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​राज्यसभा चुनाव की तरह विधानसभा में भी क्या BJP अपनाएगी ‘नो रिपीट’ फॉर्मूला?

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा टिकट बंटवारे ने कई विधायकों की बेचैनी बढ़ा दी है. राज्यसभा के लिए बीजेपी ने जिन 8 चेहरों को मैदान में उतारा, उनमें किसी मौजूदा राज्यसभा सांसद को दोबारा मौका नहीं दिया गया. पार्टी ने संगठन से जुड़े नेताओं, नए चेहरों और अलगअलग सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों का चयन किया. यही फैसला अब बीजेपी के मौजूदा विधायकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है. सवाल यह है कि क्या राज्यसभा में दिखा नो रिपीटका फॉर्मूला विधानसभा टिकट में भी दिखाई देगा?

​राज्यसभा चुनाव की तरह विधानसभा में भी क्या BJP अपनाएगी ‘नो रिपीट’ फॉर्मूला?

राज्यसभा की लिस्ट में क्या संदेश?

बीजेपी ने उत्तर प्रदेश से धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार को उम्मीदवार बनाया है. इन आठों नामों में कोई भी मौजूदा राज्यसभा सांसद नहीं है. यानी इस बार पार्टी ने उच्च सदन में अपने पुराने सांसदों को रिपीट करने के बजाय नए चेहरों को मौका दिया है. उम्मीदवारों की सामाजिक संरचना में भी OBC, दलित, ब्राह्मण और ठाकुर प्रतिनिधित्व का संतुलन दिखाई देता है.

अगला नंबर किसका?

राज्यसभा की लिस्ट आने के बाद बीजेपी के मौजूदा विधायकों में यह चर्चा तेज है कि विधानसभा टिकट के लिए पार्टी का पैमाना क्या होगा. क्या सिर्फ सिटिंग MLA होना टिकट की गारंटी रहेगा? या फिर पार्टी इस बार भी चेहरे बदलने, संगठनात्मक फीडबैक और जनता के बीच स्वीकार्यता को ज्यादा महत्व देगी? इस सवाल की वजह सिर्फ राज्यसभा की लिस्ट नहीं है. बीजेपी, विधानसभा चुनाव से पहले सीटवार फीडबैक और सर्वे की प्रक्रिया भी चला रही है.

100 से ज्यादा विधायकों के खिलाफ एंटीइनकंबेंसी

बीजेपी के आंतरिक आकलन में करीब 100 मौजूदा विधायकों के खिलाफ जमीनी स्तर पर एंटीइनकंबेंसी की बात सामने आई है. यह आकलन उन 255 विधानसभा सीटों पर किया गया है, जिनका प्रतिनिधित्व फिलहाल बीजेपी के विधायक कर रहे हैं. पार्टी के फीडबैक में जनता के बीच भरोसे की स्थिति के साथसाथ स्थानीय संगठन के साथ विधायक के संबंधों को भी देखा जा रहा है. RSS से भी कुछ विधायकों को लेकर फीडबैक लिया जा रहा है.

रिपोर्ट कार्ड में क्याक्या देखा जा रहा?

बीजेपी के भीतर टिकट को लेकर जिन पहलुओं पर चर्चा है, उनमें सबसे अहम है विनिंग एबिलिटी यानी सीट जीतने की क्षमता. इसके लिए कई स्तर पर फीडबैक महत्वपूर्ण हो सकता है, जैसे जनता के बीच विधायक की स्वीकार्यता, क्षेत्र में विधायक की सक्रियता, स्थानीय संगठन के साथ तालमेल, कार्यकर्ताओं की विधायक के प्रति राय, जातीय और सामाजिक समीकरण, विपक्ष के संभावित उम्मीदवार के मुकाबले स्थिति, पिछले चुनाव और हालिया चुनावी प्रदर्शन और क्षेत्र में विकास कार्यों और स्थानीय मुद्दों की स्थिति क्या है.

सिटिंग MLA होना टिकट की गारंटी नहीं!

राज्यसभा की लिस्ट के बाद बीजेपी के भीतर सबसे बड़ा संदेश यही माना जा रहा है कि पुराना पद अपने आप में अगले टिकट की गारंटी नहीं है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. राज्यसभा में सभी मौजूदा सांसदों को रिपीट नहीं किया गया, इसका मतलब यह नहीं कि विधानसभा में भी सभी मौजूदा विधायकों के टिकट कटेंगे. अगर किसी विधायक की अपने क्षेत्र में मजबूत पकड़ है, संगठन उसके साथ है और सर्वे में उसकी स्वीकार्यता सामने आती है, तो पार्टी उसके साथ जा सकती है. यानी विधानसभा में मामला नो रिपीट से ज्यादा कौन जीत सकता है के सवाल पर टिक सकता है.

कमजोर सीट को लेकर भी तैयारी

पार्टी सिर्फ मौजूदा विधायकों का रिपोर्ट कार्ड नहीं देख रही है, बल्कि हारी हुई सीटों पर भी तैयारी कर रही है. जुलाई में बीजेपी ने प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर सर्वे शुरू किया था, जिसमें मौजूदा विधायकों के साथ हारी हुई सीटों का भी आकलन किया जा रहा था. इस बीच राज्यसभा की सूची ने बीजेपी विधायकों को यह संकेत जरूर दिया है कि पार्टी चुनाव से पहले बड़े फैसले लेने से परहेज नहीं करेगी.

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