भारत सरकार ने अपनी विदेश व्यापार नीति में एक बड़ा बदलाव किया है. अब देश में ऐसे किसी भी विदेशी सामान को इम्पोर्ट करने पर पाबंदी होगी, जिसे बनाने में आंशिक या पूरी तरह से ‘जबरन मजदूरी’ का इस्तेमाल किया गया हो. सरकार का यह फैसला ऐसे वक्त में आया है, जब अमेरिका भारत समेत 60 देशों की सप्लाई चेन को लेकर कड़ाई से जांच कर रहा है.

इस फैसले से भारत ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार बाजार में यह साफ कर दिया है कि वह अपने सप्लाई चेन और आयात नियमों को लेकर किसी भी तरह की ढील देने के मूड में नहीं है. आइए, विस्तार से समझते हैं कि सरकार ने ये फैसला क्यों लिया.
क्यों लिया गया ये फैसला?
इस नए नियम की असल वजह अमेरिका की तरफ से आ रहा दबाव है. दरअसल, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ‘सेक्शन 301’ के तहत भारत समेत 60 अर्थव्यवस्थाओं की जांच कर रहा है. अमेरिका का आरोप है कि ये देश जबरन मजदूरी से बने सामानों के आयात को रोकने में फेल रहे हैं.
इसी वजह से 3 जून को अमेरिका ने भारत सहित 54 देशों से आने वाले सामानों पर 12.5% का भारीभरकम अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा था. वहीं, कनाडा, यूरोपीय संघ , मैक्सिको, इक्वाडोर, इंडोनेशिया और पाकिस्तान जैसे 6 देशों पर सिर्फ 10% ड्यूटी लगाने की बात कही गई, क्योंकि इन देशों ने पहले ही अपने यहां ऐसे आयात को रोकने वाले घरेलू कानून लागू कर दिए थे. इसी खतरे को भांपते हुए और अमेरिका के साथ चल रही द्विपक्षीय व्यापार समझौते की बातचीत को मजबूत करने के लिए, भारत ने भी अपने व्यापार नियमों में संशोधन कर दिया है.
बाजार से गायब हो जाएंगे विदेशी सामान?
अगर आपको लग रहा है कि सरकार के इस फैसले से तुरंत प्रभाव से विदेशी सामानों का आयात रुक जाएगा, तो ऐसा नहीं है. 13 जुलाई को डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड की ओर से जारी गजट नोटिफिकेशन में साफ किया गया है कि फिलहाल किसी भी देश या उत्पाद के आयात पर रातोंरात रोक नहीं लगाई जा रही है.
इस नोटिफिकेशन के नियम 30 दिन बाद लागू होंगे. सरकार ने सिर्फ एक कानूनी ढांचा तैयार किया है. आगे चलकर अगर DGFT की जांच में यह साबित होता है कि किसी खास सामान को बनाने में जबरन मजदूरी कराई गई है, तो सरकार उसे बैन कर सकेगी. इसकी जांच की पूरी प्रक्रिया ‘हैंडबुक ऑफ प्रोसीजर्स, 2023’ में तय की जाएगी. इसके अलावा, विदेश व्यापार नीति के चैप्टर 11 में ‘जबरन मजदूरी’ की नई परिभाषा जोड़ी गई है, जो अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के 1930 के कन्वेंशन पर आधारित है. यानी, जुर्माने या सजा के डर से किसी व्यक्ति से उसकी मर्जी के बिना काम करवाना.
चीन पर कसेगी नकेल?
ट्रेड पॉलिसी के जानकारों का मानना है कि भारत का यह कदम एक मास्टरस्ट्रोक है. थिंक टैंक जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, इस नियम की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार जांच कैसे करती है और सबूत कैसे जुटाए जाते हैं. उन्होंने बताया कि अमेरिका के रडार पर सबसे ज्यादा चीन का शिनजियांग इलाका रहता है, जहां जबरन मजदूरी से सूती कपड़े, सोलर पैनल, सीफूड, मेटल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स बनाए जाते हैं. हालांकि, इसके बावजूद अमेरिका और यूरोपीय देश चीन से ये सामान खरीदते हैं, जो दिखाता है कि इन नियमों को लागू करना कितना मुश्किल है.
वहीं, ईवाई इंडिया के ट्रेड पॉलिसी लीडर अग्नेश्वरा सेन का कहना है कि भारत ने ILO की परिभाषा को ज्यों का त्यों अपनाकर अमेरिका के ही अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क की बराबरी कर ली है. सेन के शब्दों में, “भारत सिर्फ अमेरिका के आरोपों का बचाव नहीं कर रहा है, बल्कि यह साबित कर रहा है कि वह खुद भी जेल या बंधुआ मजदूरी से बने सामानों की निगरानी करने में पूरी तरह सक्षम है.”



