नई दिल्ली
पश्चिम एशिया में भड़के सैन्य संघर्ष की आग अब एक बार फिर आम इंसान की जेब झुलसाने के लिए तैयार है. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव, हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में हमलों और होर्मुज के बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया है. अगर कच्चा तेल लंबे समय तक यूं ही तेवर दिखाता रहा, तो दुनिया में महंगाई का एक और नया दौर आने से रुकने वाला नहीं है. भारत से लेकर अमेरिका तक और गाड़ी के फ्यूल टैंक से लेकर रसोई तक इसका असर दिखेगा. अगर क्रूड का रेट और चढ़ता है तो भारत में पेट्रोलडीजल के रेट बढ़ सकते हैं।

हॉर्मुज पहले से ही बंद था और अब और बाबअलमंदेब जलडमरूमध्य पर भी युद्ध का साया पड़ गया है. लाल सागर में हूती विद्रोही सऊदी अरब के तेल टैंकरों पर हमला कर रहे हैं. इस वजह से सऊदी अपना तेल अब स्वेज नहर के रास्ते एशियाई देशों में भेज रहा है. इस वजह से समुद्री जहाजों को अब पूरे अफ्रीका का चक्कर काटकर भारत, चीन और ताइवान जैसे देशों में आना पड़ रहा है. लाल साग से एशियाई देश आने में 19 दिन लगते थे, अब 48 दिन लग रहे हैं. जहाजों का ईंधन खर्च 1.26 मिलियन डॉलर से बढ़कर सीधा 2.87 मिलियन डॉलर हो गया है. इसके अलावा, स्वेज नहर से गुजरने के लिए लगभग 10 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क भी देना पड़ रहा है।
सऊदी अरब से बड़ी मात्रा में तेल लेता है भारत
202526 में भारत ने अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 1315% हिस्सा सऊदी अरब से आयात किया. पिछले कुछ समय से भारत रूस से ज्यादा क्रूड ऑयल खरीद रहा है. जून, 2026 में भारत ने रूस से रिकॉर्ड 2.64 मिलियन बैरल प्रति दिन तेल खरीदा. मई के मुकाबले लगभग 37.4% ज़्यादा था. भारत ने जून में सऊदी अरब से 403,000 bpd तेल का आयात किया. यह तेल मुख्य रूप से मुख्य रूप से यानबू बंदरगाह से आया।
100 डॉलर बैरल को क्यों माना जाता है क्रिटिकल लेवल?
100 डॉलर प्रति बैरल का स्तर तेल बाजार में एक मनोवैज्ञानिक और आर्थिक , दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इसका कारण यह है कि जब भी क्रूड ऑयल ने इस स्तर को छुआ है तो दुनिया में अफरातफरी मची है. साल 2008 तेल इस मनोवैज्ञानिक स्तर को तोड़कर 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा गया था. इसका नतीजा यह हुई की दुनिया में मंदी आ गई।
2022 में रूसयूक्रेन युद्ध के दौरान ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के ऊपर चला गया तो दुनिया भर में महंगाई बढ़ी. इसी तरह अमेरिकाईरान युद्ध शुरू होने के बाद जब क्रूड ने 100 डॉलर बैरल का आंकड़ा पार किया तो भारत सहित दुनिया के बहुत से देशों में पेट्रोलडीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ गए. यही वजह है कि 100 डॉलर का स्तर एक चेतावनी सीमा माना जाता है।
आम आदमी की जेब पर कैसे होगा असर?
क्रूड ऑयल सिर्फ गाड़ियों का ईंधन नहीं है, यह अर्थव्यवस्था का पहिया है. लगभग हर चीज किसी न किसी रूप में पेट्रोलियम पदार्थों पर निर्भर करती है. क्रूड के दाम बढने से पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और जेट फ्यूल महंगा होता है. ऐसा होने पर बाकी चीजों की कीमतें भी अपने आप बढ़ जाती हैं. और इससे आम आदमी पर पड़ता है महंगाई का बोझ.
उदाहरण के लिए ताजी सब्जियां, फल और डेयरी प्रोडक्ट्स जैसी चीजें जो कोल्ड स्टोरेज और ट्रक ट्रांसपोर्ट पर चलती हैं, उनकी कीमतें तेल के दाम बढ़ने पर उछल सकती हैं. जहाजों, ट्रकों और मालवाहक उड़ानों का किराया बढ़ने से रोजाना इस्तेमाल की चीजें महंगी होने का खतरा पैदा हो जाता है।
भारत के लिए क्यों बजा खतरे का सायरन?
दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक देश भारत के लिए 100 डॉलर पार करता क्रूड एक बड़ा झटका है. इससे भारत के सामने 5 बड़ी चुनौतियां खड़ी होंगी
आयात बिल में बढ़ोतरी: देश से डॉलर की निकासी बढ़ेगी.
रुपये पर दबाव: डॉलर मजबूत होगा और भारतीय रुपया कमजोर हो सकता है.
महंगाई : पेट्रोल डीजल अगर महंगा होता है तो रोजमर्रा का सामान महंगा होगा.
चालू खाता घाटा : देश का आर्थिक संतुलन बिगड़ने का खतरा रहेगा.
क्या एकदम बढ़ जाएंगे पेट्रोलडीजल के दाम?
हालांकि सरकार और रिफाइनरियां शुरुआत में घाटा सहकर कीमतें स्थिर रखने की कोशिश करेंगी, लेकिन अगर क्रूड लंबे समय तक 100 डॉलर के पार रहा, तो पेट्रोलडीजल के खुदरा दाम बढ़ाना सरकार की मजबूरी हो जाएगी. अमेरिकाईरान युद्ध शुरू होने के बाद भी सरकार ने काफी दिन तक पेट्रोल और डीजल के रेट नहीं बढ़ाए थे।



