भारत में मोटापे की समस्या तेजी से बढ़ रही है. खास बात यह है कि अब यह परेशानी केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रह गई है. गांवों और छोटे शहरों में भी ज्यादा वजन और मोटापे के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण यानी NFHS6 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 15 से 49 साल की महिलाओं और पुरुषों में ओवरवेट और मोटापे की समस्या पहले के मुकाबले काफी बढ़ी है. यह बदलाव शहरों के साथसाथ ग्रामीण इलाकों में भी देखने को मिला है.

NFHS6 के अनुसार, देश की 30.7% महिलाएं और 27.3% पुरुष अब ओवरवेट या मोटापे की श्रेणी में हैं. NFHS5 यानी 201921 में यह आंकड़ा महिलाओं के लिए 24% और पुरुषों के लिए 22.9% था. यानी कुछ ही सालों में महिलाओं में करीब 7 प्रतिशत अंक और पुरुषों में 4 प्रतिशत अंक से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है.
गांवों में भी तेजी से बढ़ रहा मोटापा
शहरों और गांवों के बीच अभी भी अंतर है. शहरों में 42.8% महिलाएं ओवरवेट या मोटापे से प्रभावित हैं, जबकि गांवों में यह आंकड़ा 25.5% है. पुरुषों में शहरों का आंकड़ा 36.3% और ग्रामीण इलाकों का 23% है. लेकिन सबसे ज्यादा चिंता ग्रामीण इलाकों की तेजी से बदलती तस्वीर को लेकर है. 200506 में ग्रामीण महिलाओं में सिर्फ 7.2% महिलाएं ओवरवेट या मोटापे की श्रेणी में थीं. उस समय शहरों में यह आंकड़ा 23.5% था. यानी ग्रामीण महिलाओं में मोटापे का स्तर अब तीन गुने से भी ज्यादा हो चुका है.
सिर्फ ज्यादा कमाई वजह नहीं
एक्सपर्ट्स का मानना है कि मोटापा केवल बढ़ती कमाई या लोगों की अपनी लापरवाही का नतीजा नहीं है. इसके पीछे देश में तेजी से बदलता खानपान भी बड़ी वजह है. आज पैकेज्ड फूड, चिप्स, बिस्किट, मीठे पेय और दूसरी अल्ट्राप्रोसेस्ड चीजें छोटे शहरों और गांवों में भी आसानी से उपलब्ध हैं. इनकी कीमत भी कई बार कम होती है और इनका विज्ञापन बच्चों और युवाओं को आकर्षित करता है. इसके अलावा ग्रामीण भारत में सड़क और इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ने से पैकेज्ड फूड और ऑनलाइन खरीदारी की पहुंच भी बढ़ी है. पहले ग्रामीण इलाकों में दाल, मोटे अनाज और दूसरे पारंपरिक खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल ज्यादा होता था. अब उनकी जगह रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, पैकेज्ड स्नैक्स और स्वीट ड्रिंक तेजी से ले रहे हैं.
ग्रामीण इलाकों में बढ़ी FMCG कंपनियों की बिक्री
इंडस्ट्री पर नजर रखने वाली कंपनी NielsenIQ के अनुसार, 2025 तक ग्रामीण भारत में तेजी से बिकने वाले कंज्यूमर गुड्स की बिक्री की मात्रा शहरी इलाकों की तुलना में कई गुना तेज़ी से बढ़ रही है. साल की शुरुआत में ग्रामीण FMCG वॉल्यूम ग्रोथ करीब 8.4% रहने का अनुमान था, जबकि शहरी बाजारों में यह 2.6% थी.



