भारतीय माइक्रोफाइनेंस लेंडर्स के पोर्टफोलियो पर फिर से दबाव बढ़ रहा है. कीमतों के दबाव और कमजोर मज्ञनसून से रूरल इनकम पर खतरा मंडरा रहा है, जिससे इंडस्ट्री के 35 अरब डॉलर के लोन बुक में डिफॉल्ट का रिस्क बढ़ गया है. S&P ग्लोबल रेटिंग्स में फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस सेक्टर की लीड, गीता चुघ ने ब्लूमबर्ग को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि कमजोर मानसून से लोन ग्रोथ धीमी हो सकती है. इसका कारण भी है. लेंडर्स अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स को सख्त कर रहे हैं और कर्ज लेने वालों की कर्ज चुकाने की क्षमता घट रही है. उन्होंने अनुमान लगाया कि लगभग 20 फीसदी माइक्रोफाइनेंस कर्जदारों ने दो से अधिक लेंडर्स से लोन लिया है. उन्होंने कहा कि इस सेगमेंट में, कम लेंडर्स से जुड़े कर्जदारों की तुलना में डिफॉल्ट की दर काफी अधिक देखी जा रही है.

लगातार दबाव में थे लेंडर्स
इस सेक्टर में बंधन बैंक लिमिटेड और क्रेडिटएक्सेस ग्रामीण लिमिटेड, सैटिन क्रेडिटकेयर नेटवर्क लिमिटेड और मुथूट माइक्रोफिन लिमिटेड जैसी नॉनबैंक कंपनियों का काफी एक्सपोजर है. मार्च के अंत में बंधन बैंक के कुल लोन बुक में माइक्रोफाइनेंस और माइक्रोलेंडिंग सेक्टर के लोन का हिस्सा 23 फीसदी देखने को मिला था. पिछले दो वर्षों से माइक्रोफाइनेंस सेक्टर दबाव में था. तेजी से क्रेडिट विस्तार के कारण कई कर्जदार कर्ज के बोझ तले दब गए थे, जिससे डिफॉल्ट बढ़े और लेंडर्स को अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स सख्त करने पड़े. हालांकि, हालात अब स्थिर होने लगे हैं क्योंकि लेंडर्स ने इंडस्ट्री बॉडी के दिशानिर्देशों के बाद कर्जदारों के कर्ज के बोझ को कम करने और कुल पोर्टफोलियो जोखिम को सीमित करने के लिए सुरक्षा उपाय लागू किए हैं.
मानसून बनकर आया विलेन
सेंट्रल बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, लगातार सात तिमाहियों तक गिरावट के बाद जनवरीमार्च में बकाया माइक्रोफाइनेंस क्रेडिट में बढ़ोतरी हुई, जिससे कंपनियों के शेयर की कीमतों को सहारा मिला. अब इस रिकवरी के सामने नए जोखिम हैं. 12 वर्षों में सबसे सूखा जून देखने के बाद, भारत में जुलाई मानसून सीजन का मुख्य महीना में सामान्य से कम बारिश होने की उम्मीद है. कम बारिश से फसल उत्पादन और कृषि आय पर बुरा असर पड़ता है, जिससे ग्रामीण परिवारों की खर्च करने और कर्ज चुकाने की क्षमता कम हो जाती है. साथ ही, मिडिल ईस्ट में संघर्ष के कारण फ्यूल ईंधन, खाद और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों से महंगाई बढ़ सकती है, जिससे कम आय वाले कर्जदारों पर और दबाव पड़ सकता है.
कृषि और उससे जुड़े लोन
चुघ ने कहा कि माइक्रोफाइनेंस लेंडर्स का लगभग 80 फीसदी एक्सपोजर ग्रामीण इलाकों में होता है, जिसमें 35 फीसदी लोन सीधे कृषि से, 9 फीसदी कृषिआधारित उद्यमों से और 20 फीसदी पशुपालन से जुड़े होते हैं. सेंट्रल बैंक ने जून में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा कि हालांकि अधिकांश सेक्टर में क्रेडिट क्वालिटी में सुधार हुआ है, लेकिन खेती के क्षेत्र में सुधार धीमा रहा और वहां सबसे अधिक नॉनपरफॉर्मिंग लोन देखे गए. चुघ ने कहा कि मिडिल ईस्ट संकट के असर और कमजोर मानसून, दोनों ही मैक्रोलेवल की चुनौतियां हैं जो महंगाई को बढ़ाएंगी और लेंडर इस सेक्टर को लेकर सतर्क रहेंगे. अगर महंगाई बनी रहती है, तो इससे कर्ज लेने वालों की कर्ज चुकाने की क्षमता और कम हो सकती है और ये जोखिम और बढ़ सकते हैं.



