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24 साल बाद मिला इंसाफ: लखनऊ बार के पूर्व अध्यक्ष इंद्र देव सिंह हत्याकांड में 3 दोषियों को उम्रकैद|

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की एक विशेष अदालत ने 24 वर्ष पुराने एक बहुचर्चित मामले में फैसला सुनाते हुए तीन दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। यह मामला लखनऊ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और नोएडा पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह के पिता अधिवक्ता इंद्र देव सिंह की हत्या से जुड़ा है। अदालत द्वारा सुनाई गई इस सजा ने दो दशकों से अधिक समय से चले आ रहे कानूनी संघर्ष को एक निर्णायक मोड़ दिया है।

24 साल बाद मिला इंसाफ: लखनऊ बार के पूर्व अध्यक्ष इंद्र देव सिंह हत्याकांड में 3 दोषियों को उम्रकैद|

घटना का विवरण वर्ष 2002 का है, जब आठ अगस्त की दोपहर अधिवक्ता इंद्र देव सिंह अपनी दिनचर्या के अनुसार अदालत से स्कूटर पर सवार होकर घर लौट रहे थे। तभी जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय के समीप घात लगाए हमलावरों ने उन पर गोलीबारी कर दी, जिससे उनकी दुखद मृत्यु हो गई। इस हत्याकांड के बाद उनकी पत्नी नयनतारा ने प्राथमिकी दर्ज कराई, जिसके उपरांत मामले की जांच पुलिस और बाद में सीबीआई को सौंपी गई। लंबी जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि इस हत्या के पीछे एक आपराधिक साजिश थी।

विशेष न्यायाधीश वायु नंदन मिश्रा ने मामले की गंभीरता को देखते हुए साक्ष्यों के आधार पर विक्रम यादव उर्फ कालिया, पन्ना सिंह और ब्रजेश कुमार यादव उर्फ मुन्ना को हत्या और आपराधिक साजिश का दोषी पाया। अदालत ने इन तीनों दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई और प्रत्येक पर 30,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि इस मामले में नामित अन्य आरोपी, जो कथित साजिशकर्ता के रूप में चिन्हित थे, उनकी मुकदमे की कार्यवाही के बीच मृत्यु हो गई थी। अदालत ने 30 जून को ही इन तीनों को दोषी करार दे दिया था, जिसके बाद उनकी जमानत रद्द कर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।

मामले के दौरान सीबीआई अभियोजन पक्ष ने शिकायतकर्ता नयनतारा के अधिवक्ता के सहयोग से पुख्ता साक्ष्य पेश किए। सीबीआई जांच में यह तथ्य सामने आया कि विक्रम यादव ने मुख्य शूटर की भूमिका निभाई थी, जबकि ब्रजेश कुमार उस स्कूटर पर सवार था जिसका इस्तेमाल वारदात को अंजाम देने के लिए किया गया था। इस मामले ने एक ओर जहां कानून के शासन को पुनः स्थापित किया है, वहीं दूसरी ओर एक परिवार के लंबे इंतजार को न्याय की परिणीति तक पहुंचाया है। 24 वर्षों की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत का यह फैसला न्याय व्यवस्था की दृढ़ता को प्रदर्शित करता है।

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