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40 साल से रावण के पुतले: बना रहा मुस्लिम परिवार, 50 से ज्यादा कारीगर मिलकर तैयार कर रहे दशहरे की झांकियां

40 साल से रावण के पुतले: बना रहा मुस्लिम परिवार, 50 से ज्यादा कारीगर मिलकर तैयार कर रहे दशहरे की झांकियां

जम्मू के गीता भवन में दशहरे की तैयारियों के बीच आपसी सहयोग और सांस्कृतिक सद्भाव की एक खास कहानी सामने आई है। यहां उत्तर प्रदेश के मेरठ से आने वाला एक मुस्लिम परिवार पिछले करीब 40 वर्षों से रावण और कुंभकर्ण के पुतले बनाने के काम से जुड़ा है। इस बार भी 50 से अधिक कारीगर दशहरे के लिए पुतले तैयार करने में जुटे हैं। खास बात यह है कि इस टीम में मुस्लिम कारीगरों के साथ अलग-अलग समुदायों के हिंदू कारीगर भी शामिल हैं।

चार दशक से चली आ रही है पुतले बनाने की परंपरा

जम्मू के गीता भवन में सनातन धर्म सभा से जुड़े दशहरा आयोजनों के लिए हर साल रावण और कुंभकर्ण के पुतले तैयार किए जाते हैं। इस काम के लिए मेरठ से कारीगरों की टीम दशहरे से करीब एक महीने पहले पहुंच जाती है। इसके बाद पुतलों को तैयार करने का काम शुरू होता है।

करीब चार दशक से इस काम से जुड़ा परिवार हर साल यहां आकर अपनी कारीगरी का हुनर दिखाता है। पुतलों को तैयार करने में बांस, कागज और सजावट की दूसरी सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है। आकार देने से लेकर सजावट और अंतिम रूप देने तक, हर चरण में कारीगरों को काफी मेहनत करनी पड़ती है।

50 से ज्यादा कारीगर मिलकर कर रहे काम

इस बार पुतले बनाने के काम में 50 से अधिक लोग जुटे हुए हैं। टीम में शामिल कारीगर अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालते हैं। कोई बांस से ढांचा तैयार करता है, तो कोई कागज लगाने और सजावट का काम करता है। कुछ कारीगर पुतलों को अंतिम रूप देने में लगे हैं।

दशहरे से पहले सभी पुतलों को समय पर तैयार करना और संबंधित स्थानों तक पहुंचाना भी एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। इसी वजह से कारीगर पहले से तैयारी शुरू कर देते हैं और लगातार काम करते हैं।

जम्मू-कश्मीर के दूरदराज इलाकों तक भेजे जाते हैं पुतले

गीता भवन में तैयार होने वाले पुतले सिर्फ जम्मू शहर तक सीमित नहीं रहते। इन्हें जम्मू-कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में भेजा जाता है। इनमें दूरदराज और सीमावर्ती इलाके भी शामिल हैं, जहां दशहरे के अवसर पर रावण दहन के आयोजन किए जाते हैं।

इस तरह मेरठ से आए कारीगरों की मेहनत कई जगहों के दशहरा आयोजनों का हिस्सा बनती है। एक ही स्थान पर तैयार किए गए पुतले अलग-अलग क्षेत्रों में बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल होते हैं।

धर्म से परे कारीगरी और सहयोग का रिश्ता

इस परंपरा की खासियत केवल यह नहीं है कि एक मुस्लिम परिवार दशकों से रावण के पुतले बना रहा है, बल्कि यह भी है कि इस काम में विभिन्न समुदायों के लोग मिलकर योगदान देते हैं। सभी कारीगर अपनी कला और मेहनत के जरिए दशहरे की तैयारियों को पूरा करते हैं।

भारत में अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के पीछे ऐसे कारीगरों का योगदान होता है, जिनकी मेहनत अक्सर उत्सव की चमक के पीछे छिपी रह जाती है। जम्मू के गीता भवन में पुतले बनाने वाली यह टीम भी इसी साझा सांस्कृतिक परंपरा का उदाहरण है।

दशहरा अहंकार, अन्याय और बुराई के अंत का संदेश देता है। वहीं, इन कारीगरों की कहानी यह भी दिखाती है कि अलग-अलग समुदायों के लोग मिलकर एक परंपरा को आगे बढ़ा सकते हैं। करीब 40 वर्षों से जारी यह काम रोजगार, हुनर और आपसी सहयोग के जुड़ाव को सामने लाता है।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों में दी गई जानकारी पर आधारित है। परंपरा की अवधि और अन्य विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।

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