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क्या आपकी इंश्योरेंस पॉलिसी सुरक्षित है? आरबीआई की चेतावनी ने बढ़ाई ग्राहकों की चिंता।

लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसीज के मैच्योर होने से पहले ही पॉलिसीधारकों द्वारा उन्हें सरेंडर करने के बढ़ते चलन ने भारतीय रिजर्व बैंक की चिंता बढ़ा दी है। केंद्रीय बैंक की नवीनतम फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट के अनुसार, बीमा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा जा रहा है, जहाँ पॉलिसी सरेंडर और निकासी की कुल राशि अब मैच्योरिटी पर मिलने वाले भुगतानों के आंकड़े को पार कर गई है। यह रुझान न केवल बीमा धारकों के असंतोष को दर्शाता है, बल्कि वित्तीय बाजार के लिए भी एक चेतावनी है।

क्या आपकी इंश्योरेंस पॉलिसी सुरक्षित है? आरबीआई की चेतावनी ने बढ़ाई ग्राहकों की चिंता।

इस स्थिति का विश्लेषण करते हुए रिपोर्ट बताती है कि साल 202526 में कुल भुगतान में सरेंडर और निकासी का हिस्सा बढ़कर लगभग 38.3 प्रतिशत हो गया है, जबकि मैच्योरिटी बेनिफिट्स का आंकड़ा 36.9 प्रतिशत पर सिमट गया है। साल 202122 में लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा कुल 5 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था, जो 202526 तक बढ़कर 7.3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। वित्तीय वर्ष 2025 में ही उद्योग ने 6.3 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया, जिसमें से 2.3 लाख करोड़ रुपये सरेंडर और निकासी के मद में गए, जबकि 2.2 लाख करोड़ रुपये मैच्योरिटी बेनिफिट्स के लिए दिए गए।

यह असंतुलन पॉलिसीधारकों की असंतुष्टि, प्रोडक्ट की गलत बिक्री या अन्य वित्तीय साधनों से मिल रहे प्रतिस्पर्धात्मक दबाव की ओर इशारा करता है। विशेष रूप से, निजी क्षेत्र की इंश्योरेंस कंपनियों के मामले में कमीशन अनुपात में वित्तीय वर्ष 2022 के बाद से लगभग दोगुनी बढ़ोतरी देखी गई है। डिस्ट्रीब्यूशन की बढ़ती लागत और एक्विजिशनकॉस्ट के कारण मिससेलिंग का जोखिम और अधिक गहरा गया है।

मैच्योरिटी से पहले पॉलिसी से बाहर निकलने का यह सिलसिला एसेटलायबिलिटी मैनेजमेंट को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। लाइफ इंश्योरेंस कंपनियां लंबी अवधि के निवेश पर अपनी स्ट्रैटेजी बनाती हैं, लेकिन जब बड़ी संख्या में लोग समय से पहले पॉलिसी सरेंडर करते हैं, तो ये अनुमान गड़बड़ा जाते हैं। इससे कंपनियों को समय से पहले अपने एसेट्स बेचने पड़ सकते हैं, जो बाजार की स्थिरता के लिए चुनौतीपूर्ण है।

इस स्थिति को सुधारने के लिए इंश्योरेंस रेगुलेटर, आईआरडीएआई सक्रिय है। आईआरडीएआई के चेयरमैन अजय सेठ ने लाइफ इंश्योरेंस काउंसिल के एक कार्यक्रम में स्पष्ट किया कि रेगुलेटर प्रोडक्ट की उपयुक्तता से जुड़े मुद्दों को हल करने के लिए डिस्ट्रीब्यूशन प्रणाली में सुधार पर काम कर रहा है। नियामक का मुख्य जोर इस बात पर है कि पॉलिसीधारकों को बेनिफिट्स मिलने की प्रक्रिया को पूरी पारदर्शिता और सरलता के साथ समझाया जाए, ताकि ग्राहक समझदारी से निवेश का निर्णय ले सकें और पॉलिसी के साथ लंबे समय तक बने रहें। वर्तमान में, नियामक और बीमा कंपनियों के बीच इस बात पर चर्चा जारी है कि कैसे सरेंडर रेट को कम किया जाए और पॉलिसीधारकों का विश्वास बहाल किया जाए।

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