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शिवालिक की पहाड़ियों में विराजती हैं मां शाकंभरी देवी, जहां हरी सब्जियों से लगता है माता को भोग.

शिवालिक की पहाड़ियों में विराजती हैं मां शाकंभरी देवी, जहां हरी सब्जियों से लगता है माता को भोग.

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में शिवालिक की पहाड़ियों के बीच स्थित मां शाकंभरी देवी मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का प्रमुख केंद्र है। प्राकृतिक सुंदरता से घिरे इस सिद्धपीठ में मां के दर्शन के लिए दूर-दूर से भक्त पहुंचते हैं। इस मंदिर की एक खास परंपरा है, जो इसे अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है। यहां मां शाकंभरी देवी को हरी शाक-सब्जियां और वनस्पतियां अर्पित करने की परंपरा प्रचलित है। इसके पीछे देवी के उस स्वरूप की मान्यता जुड़ी है, जिसमें उन्हें संसार का भरण-पोषण करने वाली देवी माना जाता है।

कहां स्थित है मां शाकंभरी देवी का मंदिर?

मां शाकंभरी देवी का प्रसिद्ध मंदिर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले की बेहट तहसील के जसमौर क्षेत्र में स्थित है। यह स्थान शिवालिक की पहाड़ियों और प्राकृतिक वादियों से घिरा हुआ है। मंदिर में सहारनपुर के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली और राजस्थान सहित कई क्षेत्रों से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

मंदिर परिसर से लगभग एक किलोमीटर पहले बाबा भूरादेव का मंदिर भी स्थित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, बाबा भूरादेव को मां शाकंभरी देवी का रक्षक और क्षेत्रपाल माना जाता है। इसी वजह से कई श्रद्धालु माता के दर्शन से पहले बाबा भूरादेव के दरबार में माथा टेकते हैं। यह परंपरा भक्तों की आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्यों चढ़ाई जाती हैं मां को हरी सब्जियां?

मां शाकंभरी देवी को अन्न, फल, सब्जियों और वनस्पतियों से जोड़कर पूजा जाता है। मान्यता है कि देवी ने संसार को अकाल और भूख से बचाने के लिए धरती पर शाक-सब्जियों और फल-वनस्पतियों की उत्पत्ति की थी। इसी कारण उन्हें शाकंभरी नाम से जाना जाता है।

यही धार्मिक मान्यता मंदिर में हरी सब्जियों के भोग की परंपरा से जुड़ी है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार माता को शाक-सब्जियां अर्पित करते हैं। यह परंपरा प्रकृति, अन्न और जीवन के पोषण के महत्व को भी दर्शाती है।

क्या है मां शाकंभरी देवी की पौराणिक कथा?

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में दुर्गमासुर नामक दैत्य के अत्याचारों से संसार में संकट पैदा हो गया था। धार्मिक मान्यता है कि उसके प्रभाव से वर्षा रुक गई और धरती पर भीषण अकाल पड़ गया। अन्न और जल की कमी के कारण मनुष्य, पशु-पक्षी और अन्य जीव-जंतु परेशान होने लगे।

इस संकट से मुक्ति पाने के लिए देवताओं और ऋषियों ने आदिशक्ति की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी प्रकट हुईं। कथा के अनुसार, देवी ने अपनी कृपा से धरती पर फल, शाक-सब्जियां और अनेक वनस्पतियां उत्पन्न कीं, जिससे जीवों को भोजन मिला और संसार का पोषण हुआ।

शाक के माध्यम से संसार का भरण-पोषण करने के कारण देवी का नाम शाकंभरी पड़ा। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसके बाद देवी ने दुर्गमासुर का वध कर देवताओं और संसार को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया।

यह कथा मां शाकंभरी देवी को प्रकृति, हरियाली, अन्न और जीवन की रक्षा करने वाली शक्ति के रूप में स्थापित करती है।

नवरात्र में लगता है श्रद्धालुओं का मेला

मां शाकंभरी देवी मंदिर में चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इन अवसरों पर मंदिर क्षेत्र में धार्मिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं और भक्त माता के दर्शन, पूजा-अर्चना तथा भोग अर्पित कर आशीर्वाद मांगते हैं। यहां लगने वाले मेलों को स्थानीय धार्मिक परंपरा में विशेष महत्व प्राप्त है।

मां शाकंभरी देवी की यह परंपरा केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति और उसके संसाधनों के प्रति सम्मान का संदेश भी देती है। हरी सब्जियों का भोग इस मान्यता की याद दिलाता है कि अन्न, जल और वनस्पतियां जीवन के आधार हैं।

डिस्क्लेमर: यह लेख मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथा पर आधारित है। कथा में वर्णित घटनाएं आस्था और धार्मिक परंपरा का हिस्सा हैं।

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