भारतीय राजनीति में जब भी कोई बड़ा मुद्दा गरमाता है, तो कैमरों की चकाचौंध से दूर हो चुके और राजनीतिक रूप से हाशिये पर जा चुके नेताओं की उम्मीदें अचानक हिलोरे मारने लगती हैं. ताजा उदाहरण अयोध्या चढ़ावा चोरी प्रकरण का है. श्रद्धा, आस्था और सुरक्षा से जुड़े इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर जहां एक तरफ जांच एजेंसियां अपना काम कर रही हैं.

वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे ‘आउटडेटेड’ चेहरे भी सक्रिय हो गए हैं, जो लंबे समय से मुख्यधारा की राजनीति में अपनी ज़मीन खो चुके हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि इन नेताओं के लिए यह प्रकरण जनसरोकार का विषय कम, और खुद को दोबारा प्रासंगिक बनाने का एक सुनहरा अवसर ज़्यादा बन गया है.
मुद्दे की आड़ में ‘कमबैक’ की छटपटाहट
राजनीति का एक क्रूर नियम है—’जो दिखता है, वो बिकता है.’ जो नेता पिछले कई चुनावों से जनता द्वारा नकारे जा चुके हैं या अपनी ही पार्टियों में दरकिनार कर दिए गए हैं, उनके लिए जैसा नाम एक बहुत बड़ा ‘लाउडस्पीकर’ है. टीवी डिबेट्स में जगह पाने और सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने के लिए ऐसे नेता इस प्रकरण पर तीखे और विवादास्पद बयान दे रहे हैं.
आस्थावान जनता की भावनाओं को भड़का कर या उनके पक्ष में खड़े होने का नाटक करके, ये नेता अपनी खोई हुई साख को वापस पाने की छटपटाहट में हैं. यह अलग बात है कि इस प्रक्रिया में उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि उनके बयान करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों की आस्था को रौंद रहे हैं.
आलोक चंद्रा,पूर्व मुख्य प्रशासनिक अधिकारी, भारतीय प्रबंध संस्थान, कोलकाता
वास्तविक चिंता या सिर्फ़ फोटोऑपर्च्यूनिटी?
यह सर्वविदित है कि जब कोई ऐसा मुद्दा उठता है, तो जमीन पर काम करने वाले संगठन और वर्तमान जनप्रतिनिधि उस पर कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई की मांग करते हैं, जो हो भी रही है. योगी सरकार द्वारा गठित एसआईटी प्रकरण की जांच कर रही है. कई आरोपी जेल भेजे जा चुके हैं और मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा है.
लेकिन, ऐसे मौकों पर अलगथलग पड़े इन आउटडेटेड नेताओं का तरीका थोड़ा अलग होता है. इनका ध्यान समाधान खोजने से ज़्यादा धरनाप्रदर्शन की तस्वीरों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर बयानों की धुंआधार बौछार करने पर होता है. अयोध्या और राम मंदिर से करोड़ों लोगों की गहरी भावनाएं जुड़ी हैं. ऐसे में इस संवेदनशील विषय पर राजनीति करना सीधे तौर पर जनभावनाओं का फायदा उठाने की कोशिश के सिवा कुछ नहीं कहा जा सकता.
अब ‘स्मार्ट’ हो चुकी है जनता
इन नेताओं को शायद यह गलतफहमी है कि जनता अयोध्या या भगवान श्रीराम के प्रति उनकी इस ‘अचानक जागी’ श्रद्धा को समझ नहीं पा रही है. आज का वोटर बेहद जागरूक है. वह भलीभांति जानता है कि जो नेता जनता के सुखदुख के समय दिखाई नहीं देते, राष्ट्रवाद को चोट पहुंचाने वाले गंभीर मुद्दों पर चुप्पी साध लेते हैं, वे अचानक किसी विवाद के आते ही कैमरों के सामने क्यों प्रकट हो जाते हैं.
चढ़ावा चोरी प्रकरण निश्चित रूप से कानून के दायरे में एक अपराध है और इसके लिए दोषियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए. लेकिन इस मुद्दे की आड़ में अयोध्या धाम को बदनाम करने, करोड़ों रामभक्तों की भावनाओं व आस्था को चोट पहुंचाने का काम करना उन नेताओं के मानसिक दिवालियापन को दर्शाता है, जिनके पास जनता के बीच जाने के लिए अब कोई ठोस विज़न या नीति नहीं बची है और जो चढ़ावा प्रकरण को अपना रीलांचपैड समझने की भूल कर रहे हैं.
बहुसंख्य जनता के लिए अप्रासंगिक हो चुके इन नेताओं के लिए अयोध्या का यह प्रकरण ‘सियासी संजीवनी’ की तरह दिखाई जरूर दे सकता है, लेकिन रेत पर महल बनाने वाले कभी टिकाऊ राजनीति नहीं कर पाते. जनता तमाशा और सरोकार का अंतर समझती है. यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुद्दे पर घड़ियाली आंसू बहाकर अपनी ज़मीन तलाश रहे इन नेताओं को भविष्य की कोख से क्या नसीब होता है. बाकी इतिहास ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिसमें जनआस्था व भावनाओं से खिलवाड़ करने वालों को खुद इतिहास के पन्नों में सिमट जाना पड़ा.


