Student Mental Health After Jantar Mantar Protest: देश में शिक्षा सुधारों और कथित NEET पेपर लीक मामले को लेकर दिल्ली के जंतरमंतर पर चला जेनजी का आंदोलन केवल भारत ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बना। करीब 36 दिनों तक चले इस आंदोलन में देशभर से बड़ी संख्या में छात्र और युवा शामिल हुए। 20 जुलाई को आंदोलन ने नया मोड़ तब लिया, जब प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च किया। इसके बाद आंदोलन और तेज हुआ।

सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत हुई, जिसके बाद सरकार ने परीक्षा प्रणाली में सुधार और पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानूनी कदम उठाने का आश्वासन दिया। इस पूरे आंदोलन के बाद दो महत्वपूर्ण बहसें सामने आई हैं। पहली, प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें और दूसरी, आंदोलन के दौरान इस्तेमाल की गई भाषा तथा सार्वजनिक संदेशों की जिम्मेदारी।
मुआवजे की मांग के साथ संवेदनशील संवाद भी जरूरी
आंदोलन की प्रमुख मांगों में केंद्रीय , प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों की वापसी और परीक्षा विवाद से प्रभावित परिवारों के लिए आर्थिक सहायता शामिल थी।
इसी संदर्भ में वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी ने कहा कि पीड़ित परिवारों के लिए न्याय और आर्थिक सहायता की मांग पूरी तरह उचित है, लेकिन इस विषय पर सार्वजनिक संवाद अत्यंत संवेदनशील होना चाहिए।
उनके अनुसार, ऐसी भाषा से बचना चाहिए जिससे अनजाने में भी आत्महत्या का महिमामंडन होने का संदेश जाए। सार्वजनिक मंचों से दिए गए संदेश मानसिक तनाव से गुजर रहे युवाओं को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए न्याय और संवेदना की बात करते समय यह संदेश भी समान रूप से प्रमुख होना चाहिए कि “आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है।”
मानसिक स्वास्थ्य को भी मिले बराबर प्राथमिकता
डॉ. त्रिवेदी का सुझाव है कि शिक्षा सुधारों के साथसाथ विद्यार्थियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता, समय पर काउंसलिंग, परीक्षा संबंधी तनाव प्रबंधन और मनोसामाजिक सहयोग की व्यवस्था भी मजबूत की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और विश्वसनीय बनाने के साथसाथ भविष्य में ऐसी दुखद घटनाओं की रोकथाम के लिए ठोस संस्थागत कदम उठाना आवश्यक है।
संतुलित संदेश ही समाज के हित में
विशेषज्ञों का मानना है कि न्याय की मांग और मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा, दोनों एकदूसरे के पूरक हैं। पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना, निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की मांग के साथसाथ समाज को यह संदेश देना भी उतना ही आवश्यक है कि कठिन परिस्थितियों में सहायता उपलब्ध है और जीवन सबसे महत्वपूर्ण है। और सार्वजनिक मंचों पर भी इस विषय पर चर्चा करते समय जिम्मेदार और संवेदनशील भाषा का उपयोग करना समाज और युवाओं दोनों के हित में होगा।



