
Puttaraj Bhimanur NEET Success Story: कर्नाटक के पुट्टाराज भीमनूर ने आर्थिक तंगी, भेड़ें चराने और खेतों में काम करने के बावजूद देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक नीट यूजी 2026 में 511 अंक हासिल किए हैं. उन्होंने यह मुकाम दूसरे प्रयास में हासिल किया है. पहले प्रयास में उन्हें 390 मार्क्स मिले थे.
Puttaraj Bhimanur NEET Success Story: जीवन में सफलता केवल अच्छे संसाधनों से नहीं, बल्कि मजबूत इरादों और लगातार मेहनत से मिलती है. कर्नाटक के एक छोटे से गांव के रहने वाले पुट्टाराज भीमनूर ने यहा साबित कर दिखाया है. आर्थिक तंगी, सीमित सुविधाएं और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने नीट यूजी 2026 में शानदार प्रदर्शन कर डॉक्टर बनने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है. उनकी कहानी उन लाखों छात्रों के लिए प्रेरणा है, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने सपनों को जिंदा रखते हैं.
छुट्टियों पढ़ाई के साथ उठाई परिवार की जिम्मेदारी
कर्नाटक के कोप्पल जिले के हनुमानहल्ली गांव के रहने वाले पुट्टाराज सरकारी स्कूल में पढ़े हैं. छुट्टियों के दौरान जब दूसरे बच्चे आराम करते थे, तब वह भेड़-बकरियां चराते, खेतों में काम करते और अपने पिता के साथ बोरवेल व मोटर की मरम्मत में मदद करते थे. घर के काम पूरे करने के बाद ही वह पढ़ाई के लिए समय निकालते थे.
एक साल की मेहनत ने बदल दी किस्मत
पुट्टाराज ने नीट यूजी 2025 में भी परीक्षा दी थी, लेकिन 390 अंक मिलने के कारण उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट नहीं मिल सकी. वहीं, प्राइवेट कॉलेज की फीस परिवार के लिए संभव नहीं थी. ऐसे में उन्होंने हार मानने के बजाय एक साल तक दोबारा तैयारी की. ऑनलाइन पढ़ाई और रेगुलर प्रैक्टिस के दम पर उन्होंने इस बार 511 अंक हासिल किए. उन्हें SC कैटेगरी में ऑल इंडिया रैंक 694 और ओवरऑल ऑल इंडिया रैंक करीब 76 हजार मिली है.
पढ़ाई में हमेशा रहे अव्वल
पुट्टाराज बचपन से ही पढ़ाई में अच्छे रहे हैं. उन्होंने 10वीं में 96 प्रतिशत और 12वीं में 98 प्रतिशत अंक हासिल किए हैं. पढ़ाई के साथ-साथ परिवार की जिम्मेदारियां निभाना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया. उनका सपना हमेशा डॉक्टर बनकर लोगों की सेवा करना रहा है.
सोलर लैंप की रोशनी में की तैयारी
पुट्टाराज के गांव में बिजली की सुविधा सीमित है. परिवार के अनुसार, कई बार उन्हें रात में सोलर लैंप की रोशनी में पढ़ाई करनी पड़ती थी. वह रोज सुबह जल्दी उठकर पढ़ाई करते और फिर घर व खेत के काम में लग जाते. कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनका आत्मविश्वास कभी कम नहीं हुआ.
पूरा परिवार बना ताकत
उनके पिता शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं और मोटर रिपेयर का काम करते हैं, जबकि मां कभी स्कूल नहीं जा सकीं. परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद माता-पिता ने बच्चों की पढ़ाई को हमेशा प्राथमिकता दी. वहीं, बड़े भाई ने परिवार की जिम्मेदारी संभालने के लिए पढ़ाई छोड़ दी, ताकि पुट्टाराज अपना सपना पूरा कर सकें.
टीचर्स ने भी दिया पूरा साथ
कॉलेज के प्रिंसिपल ने पुट्टाराज की प्रतिभा को देखते हुए उनकी फीस माफ कर दी थी. उनका कहना है कि पुट्टाराज रोज 8 से 10 घंटे पढ़ाई करते थे और हमेशा सीखने के लिए तैयार रहते थे. आज उनकी सफलता यह संदेश देती है कि अगर मेहनत ईमानदारी से की जाए, तो गरीबी और कठिनाइयां भी मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकतीं.



