नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार, PCPNDT एक्ट से जुड़े मामलों में पुलिस की जांच की शक्ति को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि PreConception and PreNatal Diagnostic Techniques Act, 1994 के तहत अपराधों की पुलिस द्वारा स्वतंत्र रूप से FIR दर्ज कर जांच नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस कानून के तहत शिकायतों की जांच और कार्रवाई की जिम्मेदारी कानून में निर्धारित Appropriate Authority की है। पुलिस जरूरत पड़ने पर इस प्राधिकरण की सहायता कर सकती है, लेकिन मुख्य जांच एजेंसी के रूप में काम नहीं कर सकती।
क्या है PCPNDT एक्ट?
PCPNDT एक्ट वर्ष 1994 में बनाया गया था। इसका उद्देश्य गर्भ में भ्रूण के लिंग की पहचान और लिंग चयन पर रोक लगाना है। यह कानून प्रीकन्सेप्शन और प्रीनेटल डायग्नोस्टिक तकनीकों के गलत इस्तेमाल को नियंत्रित करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह कानून तकनीकी और चिकित्सकीय प्रकृति का है। ऐसे मामलों में मेडिकल जानकारी और विशेष विशेषज्ञता की जरूरत होती है, इसलिए कानून ने इसके लिए अलग और विशेष जांच व्यवस्था निर्धारित की है।
पुलिस FIR दर्ज कर जांच नहीं कर सकती
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि PCPNDT एक्ट के तहत अपराधों को संज्ञेय और गैरजमानती बनाया गया है, पुलिस अपने स्तर पर FIR दर्ज करके जांच शुरू नहीं कर सकती।
कोर्ट ने कानून की धारा 27 और 28 को साथ पढ़ते हुए कहा कि इस अधिनियम के तहत कार्रवाई के लिए विशेष प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। कानून के तहत निर्धारित Appropriate Authority या अधिकृत अधिकारी ही शिकायत दर्ज कराकर आगे की कार्रवाई कर सकते हैं।
पुलिस की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पुलिस की भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं होती। Appropriate Authority की जरूरत के अनुसार पुलिस सहायक भूमिका निभा सकती है। हालांकि, PCPNDT एक्ट के अपराधों की मुख्य जांच पुलिस के जिम्मे नहीं होगी।
पुलिस की चार्जशीट पर कोर्ट नहीं ले सकता संज्ञान
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण बात कही। यदि पुलिस PCPNDT एक्ट के तहत जांच करके चार्जशीट दाखिल करती है, तो सक्षम मजिस्ट्रेट उस पुलिस चार्जशीट के आधार पर इस अधिनियम के अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता।
अदालत ने कहा कि धारा 28 इस संबंध में एक विशेष वैधानिक प्रक्रिया निर्धारित करती है और उसी के अनुसार शिकायत आने पर ही अदालत आगे बढ़ सकती है।
दूसरे आपराधिक मामलों की जांच पर असर नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका फैसला सिर्फ PCPNDT एक्ट के तहत अपराधों तक सीमित है। यदि किसी मामले में इसके अलावा सामान्य आपराधिक कानून के तहत कोई अलग अपराध सामने आता है, तो पुलिस उस स्वतंत्र अपराध की जांच और अभियोजन कर सकती है।
यानी इस फैसले से पुलिस की सामान्य आपराधिक मामलों की जांच करने की शक्ति प्रभावित नहीं होगी।
फैसले का असर
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला PCPNDT एक्ट के तहत FIR, जांच और अदालत द्वारा संज्ञान लेने की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है। अब ऐसे मामलों में कानून में निर्धारित Appropriate Authority की भूमिका प्रमुख होगी और पुलिस की भूमिका जरूरत के मुताबिक सहायक तक सीमित रहेगी।
यह फैसला उत्तर प्रदेश से जुड़े एक मामले में आया, जिसमें पुलिस द्वारा PCPNDT एक्ट के तहत FIR दर्ज करने और जांच करने की शक्ति को लेकर सवाल सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे गए थे।



