
लखनऊ,अमृत विचार : अंतरराष्ट्रीय कानूनी विवादों के समाधान में भाषा की अहमियत को बताने के लिए एमिटी विश्वविद्यालय में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार की शुरूआत हुई। एमिटी लॉ स्कूल द्वारा स्टूडेंट वेलफेयर विभाग के विशेष सहयोग से आयोजित इस दो दिवसीय सेमिनार का मुख्य विषय ‘अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में हिंदी की भूमिका:अवसर एवं चुनौतियां’ रखा गया है। कार्यक्रम में देशविदेश से जुटे कानूनविदों, शिक्षाविदों और न्यायविदों ने भाषा की बाधाओं को दूर कर आम जनता तक न्याय की आसान पहुंच सुनिश्चित करने और वैकल्पिक विवाद समाधान में हिंदी के बढ़ते कदमों पर गहन मंथन किया।
इस सेमिनार में डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय और ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय सहित विभिन्न संस्थानों के शिक्षकों, शोधकर्ताओं व विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। साथ ही अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता और विवाद समाधान की प्रक्रियाओं में भाषा की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की।
इस मौके पर एमिटी यूनिवर्सिटी के प्रो वाइस चांसलर प्रो. अनिल वशिष्ठ, इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के रजिस्ट्रार महेंद्र प्रताप अवस्थी, डीन स्टूडेंट वेलफेयर डॉ. राजीव वर्मा और एमिटी लॉ स्कूल के डायरेक्टर प्रो. तपन कुमार चंडोला के साथ कई अन्य जानेमाने लोग भी मौजूद थे। सेमिनार के समापन में इलाहाबाद हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस रंगनाथ पांडे मुख्य अतिथि रहे। इसके साथ ही, पूर्व जज और राज्यपाल के कानूनी सलाहकार एस.एस. उपाध्याय गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में शामिल हुए।
हिंदी भारत के 140 करोड़ लोगों से जुड़ी भाषा
एमिटी लॉ स्कूल के निदेशक प्रो. तपन कुमार चंडोला ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी भारत के लगभग 140 करोड़ लोगों से जुड़ी भाषा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी को स्थापित करने के प्रयासों में आने वाली चुनौतियों को समझने और उनके समाधान की दिशा में विचार करने के लिए यह सम्मेलन महत्वपूर्ण है।
विद्यार्थियों के लिए खास है यह सम्मेलन
प्रो वाइस चांसलर प्रो. अनिल वशिष्ठ ने कहा कि वर्तमान दौर संचार का दौर है और संचार का मूल आधार भाषा है। भारत का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव लगातार बढ़ रहा है और इसके साथ अंतरराष्ट्रीय कानूनी मामलों और विवादों में भी वृद्धि हो रही है, जहां मध्यस्थता की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन विद्यार्थियों के लिए सीखने,नए विचारों को समझने और अपने ज्ञान का विस्तार करने का महत्वपूर्ण अवसर है, जिसका उन्हें पूरा लाभ उठाना चाहिए।
न्याय व्यवस्था में भाषायी पहुंच बेहद जरूरी
मुख्य अतिथि प्रो. अमर पाल सिंह ने विधिक व्यवस्था में भाषा के महत्व पर कहा कि कानूनी प्रक्रियाओं को अधिक सुगम, समावेशी और व्यापक बनाने के लिए निरंतर संवाद आवश्यक है। उन्होंने भाषा और न्याय व्यवस्था के बीच संबंध पर विचार रखते हुए कानूनी प्रक्रियाओं में भाषायी पहुंच को जरूरी बताया है।
कठिन कुछ भी हो सकता है, असंभव नहीं
समापन सत्र में मुख्य अतिथि जस्टिस रंगनाथ पांडे ने कहा कि हमें हमेशा सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ना चाहिए। कोई भी कार्य कठिन हो सकता है, लेकिन असंभव नहीं। कठिन कार्यों के लिए अधिक प्रयास और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि निरंतर प्रयासों से हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की दिशा में सफलता प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने कहा कि न्यायालयों में कई न्यायाधीश ऐसे रहे हैं जिन्होंने कई दशक पहले ही हिंदी में निर्णय लिखना शुरू कर दिया था। उन्होंने कानूनी मामलों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए समाज और संबंधित पक्षों की सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता पर भी बल दिया।
गेस्ट ऑफ ऑनर एस.एस. उपाध्याय ने कहा कि अच्छे कार्यों की शुरुआत हमेशा घर से होनी चाहिए। इसलिए सबसे पहले हमें स्वयं हिंदी को अपनी प्राथमिक भाषाओं में शामिल करते हुए व्यवहार में इसका अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए।
सेमिनार के दौरान अंतरराष्ट्रीय कानूनी मामलों की मध्यस्थता में हिंदी के प्रयोग तथा विवाद समाधान की प्रक्रियाओं में भाषायी समावेशन को बढ़ावा देने से जुड़े अवसरों एवं चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कानूनी अनुवाद, विधिक शब्दावली, भाषा संबंधी बाधाओं तथा आमजन की न्याय तक पहुंच जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार साझा किए।
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