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मुजफ्फरपुर जमीन घोटाले में बड़ी कार्रवाई, निलंबित CO और राजस्व अधिकारी गिरफ्तार; विधायक अमित कुमार रानू का भी नाम.

मुजफ्फरपुर जमीन घोटाले में बड़ी कार्रवाई, निलंबित CO और राजस्व अधिकारी गिरफ्तार; विधायक अमित कुमार रानू का भी नाम.

मुजफ्फरपुर, बिहार: मुशहरी अंचल से जुड़े कथित जमीन फर्जीवाड़े के मामले में पुलिस ने दो राजस्व अधिकारियों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार अधिकारियों की पहचान निलंबित अंचलाधिकारी (CO) महेंद्र कुमार शुक्ला और राजस्व अधिकारी करुण करण के रूप में हुई है। दोनों को मेडिकल जांच के बाद न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। मामला एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी की 70 डिसमिल पुश्तैनी जमीन से जुड़े कथित फर्जी दस्तावेजों और दाखिल-खारिज की प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोपों से संबंधित है। इस मामले में बेलसंड के विधायक अमित कुमार रानू समेत आठ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई है।

70 डिसमिल पुश्तैनी जमीन को लेकर शुरू हुआ विवाद

यह मामला मुजफ्फरपुर के अहियापुर थाना क्षेत्र के शहबाजपुर निवासी विजय कुमार की पुश्तैनी जमीन से जुड़ा है। विजय कुमार विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार में अवर सचिव के पद से सेवानिवृत्त बताए गए हैं। उनकी शिकायत के मुताबिक, परिवार की 70 डिसमिल जमीन को कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दूसरे लोगों के नाम दर्ज कराने की कोशिश की गई।

शिकायत में जमीन का संबंध उनके पिता जितेंद्र प्रसाद शाही और दादा योगेंद्र प्रसाद शाही से बताया गया है। जमीन का विवरण खाता संख्या 53 और खेसरा संख्या 403 के रूप में दिया गया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि पुराने दस्तावेजों का कथित दुरुपयोग कर राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदलवाने और दाखिल-खारिज कराने की प्रक्रिया अपनाई गई।

अब जांच में जमीन के स्वामित्व से जुड़े पुराने अभिलेखों, निबंधन कार्यालय के रिकॉर्ड और अंचल कार्यालय में उपलब्ध दस्तावेजों का मिलान महत्वपूर्ण होगा।

वर्ष 1986 के दस्तावेज पर उठे सवाल

शिकायतकर्ता ने जमीन पर दूसरे पक्ष के स्वामित्व के दावे को लेकर वर्ष 1986 के एक कथित निबंधन दस्तावेज पर सवाल उठाए हैं। शिकायत के अनुसार, हाजीपुर के सेलमपुर कुचुनदास कोर्ट निवासी कृष्णनंदन पासवान ने जमीन का खरीदार होने का दावा किया था। इसके समर्थन में निबंधन कार्यालय के दस्तावेज संख्या 10612 और 6 जून 1986 की तारीख का उल्लेख किया गया।

विजय कुमार का आरोप है कि संबंधित दस्तावेज संख्या की जांच करने पर वह किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर दर्ज मिली। इसी आधार पर जमीन से जुड़े दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े किए गए।

हालांकि, दस्तावेजों को लेकर शिकायत में लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगी। इसके लिए मूल निबंधन रिकॉर्ड, प्रमाणित प्रतियों और राजस्व अभिलेखों का सत्यापन जरूरी है।

दाखिल-खारिज में कथित गड़बड़ी का आरोप

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि विवादित जमीन का दाखिल-खारिज कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कराया गया। इसके बाद जमीन को अभिनव कुमार, अरविंद कुमार मेहता और तुषार सिंह के नाम दर्ज कराने तथा दोबारा दाखिल-खारिज की प्रक्रिया अपनाए जाने का भी उल्लेख है।

दाखिल-खारिज की प्रक्रिया के तहत जमीन से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज किया जाता है। इस दौरान प्रस्तुत दस्तावेजों और पुराने अभिलेखों का सत्यापन महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में जांच का अहम बिंदु यह है कि विवादित जमीन के लिए कौन-से दस्तावेज पेश किए गए, उनकी जांच किस स्तर पर हुई और रिकॉर्ड में बदलाव किस आधार पर दर्ज किया गया।

यदि दस्तावेजों में अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित प्रक्रिया में शामिल लोगों की भूमिका और जिम्मेदारी भी जांच के दायरे में आएगी।

विधायक अमित कुमार रानू समेत आठ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी

इस मामले में बेलसंड के विधायक अमित कुमार रानू, उनके भाई अभिनव कुमार, तत्कालीन अंचलाधिकारी महेंद्र कुमार शुक्ला, राजस्व अधिकारी करुण करण और अंचल कार्यालय से जुड़े कर्मचारियों समेत कुल आठ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने की बात सामने आई है।

शिकायतकर्ता ने जमीन के दस्तावेजों और दाखिल-खारिज की प्रक्रिया में कथित मिलीभगत का आरोप लगाया है। दो अधिकारियों की गिरफ्तारी के बाद मामले में प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर भी ध्यान केंद्रित हुआ है।

हालांकि, प्राथमिकी में किसी व्यक्ति का नाम होना अपने आप में दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। प्रत्येक आरोपित की भूमिका का निर्धारण जांच में सामने आने वाले साक्ष्यों और न्यायालय की प्रक्रिया के आधार पर होगा।

CO के खिलाफ पहले भी हुई थी कार्रवाई

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, निलंबित अंचलाधिकारी महेंद्र कुमार शुक्ला के खिलाफ दाखिल-खारिज से जुड़े एक अन्य मामले में भी आरोप सामने आए थे। उस मामले में मालती देवी नाम की मृत महिला के नाम से दर्ज आपत्ति को स्वीकार करने और आवेदन को लगभग 140 दिनों तक लंबित रखने का आरोप लगाया गया था।

बताया गया है कि जिलाधिकारी की जांच रिपोर्ट के बाद राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने उन्हें निलंबित कर दिया था। निलंबन अवधि के दौरान उनका मुख्यालय सारण प्रमंडल के आयुक्त कार्यालय में निर्धारित किया गया था।

यह अलग मामला बताया गया है। मौजूदा जमीन विवाद में गिरफ्तारी के बाद राजस्व रिकॉर्ड के सत्यापन और दाखिल-खारिज की प्रक्रिया में अधिकारियों की जिम्मेदारी को लेकर सवाल फिर चर्चा में हैं।

ऑनलाइन भूमि रिकॉर्ड और LPC की भी हो सकती है जांच

मामले में कथित फर्जी केवाला, दाखिल-खारिज, ऑनलाइन परिमार्जन प्लस और भूमि स्वामित्व प्रमाणपत्र (LPC) से संबंधित अनियमितताओं के आरोप भी लगाए गए हैं।

जांच के दौरान यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विवादित जमीन के ऑनलाइन रिकॉर्ड में कब और किस आधार पर बदलाव किए गए। इसके साथ ही यह भी जांचा जा सकता है कि आवेदन किसने दिया, कौन-से दस्तावेज लगाए गए और संबंधित अधिकारियों ने निर्णय लेते समय किन अभिलेखों

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