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अहिंसा का रास्ता छोड़ा, बंदूक उठाई, चंद्रशेखर आजाद ने कैसे अंग्रेजों की नींद उड़ाई?

तब वे महात्मा गांधी के रास्ते थे. सिर्फ 15 साल की उम्र में सत्याग्रह करते हुए बंदी बनाए गए. जेल में 15 कसूरी बेंतों की सख्त सजा कुबूल की. लेकिन साल भर बाद उनका महात्मा गांधी से मोहभंग हुआ. बेशक मंजिल वही थी. लेकिन अब वे संघर्ष की क्रांतिकारी धारा के साथसाथ काकोरी एक्शन में सक्रिय भूमिका निभाई. क्रांतिकारी दल के अगुवा के तौर पर युवाओं को जोड़ा. सहानुभूतिसमर्थन बहुतों का था. लेकिन लोग मदद से लोग डरते थे. हथियार ही नहीं खाने का इंतजाम भी बेहद मुश्किल था. विकट चुनौतियों बीच चंद्रशेखर आजाद और उनके साथी मौत से खेलते हुए अंग्रेजी हुकूमत को झकझोरते रहे.

आजादी का उनका सपना जीते जी सच नहीं हो सका. लेकिन जीते जी उन्हें पुलिस हाथ नहीं लगा सकेगी, इस संकल्प को सच करके उन्होंने दिखा दिया. आजादी के अवसर पर पढ़िए आजाद से जुड़े रोमांचक प्रसंग.

जेलर के मुंह पर फेंके वे तीन आने

अंग्रेजी राज के जेलों में बेंत की सजा कैसी होती थी? इसे भुक्तभोगी क्रांतिकारियों से बेहतर कौन बता सकता था? आजाद के साथी विश्वनाथ वैशंपायन ने लिखा, “जो मेहतर कसूरी बेंत मारता था, उसे उस दिन जेल से एक सेर दूध मिलता था. बेंत गंदे पानी में भीगता रहता था. कैदी को टिकटी से बांध दिया जाता था. कैदी के नितंब पर झीना सा कपड़ा रहता था. मेहतर पूरी ताकत से बेंत मारता था. जेल के अफसर मौजूद रहते. अक्सर बेंत की सजा पाने वाले दर्द तकलीफ भुलाने के लिए गांजा चरस का नशा किए रहते. सजा के बाद उनके खून रिसता और कई दिनों तक वे पेट के बल पड़े रहते.” लेकिन सत्याग्रह करते हुए 1921 में बंदी बनाए गए 15 साल के चंद्रशेखर आजाद ने भारत माता की जय और वन्देमातरम के नारे लगाते हुए बेंत की सजा कुबूल की.

चंद्रशेखर आजााद.

सजा के बाद उनके घावों से खून बह रहा था. चूंकि उन्हें सिर्फ बेंत की सजा मिली थी, इसलिए सजा के बाद जेल से बाहर कर दिया गया. वहां से दवा के लिए तीन आने दिए गए. ये पैसे आजाद ने उसी समय जेलर के मुंह पर फेंक दिए थे.

असहयोग आंदोलन की वापसी ने किया गांधी से मोहभंग

चौरीचौरा की हिंसक वारदात के बाद महात्मा गांधी ने 12 फरवरी 1922 को असहयोग आंदोलन वापस ले लिया. इसमें शामिल छात्रोंनौजवानों ने खुद को ठगा महसूस किया. अंग्रेजी सत्ता और गुलामी के बंधनों को उखाड़ फेंकने के लिए आतुर नौजवान संघर्ष के रास्ते की तलाश में थे.

आजाद की किशोरावस्था थी. 1922 में उन्होंने काशी विद्यापीठ में प्रवेश लिया. बंगाल के क्रांतिकारी यहां सक्रिय हो चुके थे. 1923 में वहीं आजाद की प्रणवेश चटर्जी और मन्मथनाथ गुप्त से भेंट हुई. बेंत की सजा के बाद आजाद लोकप्रिय हो चुके थे. प्रणवेश ने उन्हें भरोसे में लिया और हिन्दुस्तान रिपब्लिक असोसिएशन से जोड़ दिया. विडंबना देखिए कि जिन प्रणवेश ने आजाद को क्रांतिकारी संगठन से जोड़ा वही काकोरी काण्ड में गिरफ्तारी बाद पुलिस की यातनाओं से टूट गए. बाद में ग्लानि में प्रणवेश ने खुदकुशी कर ली थी.

काकोरी एक्शन बाद भी पुलिस पकड़ से दूर

असहयोग आंदोलन की वापसी के महात्मा गांधी के फैसले से से देश में निराशा का माहौल था. छात्रयुवा बेचैन थे. क्रांतिकारियों को संघर्ष के लिए हथियार चाहिए थे. इसके लिए धन की जरूरत थी. रेल से जाने वाले सरकारी खजाने को लूटने का फैसला हुआ. 9 अगस्त 1925 के काकोरी एक्शन में शामिल होते समय आजाद सिर्फ 19 साल के थे. धन जुटाने के लिए सरकारी खजाने की यह लूट सीधे ब्रिटिश सत्ता को चुनौती थी. जिन दस क्रांतिकारियों ने, इस एक्शन में सक्रिय महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उनमें आजाद भी शामिल थे. फिर सरकार का दमनचक्र चला. पुलिस ने इस मामले में चालीस क्रांतिकारियों को पकड़ा. सत्रह पर संगीन दफ़ाएं ठोंकी. पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को फांसी पर लटका दिया गया. शेष को काला पानी या अन्य लम्बी सजाएं मिलीं. दो क्रांतिकारी पुलिस को चकमा दे उसकी पकड़ से दूर रहे.वे थे कुंदन लाल गुप्त और चन्द्रशेखर आजाद.

बिस्मिल बाद नेतृत्व की जिम्मेदारी

काकोरी एक्शन की कामयाबी की क्रांतिकारियों को भारी कीमत चुकानी पड़ी थी. बिस्मिल की फांसी के बाद नेतृत्व का संकट था. कई साथी जेल में सजा भुगत रहे थे. तो अनेक फरार थे. सहानुभूति रखने वाले भी क्रांतिकारियों से संपर्कसहयोग के लिए आसानी से तैयार नहीं होते थे. इस चुनौती पूर्ण समय में हिन्दुस्तान रिपब्लिक असोसिएशन का नेतृत्व चंद्रशेखर आजाद के हाथों में आया. आजाद ने सिर्फ पुराने साथियों को ही नहीं बल्कि देश के लिए कुर्बान होने के तैयार नई पौध को भी संगठन से जोड़ा. हथियार ही नहीं खाने तक लिए के पैसे नहीं थे. गाजीपुर के एक महंत से धन मिलने की उम्मीद में दो महीने तक आजाद उनके शिष्य बने रहे. कोई सफलता नहीं मिली. मुश्किल से वहां से आजाद ने पिंड छुड़ाया.

मातापिता रह लें भूखे, क्रांतिकारी साथी न रहें भूखे

आजाद के साथी क्रांतिकारी विश्वनाथ वैशंपायन ने अपनी किताब “अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद” में लिखा है कि जब आजाद के हाथों दल का नेतृत्व आया तो उनके स्वभाव में जमीनआसमान का अंतर आ गया. वे सबकी फिक्र करते रहते थे. साथियों के होटल में भोजन के लिए पैसा देना संभव नहीं था. इसलिए सबेरे प्रति व्यक्ति एक आना नाश्ते के लिए मिलता था. एक समय खाना बनता, जिसमें सिर्फ दाल और रोटी होती थी. दाल बन जाने के बाद दो लोग रोटी सेकते थे. दो साथी खाने को बैठते थे. वे खाकर उठते तो दूसरे साथियों के लिए रोटी बनाते थे. आजाद के मातापिता घोर आर्थिक संकट में थे.1930 में सरदार राम सिंह उनके गांव गए थे.

वापसी में वहां का हाल गणेश शंकर विद्यार्थी को बताया. विद्यार्थी जी ने आजाद को मातापिता के लिए दो सौ रुपए दिए. आजाद ने वे रुपए पार्टी के काम में खर्च कर दिए. किसी अवसर पर विद्यार्थी जी ने आजाद से रुपयों के बारे पूछा. आजाद का उत्तर था, “इस गुलाम देश में लाखों परिवार ऐसे हैं,जिन्हें एक समय भी रोटी नसीब नहीं होती. मेरे मातापिता तो दिन में एक बार भोजन पा भी जाते हैं. वे भूखे रह सकते हैं लेकिन पैसे की वजह से पार्टी के साथियों को भूखे नहीं मरने दूंगा. मेरे माता पिता मर भी जाएं तो देश का कोई नुकसान नहीं होगा. लेकिन जो देश की आजादी के लिए जूझ रहे हैं, उनकी जरूरतों को पूरा करना मेरी पहली जिम्मेदारी है.”

असेंबली विस्फोट से भगत सिंह को रखना चाहा दूर

चन्द्रशेखर आजाद सिर्फ नेतृत्व नहीं करते थे. साथियों से परामर्श, उन्हें मार्गदर्शन के साथ ही एक्शन में भी उनकी सक्रिय हिस्सेदारी रहती थी. काकोरी एक्शन के बड़े नुकसान ने उन्हें सचेत किया था. संगठन नष्ट हो गया था और उसे नए सिरे से उन्हें खड़ा करना पड़ा था. इसलिए 17 दिसंबर 1928 को सांडर्स वध के बाद आजाद ने साथियों को पुलिस की गिरफ्त से बचाने का पुख़्ता इंतजाम किया. अगले दस महीनों तक पुलिस कोई गिरफ्तारी नहीं कर सकी थी. लेकिन क्रांतिकारी कब तक छिपे और खामोश बैठे रहते? जनमानस से जुड़ने के लिए मारो और भागो की जगह वे ऐसा कोई संदेश देना चाहते थे, जिससे लोगों को भरोसा हो सके कि क्रांतिकारियों के पास भविष्य के लिए कोई ठोस योजना और कार्यक्रम है.

8 अप्रेल 1929 को असेम्बली में बम विस्फोट और फिर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा भागने की जगह अपने को गिरफ्तारी के लिए पेश करना इसी परिवर्तित रणनीति का हिस्सा था. हालांकि आजाद नहीं चाहते थे कि इस एक्शन में भगत सिंह शामिल हों. वे गिरफ्तारी देने के भी पक्ष में नहीं थे. लेकिन साथियों और भगत सिंह की जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा. वे जानते थे कि अंग्रेज भगत सिंह को जेल से जिंदा नहीं निकलने देंगे.

पुलिस का कसता घेरा, मदद के सिकुड़ते रास्ते

सांडर्स हत्याकांड में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को फांसी और कई साथियों को कालापानी सहित लंबी सजाओं के ऐलान ने एक बार फिर संगठन को कमजोर कर दिया. इस बीच 23 दिसम्बर 1929 को वायसराय इरविन की ट्रेन पर फेंका गया बम दूसरी बोगी पर गिरा. जेल से भगत सिंह आदि को छुड़ाने की कोशिश नाकाम रही. 28 मई 1930 को बम की तैयारी के दौरान हुए विस्फोट में भगवती चरण बोहरा की दुःखद मृत्यु हो गई. पुलिस की यातनाओं से कुछ साथी टूट गए.आजाद अभी भी पुलिस पकड़ से दूर थे. लेकिन पुलिस के कसते घेरे के बीच आजाद और उनके शेष साथी लाहौर छोड़ने के लिए मजबूर हो गए. क्रांतिकारियों के सामने एक बार फिर काकोरी एक्शन के बाद जैसी स्थिति थी. संगठन के प्रमुख साथी जेल में थे. मदद के रास्ते सिकुड़ते जा रहे थे. पुलिस और नजदीक पहुंच रही थी.

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू. फोटो: Getty Images

आखिरी दिनों में पंडित नेहरू से भेंट

गांधीइरविन पैक्ट के बाद ब्रिटिश सरकार ने अहिंसक आंदोलन के दौरान बंदी बनाए गए कांग्रेस नेताओं कार्यकर्ताओं की रिहाई शुरू की थी. इसी दौरान आजाद ने इलाहाबाद पहुंच कर पंडित जवाहर लाल नेहरू से भी भेंट की थी. नेहरू ने अपनी आत्मकथा में इसका जिक्र किया है. तब तक भगत सिंह और साथियों को फांसी नहीं हुई थी. आजाद ने उनसे जानना चाहा था कि क्या क्रांतिकारियों की रिहाई के बारे में भी सरकार सोचेगी? पंडित नेहरू कोई सकारात्मक उत्तर देने की स्थिति में नहीं थे. आजाद की योजना थी कि पुलिस के दबाव से बचने के लिए वे कुछ दिनों के लिए हिंदुस्तान छोड़ बर्मा चले जाएं और नए सिरे से संगठन खड़ा किया जाए.

सुखदेव.

आजाद थे और आजाद ही रहे

अब बचे दल के भीतर से ही दगाबाज सिर उठा रहे थे और दबाव या लालच में आजाद को गिरफ्तार कराने की फिराक में थे. 27 फरवरी 1931 को सुबह लगभग दस बजे आजाद और सुखदेव राज को इलाहाबाद में अल्फ्रेड पार्क में घुसते समय पुलिया पर एक आदमी दातौन करता दिखा. उसने कुछ ज्यादा ही गौर से आजाद को देखा. सुखदेवराज को खतरे का अंदेशा हुआ. वे उसकी ओर पलटे. लेकिन चतुराई से उसने चेहरा घुमा लिया था. यहीं वे चूके और आजाद के साथ पेड़ के नीचे बैठ गए. पुलिस काम में लगी थी.

इस बार म्योर के सामने से जो व्यक्ति जा रहा था , वह संगठन का साथ छोड़ चुका वीरभद्र था. तभी सामने सड़क पर एक कार रुकी. एक अंग्रेज और दो हिंदुस्तानी सादे कपड़ों में बाहर आये. गोरे ने पिस्तौल तानते हुए अंग्रेजी में सवाल किया, तुम लोग कौन हो? जबाब में आजाद और सुखदेव ने अपनी पिस्तौलें निकालीं. तुरन्त ही गोली चलाई. पर अंग्रेज की पिस्तौल से गोली पहले चल चुकी थी. अंग्रेज की गोली आजाद की जांघ में लगी. आजाद की गोली अंग्रेज के कन्धे में. दोनों ओर से चल रही गोलियों के बीच अंग्रेज ने मौलश्री के पेड़ की आड़ ली. उसके दो साथी नाले में जा छिपे. आजाद और सुखदेव ने जामुन के पेड़ के पीछे हुए. कुछ क्षणों के लिए गोलियां थीं.

आजाद ने सुखदेव से कहा कि मेरी जांघ में गोली लगी है, तुम भागो. सुखदेव समर हाउस की तरफ भागे. सी.आई.डी. के स्पेशल सुपरिटेंडेंट जे.आर.एच.नॉट बाबर और डिप्टी सुपरिटेंडेंट विशेश्वर सिंह की अगुवाई में आजाद की घेरे बन्दी की गई थी. बाबर के कंधे पर गोली लगी. फिर वह अपनी पिस्तौल नही चला सका. विशेश्वर सिंह चेहरे पर गोली लगने के बाद लहूलुहान सड़क की ओर भागते देखे गए. इस बीच वहां और फोर्स पहुंच गई. गोली से घायल आजाद भागने की स्थिति में नही थे. लेकिन अपने संकल्प पर वे अडिग थे.

जीते जी पुलिस उन्हें छू नहीं सकती. अपनी माउजर कनपटी पर रख ट्रिगर दबाया. शहादत का सर्वोच्च रास्ता चुना. भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी में अभी 24 दिन बाकी थे. हमेशा की तरह उनके कमांडर ने अगुवाई की . सिर्फ धरती पर ही नहीं अम्बर के लिए भी. वे आजाद थे, आजाद ही रहे और अमर हो गए.

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