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यूपी के पानी पर अब ‘फॉरएवर केमिकल’ की भी नजर! माइक्रोप्लास्टिक से PFAS तक होगी जांच

लखनऊ, अमृत विचार: प्रदेश में नई प्रयोगशाला में अत्याधुनिक विश्लेषणात्मक सुविधाओं के साथ पेयजल में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक और पीएफएएस जैसे उभरते प्रदूषकों की जांच की क्षमता भी विकसित की जाएगी। इसके लिए जरूरी उन्नत उपकरणों का प्रस्ताव वार्षिक कार्ययोजना में शामिल किया गया है।

नई स्टेट लैब को प्रदेश की आधुनिक राज्य रेफरल प्रयोगशाला के रूप में विकसित करने की योजना है। इसका मकसद सिर्फ मौजूदा जल गुणवत्ता मानकों की जांच तक सीमित रहना नहीं, बल्कि भविष्य में सामने आने वाली जल गुणवत्ता संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण क्षमता तैयार करना भी है। इससे पेयजल में उभरते प्रदूषकों की मौजूदगी का पता लगाने, संभावित स्रोतों की पहचान और वैज्ञानिक निगरानी को मजबूत करने में मदद मिलेगी। उत्तर प्रदेश जल निगम के प्रबंध निदेशक योगेश कुमार ने बताया कि नई स्टेट लैबोरेटरी भवन का निर्माण कार्य तेजी से कराया जा रहा है। इसे विश्वस्तरीय परीक्षण सुविधाओं से सुसज्जित करने की दिशा में काम चल रहा है। माइक्रोप्लास्टिक और पीएफएएस जैसे उभरते प्रदूषकों की जांच क्षमता विकसित करना भविष्य की जल गुणवत्ता चुनौतियों को देखते हुए महत्वपूर्ण पहल है।

प्रदेश में ग्रामीण पेयजल की गुणवत्ता की निगरानी के लिए बहुस्तरीय प्रयोगशाला नेटवर्क मौजूद है। इसमें एक राज्य स्तरीय, तीन क्षेत्रीय, 72 जिला स्तरीय और 62 वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट प्रयोगशालाएं शामिल हैं। राज्य स्तरीय प्रयोगशालाओं में उन्नत स्तर की परीक्षण सुविधाएं उपलब्ध हैं और इनके 50 मानक एनएबीएल प्रमाणित हैं। इस नेटवर्क के माध्यम से जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता की नियमित निगरानी और जरूरत के अनुसार विस्तृत प्रयोगशाला परीक्षण किया जाता है।

माइक्रोप्लास्टिक और पीएफएएस अलगअलग प्रदूषक

माइक्रोप्लास्टिक और पीएफएएस को एक ही तरह का प्रदूषक मानना तकनीकी रूप से सही नहीं है। माइक्रोप्लास्टिक सामान्यतः पांच मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक कणों को कहा जाता है। वहीं पीएफएएस फ्लोरीन युक्त कृत्रिम रसायनों का व्यापक समूह है। पर्यावरण में इनके अत्यधिक स्थायित्व के कारण इन्हें ‘फॉरएवर केमिकल’ भी कहा जाता है। दोनों प्रदूषकों के नमूने लेने और उनकी जांच की तकनीकी प्रक्रिया अलगअलग होती है। इसलिए नई स्टेट लैब में इनके परीक्षण के लिए अलगअलग उन्नत सुविधाएं विकसित करने की जरूरत होगी।

उभरते प्रदूषकों का तैयार होगा बेसलाइन डाटा

नई स्टेट लैब में माइक्रोप्लास्टिक और पीएफएएस जैसे प्रदूषकों की जांच क्षमता विकसित होने के बाद प्रदेश में इनके संबंध में बेसलाइन डाटा तैयार करने में मदद मिलेगी। इसके साथ संभावित प्रदूषण स्रोतों की पहचान, वैज्ञानिक निगरानी और भविष्य में विकसित होने वाले राष्ट्रीय मानकों एवं दिशानिर्देशों के अनुरूप परीक्षण व्यवस्था तैयार की जा सकेगी। यह क्षमता प्रदेश में पेयजल की गुणवत्ता को केवल मौजूदा प्रदूषकों तक सीमित रखने के बजाय बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों और उभरती जल गुणवत्ता चुनौतियों के अनुरूप निगरानी तंत्र विकसित करने में सहायक होगी।

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