आजादी के संघर्ष के इतिहास में राजगुरु को सरदार भगत सिंह के साथी के तौर पर समेट दिया गया. उनके विषय में जाननेलिखने की कोशिशें भी बहुत कम हुईं. उनका पूरा नाम शिवराम हरि राजगुरु भी कम लोगों को पता है. सरदार भगत सिंह की विराट छाया से अलग एक क्रांतिकारी के तौर पर राजगुरु का कद बहुत बड़ा था. तीसरे दर्जे में पढ़ते समय उन्हें लोकमान्य तिलक का आशीर्वाद यह कहते हुए मिला कि इस खिले कमल देख लगता है कि स्वराज अब दूर नहीं. घर से वे मां से यह कहकर निकले कि समझ लेना एक बेटा देश को दिया. सबकी माता भारत माता की सेवा के लिए जा हूं.

आजाद ने क्रांतिकारी दल से जुड़ने की तकलीफों और जान जाने का खतरा बताया. जवाब दिया कि मौत से नहीं डरता. सांडर्स उनकी गोली से मरा. जिद की कि असेंबली बम कांड में भगत सिंह की जगह उन्हें भेजा जाए. जब फांसी तय थी तो माफी की पेशकश पर भड़क गए. फांसी में भी वे भगत सिंह से पीछे नहीं रहना चाहते थे. उस दौर के जेन जेड के युवा थे जिन्होंने छोटी सी जिंदगी का हर पल देश के लिया जिया और देश के लिए ही मरे. सपना देश को आजाद देखने का था. उनका नाम लोगों को रहेगा याद इसका कहां था उन्हें अरमान !
बचपन में लोकमान्य तिलक का आशीर्वाद
पूना के नजदीक खेड़ गांव में 24 अगस्त 1908 को जन्मे शिवराम हरि अभावों के बीच पलेबढ़े. पिता हरि नारायण का साया सिर्फ छह साल की उम्र में उठ गया. माता पार्वती देवी और बड़े भाई दिनकर के जिम्मे वे उनके अलावा तीन बहनें भी थीं. राजगुरु की उपाधि उनके पुरखों को शिवाजी महाराज के पौत्र छत्रपति शाहू जी महाराज से प्राप्त हुई थी. तीसरे दर्जे में पढ़ते समय लोकमान्य तिलक की यश गाथाएं उन्होंने सुन रखी थी. सौभाग्य से तिलक उनके गांव आए. शिवराम उनका भाषण अगली कतार में बैठ सुनते कुछ समझने की कोशिश करते रहे. भाषण के बाद तिलक जिस कमरे में रुके थे, उसके बाहर पहुंच उनसे मिलने की जिद ठान ली.
लोकमान्य तिलक.
वालंटियर इस छोटे से बच्चे को घर जाने को कह रहे थे और वह वापसी को तैयार नहीं था. आवाज सुन तिलक ने भीतर बुला लिया. शिवराम ने चरण छुए. तिलक ने पीठ थपथपाते हुए कहा , यह बालक निर्भीकसाहसी है. इस खिले कमल को देख लगता है कि स्वराज अब दूर नहीं है. आशीर्वाद स्वरूप अपने गले में पड़ी एक माला उन्होंने उसे पहना दी.
किशोरावस्था में क्रांति पथ पर
शिवराम हरि राजगुरु तब सिर्फ 11 साल के थे , जब 13अप्रैल 1919 को जालियांवाला का निर्मम संहार हुआ. छोटा सा बालक इसे सुन विचलित हुआ था. तिलक की हुंकार, चाफेकर बंधुओं और महादेव रानाडे की बलिदान कथाओं को सुनते उसके मन में अंग्रेजों के प्रति गुस्सा पनप रहा था. अब उसका मन स्कूल की पढ़ाई में नहीं लग रहा था. सरकारी नौकरी कर रहे बड़े भाई दिनकर ने कहा या तो ढंग से पढ़ो या घर छोड़ो.
सोलह साल की उम्र में राजगुरु कहने के लिए संस्कृत के अध्ययन के लिए बनारस पहुंचे. पर उनकी तलाश कुछ दूसरे रास्ते की थी. वहां रोटी का संकट विकट था. लेकिन उन मुश्किलों के बीच भी वे हिम्मत नहीं हारे. यहीं श्रीराम बलवंत सांवरगांवकर से उनकी भेंट हुई और दोनों क्रान्तिकारी दल में शामिल होने की कोशिशों में लग गए. वीर सावरकर के भाई बाबा राव सावरकर की सहायता से सांवरगांवकर की चंद्रशेखर आजाद से बनारस में भेंट हुई. आजाद ने उसे आश्वस्त किया कि उसके लायक काम निकलने पर बतायेंगे. राजगुरु को जब इसकी जानकारी हुई तो वे आजाद से भेंट के लिए व्यग्र हो गए.
राजगुरु.
मौत से नहीं डरता
राजगुरु को आजाद से भेंट के लिए कानपुर जाना पड़ा था. अनिल वर्मा ने काफी शोध पश्चात लिखी अपनी किताब ” अजेय क्रांतिकारी राजगुरु” में इस मुलाकात के विषय में लिखा है कि क्रांतिकारी वैशम्पायन उन्हें बनारस से कानपुर लाये थे. आजाद ने राजगुरु से कहा था कि जानते हो क्रांतिकारी दल में शामिल होने का नतीजागोली, कालापानी या फांसी? राजगुरु का बेखौफ जवाब था कोई परवाह नहीं.
आजाद ने राजगुरु से उनके गुणदोष पूछे. जवाब था कसरत का बहुत शौक है. लड़ने के लिए और किसी को मारने के लिए मुझे सबसे आगे किया जा सकता है. लाठीचाकू में पारंगत हूं. निशानेबाजी का अभी अभ्यास नहीं है. कुछ न हो तो पटक कर मार सकता हूं. दोचार दिन बिना खाने के और उतने ही दिन पत्तियां चबाकर रह सकता हूं. और कमजोरी? नींद बहुत आती है. यहां तक कि चलतेफिरते और खड़ेखड़े सो सकता हूं.
सबकी माता भारतमाता की सेवा में
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक आर्मी के सदस्य राजगुरु का साथियों के लिए नाम “रघुनाथ ” था. मां को वे चिट्ठी भेज चुके थे, ” तुम्हारे दो पुत्र हैं दिनकर और शिवराम . मैं अब सभी माताओं की माता भारत माता की सेवा करना चाहता हूं . तुम दुःखी न होना. यह सोच लेना कि दिनकर ही तुम्हारा एक बेटा है. क्या तुम्हें यह मंजूर है. अगर तुम मंजूर कर लोगी तो मुझे बहुत शांति मिलेगी. मैं अब लौटकर आने वाला नहीं हूं.” अगले दिनों में राजगुरु संगठन के हर एक्शन में आगे रहने की पेशकश करते रहे. साइमन कमीशन के विरोध में प्रदर्शन की अगुवाई कई रहे लाला लाजपत राय की लाठियों से निर्मम पिटाई और इसके अठारह दिन बाद 17 नवंबर 1928 को उनकी मौत को क्रांतिकारियों ने देश के सम्मान पर प्रहार से जोड़ा. प्रतिशोध की कसम खाई.
सांडर्स के सीने में राजगुरु की पिस्टल की गोली
ठीक एक महीने बाद 17 दिसंबर 1928 को क्रांतिकारी लाला जी की मौत के जिम्मेदार एस. एस.पी.जे.सी. स्कॉट के सफाये के लिए निकले थे. लेकिन पहचान की चूक से असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट जे.पी. सांडर्स के सीने में गोली धंसी. यह अचूक निशाना राजगुरु का था. हालांकि बाद में जब साथियों ने राजगुरु के निशाने की तारीफ की तो उन्होंने कहा रहने दो. मैं तो सिर पर गोली मारना चाहता था. इस कांड ने ब्रिटिश हुकूमत को झकझोर दिया था.
चप्पेचप्पे पर पुलिस तैनात थी. 20 दिसंबर को पौ फटने से पहले लाहौर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर फेल्ट हैट और ओवरकोट में बाएं बाजू से बच्चे को संभाले एक नौजवान और साथ में हाई हील की सैंडिल में सुंदर युवती दाखिल हुए. पीछे था पुरानी दरी के बिस्तर को समेटे एक नौकर जिसने अर्दलियों जैसा पाजामाकोट पहन और कमर में अंगोछा लपेट रखा था. पुलिस को चकमा देते हुए दंपत्ति पहले दर्जे के डिब्बे में दाखिल हुए. यह भगत सिंह और दुर्गा भाभी थे. तीसरे दर्जे के डिब्बे में नौकर गया. वह राजगुरु थे.
अदालत से जेल तक पुलिस से सबसे ज्यादा पिटे
सांडर्स कांड में फरारी के दिनों में जब असेंबली में बम विस्फोट और फिर गिरफ्तारी देने का संगठन ने फैसला किया तो राजगुरु की जिद थी कि भगत सिंह की जगह उन्हें यह मौका दिया जाए. हालांकि यह मुमकिन नहीं हुआ. 30 सितंबर 1930 को राजगुरु की पूना में गिरफ्तारी हुई. इसी साल 18 अक्टूबर को लाहौर के बोस्टरल में वे बंदी भगत सिंह और अन्य साथियों के बीच पहुंच गए.
जेल की कुव्यवस्था के विरोध में चली भूख हड़ताल के दौरान डॉक्टर की जबरिया दूध पिलाने की कोशिश में नली पेट की जगह फेफड़े में पहुंच गई. फिर राजगुरु की हालत बहुत बिगड़ गई और वह मरने से बचे. अदालती कार्यवाही के बहिष्कार और नारेबाजी के दौरान अदालत से जेल तक राजगुरु सबसे ज्यादा पिटते रहे. स्पेशल ट्रिब्यूनल के फैसले के पहले ही राजगुरु अपने लिए फांसी की सजा तय बता चुके थे. 7 अक्टूबर 1930 को अदालत ने जब भगत सिंह और सुखदेव के साथ फांसी का ऐलान किया तो राजगुरु हंस पड़े.
हम युद्धबंदी, उड़ा दो गोली से
भगत सिंह से बेहद प्यार करने वाले राजगुरु शहादत के सवाल पर उनसे पीछे नहीं रहना चाहते थे. फांसी की तारीख नजदीक आ रही थी. देश उबल रहा था. सारी कोशिशें नाकाम हो चुकी थीं. आखिरी दौर में भगत सिंह के मित्र वकील प्राणनाथ मेहता ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के सामने दया याचिका का प्रस्ताव किया. राजगुरु और सुखदेव बिफर पड़े. लेकिन भगत सिंह ने उन्हें इशारे से संयत किया. मेहता ने कहा, मेरे दोस्तों मुझे गलत न समझो. हम ऐसी कुछ नहीं करेंगे जिससे तुम लोगों की बहादुरी पर बट्टा लगे. 19 मार्च 1931 को मेहता जब याचिका का ड्राफ्ट लेकर पहुंचे तो भगत सिंह ने हंसते हुए कहा, यार इसे रहने दो. असल में देर ठीक नहीं थी. इसलिए हमने पंजाब गवर्नर को पत्र भेज दिया है. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के उस पत्र में लिखा था,
“हमारे विरुद्ध सबसे बड़ा आरोप लगाया गया है कि हमने सम्राट पंचम के विरुद्ध युद्ध किया है. अदालत के फैसले से दो बातें साफ हैं कि अंग्रेज जाति और भारत की जनता के बीच एक संघर्ष चल रहा है. दूसरी यह कि निश्चित रूप से इस युद्ध में हमने भाग लिया है. अतः हम युद्धबंदी हैं. इसलिए हमारे साथ युद्धबंदियों जैसा व्यवहार किया जाए और फांसी के बदले गोली से उड़ा दिया जाए. कृपया हमें गोली से उड़ाने के लिए सैनिकों की एक टोली भेजें.”



