जियो आईपीओ लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आ रहा है. इस आईपीओ के प्रोसेस से जुड़े लोगों के अनुसार रिलायंस इंडस्ट्रीज अपनी टेलीकॉम और डिजिटल वेंचर जियो प्लेटफॉर्म्स की लिस्टिंग के तरीके में बदलाव कर रही है. पहले ‘ऑफर फॉर सेल’ का प्लान था, लेकिन मौजूदा निवेशकों के साथ कीमत को लेकर मतभेद होने के कारण अब इसे पूरी तरह से ‘फ्रेश इश्यू’ में बदला जा रहा है. मार्केट शेयर के हिसाब से भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी, जो एक बड़े ‘इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग’ की तैयारी कर रही है, पिछले एक महीने से ज्यादा समय से ग्लोबल टेक कंपनियों, सॉवरेन वेल्थ फंड्स और प्राइवेट इक्विटी निवेशकों के साथ इस अरबों डॉलर के इश्यू की बनावट और कीमत को लेकर बातचीत कर रही है.

ओएफएस पर क्यों नहीं बन रही बात?
शेयरहोल्डर्स चाहते हैं कि IPO की कीमत एकदम सही रखी जाए, यानी शेयरों को ऊंचे प्राइस बैंड पर बेचा जाए, लेकिन, रिलायंस का मानना है कि अगर लिस्टिंग के दिन शेयरों की कीमत गिरती है, तो इससे छोटे निवेशकों को नुकसान हो सकता है. ईटी की रिपोर्ट में प्रोसेस से जुड़े लोगों में से एक ने कहा कि इसमें हितों का एक अंदरूनी टकराव है, जो सिर्फ जियो के मामले में ही देखने को मिल रहा है.
उन्होंने कहा कि शेयरहोल्डर्स चाहते हैं कि इश्यू की कीमत जितनी हो सके, उतनी ज्यादा रखी जाए. लेकिन इससे दो तरह के जोखिम पैदा होते हैं. पहला यह कि इश्यू इतना बड़ा हो सकता है कि बाज़ार उसे पूरी तरह से संभाल न पाए. दूसरा रिस्क यह है कि लिस्टिंग कमजोर रहने की पूरी संभावना है, जिसका सीधा असर छोटे निवेशकों पर पड़ेगा.
ईटी की रिपोर्ट में जानकार दूसरे व्यक्ति ने बताया कि प्रमोटर का रुख शुरू से ही एक जैसा रहा है. उन्होंने कहा कि मुकेश अंबानी की पहली प्राथमिकता हमेशा से ही छोटे निवेशकों के हितों की रक्षा करना रही है. उन्होंने आगे कहा कि लिस्टिंग के बाद शेयर की कीमत में बढ़ोतरी की गुंजाइश जरूर होनी चाहिए. इसलिए, अब RIL ने यह तय किया है कि लिस्टिंग के बाद शेयर की कीमत बाजार खुद तय करेगा, और अगर प्राइवेट इक्विटी निवेशक चाहें, तो वे बाद में ओपन मार्केट में अपने शेयर बेच सकते हैं.
कहां खर्च होगा पैसा?
‘फ्रेश इश्यू’ के जरिए मिलने वाला सारा पैसा सीधे कंपनी के पास जाएगा, और मौजूदा सभी निवेशकों की शेयरहोल्डिंग में उसी रेश्यो में कमी आएगी. एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि इस पैसे में से लगभग 25,000 करोड़ रुपए का इस्तेमाल कर्ज चुकाने के लिए किया जा सकता है, और बाकी बचे पैसों का इस्तेमाल जरूरत के हिसाब से दूसरे कामों के लिए किया जा सकता है.
अगर ‘फ्रेश इश्यू’ को ज्यादा सावधानी भरा प्राइस बैंड देकर जारी किया जाता है, तो इसका मतलब होगा कि Jio का वह वैल्यूएशन —जो पहले 133154 अरब डॉलर बताया गया था—अब उससे कम हो जाएगा. इसका एक और मतलब यह भी होगा कि रिलायंस की जियो में मौजूदा 67 फीसदी हिस्सेदारी में कमी आएगी , जबकि ओएफएस प्लान के तहत ऐसा नहीं होता.
हालांकि, लोगों का कहना है कि रिलायंस इस प्लान से सहमत है. लोगों ने बताया कि जियो से उम्मीद है कि वह अगले एक हफ्ते या पंद्रह दिनों के अंदर सेबी के पास अपना ड्राफ़्ट प्रॉस्पेक्टस जमा कर देगा, जिससे लिस्टिंग की डेडलाइन में लगभग एक महीने की देरी हो सकती है और यह जुलाई तक जा सकती है. हालांकि, हालात के हिसाब से इन डेडलाइंस में और बदलाव हो सकते हैं.
मार्च में, कंपनी ने एक ओएफएस का प्लान बनाया था, जिसमें उसके 14 इक्विटी निवेशकों में से हर कोई अपनी होल्डिंग का 88.5 फीसदी हिस्सा कम करने की बात कही गई थी. इससे इक्विटी में लगभग 2.8 फीसदी की कमी आने का अनुमान लगाया गया था. किसी भी शेयरहोल्डर ने पूरी तरह से बाहर निकलने का फैसला नहीं किया था.
क्या है ग्रोथ का रास्ता?
साल 2020 में, जियो प्लेटफॉर्म्स ने एक तेज फंडरेजिंग राउंड में 13 ग्लोबल निवेशकों से 1.5 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम जुटाई थी. इन निवेशकों में गूगल, मेटा, सऊदी अरब का पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड, विस्टा इक्विटी, केकेआर, सिल्वरलेक, जनरल अटलांटिक, अबुधाबी इंवेस्टमेंट अथॉरिटी, टीपीजी, एल काटरटन, इंटेल कैपिटल और क्वालकम वेंचर्स शामिल थे. ये डील भारत के कॉर्पोरेट हिस्ट्री के सबसे बड़ी डील्स में से थी. इन्होंने जियो प्लेटफॉर्म्स को पूरी तरह से कर्जमुक्त बनाने में मदद की. तब से, कंपनी ने 5G, ब्रॉडबैंड, डिजिटल सर्विसेज और एंटरप्राइज सॉल्यूशंस के क्षेत्र में अपना विस्तार किया है. आगे चलकर, कंपनी का विकास होम ब्रॉडबैंड, एंटरप्राइज सर्विसेस, एआई इंफ्रस्ट्रक्चर और डीपटेक क्षमताओं जैसे उभरते हुए क्षेत्रों के साथसाथ 5जी और सैटेलाइट कनेक्टिविटी पर निर्भर करेगा.



