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ओडिशा: 21 दिन तक जमीन पर सोना और फिर जलते अंगारों पर चलना! भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त करते हैं हैरान करने वाली साधना.

ओडिशा: 21 दिन तक जमीन पर सोना और फिर जलते अंगारों पर चलना! भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त करते हैं हैरान करने वाली साधना.

ओडिशा: भारत में आस्था और भक्ति से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जिनके बारे में जानकर लोग हैरान रह जाते हैं। ओडिशा के गंजाम जिले में मनाया जाने वाला ‘दंड नाटा’ भी ऐसी ही एक अनोखी धार्मिक परंपरा है। इसमें भगवान शिव के भक्त लगातार 21 दिनों तक कठिन नियमों का पालन करते हैं। कुछ श्रद्धालु इस दौरान जमीन पर सोते हैं, सादा भोजन करते हैं और नंगे पैर रहते हैं। अनुष्ठान के अंतिम चरण में कुछ प्रतिभागी जलते अंगारों पर चलते हैं, जबकि कुछ शरीर में धातु की सुइयां चुभाने या पीठ की त्वचा में लगे हुक के सहारे झूलने जैसी जोखिम भरी रस्मों में हिस्सा लेते हैं।

यह परंपरा केवल शारीरिक सहनशक्ति का प्रदर्शन नहीं मानी जाती, बल्कि भक्तों के लिए अपनी मन्नत पूरी करने और भगवान शिव के प्रति समर्पण व्यक्त करने का माध्यम भी है।

क्या है दंड नाटा की परंपरा?

दंड नाटा ओडिशा के दक्षिणी हिस्से, विशेष रूप से गंजाम जिले में प्रचलित एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान है। इसमें भाग लेने वाले पुरुष श्रद्धालुओं को ‘दंडुआ’ कहा जाता है। यह अनुष्ठान आमतौर पर ओड़िया नववर्ष ‘पणा संक्रांति’ से पहले आयोजित किया जाता है और इसकी प्रमुख अवधि 21 दिनों की बताई जाती है।

मान्यता के अनुसार, कुछ श्रद्धालु बीमारी, पारिवारिक परेशानी या जीवन में किसी कठिन परिस्थिति के दौरान भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं। वे मनोकामना पूरी होने पर दंड नाटा में भाग लेने का संकल्प लेते हैं। जब उन्हें लगता है कि उनकी प्रार्थना स्वीकार हो गई है, तो वे इस संकल्प को पूरा करने के लिए अनुष्ठान में शामिल होते हैं।

भक्तों के लिए यह अपनी मन्नत निभाने और आराध्य के प्रति आभार जताने का तरीका है।

21 दिनों तक करना पड़ता है कठिन नियमों का पालन

दंड नाटा में शामिल होने वाले श्रद्धालु अनुष्ठान के दौरान अपनी रोजमर्रा की जीवनशैली में कई बदलाव करते हैं। प्रचलित विवरणों के अनुसार, वे जमीन पर सोते हैं, नंगे पैर रहते हैं और दिन में एक बार सादा भोजन करते हैं। भोजन में चावल, दाल और सब्जियां शामिल हो सकती हैं, जबकि नमक, तेल और मसालों से परहेज करने की बात भी कही जाती है।

इस अवधि में ब्रह्मचर्य का पालन, धार्मिक शुद्धता से जुड़े नियम और पूजा-पाठ भी अनुष्ठान का हिस्सा हो सकते हैं। श्रद्धालु दिन का काफी समय प्रार्थना, धार्मिक गतिविधियों और सामुदायिक जुलूसों में बिताते हैं।

इन नियमों का उद्देश्य भक्तों के अनुसार मन और शरीर को अनुशासित करना तथा पूजा के लिए स्वयं को तैयार करना है। हालांकि, नियमों का पालन स्थानीय परंपरा और अनुष्ठान के स्वरूप के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

अंतिम चरण में होते हैं जोखिम भरे अनुष्ठान

दंड नाटा का सबसे चर्चित हिस्सा इसके अंतिम चरण में होने वाली शारीरिक रस्में हैं। इनमें सभी प्रतिभागी एक जैसी गतिविधियां करें, यह जरूरी नहीं है। कुछ श्रद्धालु जलते अंगारों पर नंगे पैर चलते हैं। कुछ अपने गाल या जीभ में धातु की सुइयां चुभाते हैं।

कुछ अनुष्ठानों में विशेष लकड़ी के ढांचे या खंभे पर पीठ की त्वचा में हुक लगाकर झूलने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। ऐसी गतिविधियां देखने के लिए स्थानीय लोग बड़ी संख्या में एकत्र हो सकते हैं।

श्रद्धालु इन रस्मों को अपनी आस्था, संकल्प और भगवान शिव के प्रति समर्पण से जोड़ते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कठिन तपस्या और अनुष्ठान के जरिए भक्त अपनी मन्नत पूरी करते हैं।

हालांकि, इन गतिविधियों में गंभीर चोट, संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य जोखिम हो सकते हैं। इसलिए इन्हें देखकर स्वयं करने की कोशिश करना सुरक्षित नहीं है।

भगवान शिव से क्यों जुड़ी है यह परंपरा?

हिंदू धर्म में भगवान शिव को तपस्या, वैराग्य और साधना से जोड़कर देखा जाता है। शिव से संबंधित अनेक धार्मिक परंपराओं में सांसारिक सुख-सुविधाओं से दूरी बनाकर अनुशासित जीवन जीने का महत्व बताया गया है।

दंड नाटा में भी श्रद्धालु कुछ समय के लिए सामान्य दिनचर्या से अलग होकर कठिन नियमों का पालन करते हैं। उनके लिए शरीर को अनुशासन में रखना और धार्मिक संकल्प पूरा करना भक्ति का हिस्सा है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अनुष्ठान के दौरान होने वाली असाधारण शारीरिक गतिविधियों को भक्त धार्मिक आस्था के नजरिए से देखते हैं। किसी व्यक्ति का दर्द के प्रति कम प्रतिक्रिया देना अपने आप में किसी अलौकिक शक्ति का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

पूरे गांव और समुदाय की भागीदारी

दंड नाटा केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं है। इसमें स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। अनुष्ठान के दौरान धार्मिक आयोजन, पूजा-पाठ और जुलूस होते हैं, जिनमें लोग शामिल होते हैं।

श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी करने के लिए अनुष्ठान करते हैं, जबकि समुदाय के अन्य लोग उनका साथ देते हैं और धार्मिक आयोजनों का हिस्सा बनते हैं। इस तरह यह परंपरा स्थानीय सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक जीवन से भी जुड़ी हुई है।

आधुनिक दौर में परंपरा के सामने चुनौतियां

समय के साथ पारंपरिक धार्मिक आयोजनों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। शहरों की ओर पलायन, बदलती जीवनशैली और युवा पीढ़ी की अलग-अलग प्राथमिकताओं का असर स्थानीय परंपराओं पर भी पड़ सकता है।

दंड नाटा में शरीर को नुकसान पहुंचाने वाली कुछ रस्मों को लेकर सुरक्षा और कानूनी सवाल भी उठ सकते हैं। ऐसे में धार्मिक परंपराओं का सम्मान करने के साथ-साथ प्रतिभागियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

दंड नाटा ओडिशा की उन परंपराओं में शामिल है, जिनमें आस्था, कठिन अनुशासन और सामुदायिक भागीदारी एक साथ दिखाई देते हैं। भक्त इसे भगवान शिव के प्रति समर्पण और मन्नत पूरी करने का माध्यम मानते हैं। वहीं, इसकी जोखिम भरी शारीरिक रस्मों को समझते समय धार्मिक मान्यताओं और स्वास्थ्य सुरक्षा—दोनों पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है।

डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध प्रकाशित विवरणों और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। अनुष्ठान की प्रक्रिया अलग-अलग स्थानों पर भिन्न हो सकती है। शरीर को छेदने, जलते अंगारों पर चलने और हुक के सहारे झूलने जैसी गतिविधियां जोखिम भरी हैं; इन्हें स्वयं करने का प्रयास न करें।

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