांगरे और मंजूषा देशपांडे की पीठ ने कहा कि संविधान लागू हुए 75 साल से अधिक समय बीत चुका है और वह सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है। इसके बावजूद देश अब तक उस सामाजिक बुराई से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है, जिसने समाज को सदियों से प्रभावित किया है।

सफाई कर्मचारियों की मौत पर 30 लाख मुआवजा

कोर्ट ने यह टिप्पणी ‘मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार का निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013’ को लागू करने में राज्य और स्थानीय अधिकारियों की कथित विफलता के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की। 13 अगस्त को हुई सुनवाई का फैसला 3 सितंबर को सार्वजनिक किया गया।

पीठ ने दो सरकारी आदेशों को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि निजी ठेकेदारों या निजी क्षेत्र के माध्यम से काम पर रखे गए सफाई कर्मचारियों की मौत होने पर उनके परिवार 30 लाख रुपये के मुआवजे के हकदार होंगे। यह मुआवजा राज्य सरकार को देना होगा, हालांकि बाद में संबंधित नियोक्ता से इसकी वसूली की जा सकती है।

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की ओर से उठाए गए ऐसे पांच मृत सफाई कर्मचारियों के मामलों में उनके आश्रितों को भी 3030 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।

सरकारी दावों पर भी उठे सवाल

याचिका श्रमिक जनता संघ से जुड़े राजू माधवे और लेखक श्रेयस पांडे के साथ मिलकर दायर की गई थी। माधवे के बेटे सूरज की 2022 में मुंब्रा की एक हाउसिंग सोसाइटी में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मौत हो गई थी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गायत्री सिंह ने दलील दी कि सरकारी आदेशों में मुआवजा देने की जिम्मेदारी राज्य या स्थानीय अधिकारियों के बजाय निजी ठेकेदारों और नियोक्ताओं पर डाल दी गई थी।

राज्य सरकार की ओर से पहले अदालत को बताया गया था कि 36 जिलों को मैनुअल स्कैवेंजिंग से मुक्त घोषित किया जा चुका है और अगस्त 2023 में जिलाधिकारियों ने इसके प्रमाणपत्र भी जमा किए थे। हालांकि, बाद की सुनवाई में सरकार ने स्पष्ट किया कि यह स्थिति प्रमाणपत्र जारी किए जाने के समय की थी।

याचिकाकर्ताओं ने सरकारी दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि मैनुअल स्कैवेंजिंग के जारी रहने के बावजूद राज्य की ओर से 81 मामलों में 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जा चुका है।

‘आधेअधूरे मन से हो रहे प्रयास’

इन तथ्यों पर अदालत ने कहा कि इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि राज्य इस सामाजिक बुराई को पूरी तरह खत्म करने में सफल नहीं हुआ है। पीठ ने कहा कि नियमों के अनुपालन के बावजूद राज्य की एजेंसियों की ओर से किए जा रहे प्रयासों को देखकर दुख होता है, क्योंकि ये प्रयास अभी भी आधेअधूरे नजर आते हैं।

हाई कोर्ट ने दोहराया कि हाथ से मैला ढोना ऐसी अमानवीय प्रथा है, जिसमें समाज के एक विशेष वर्ग को पीढ़ियों से मजबूर किया जाता रहा है। अदालत ने कहा कि कानून और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में इस प्रथा पर रोक के बावजूद इसका पूरी तरह खत्म न होना गंभीर चिंता का विषय है।

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