DharamIndiaTrending

राजा नल और पांडवों से जुड़ा है शिवपुरी का सिद्धेश्वर मंदिर..?

राजा नल और पांडवों से जुड़ा है शिवपुरी का सिद्धेश्वर मंदिर..?

मध्य प्रदेश के शिवपुरी शहर में छत्री रोड पर जाधव सागर झील के पास बना श्री सिद्धेश्वर महादेव मंदिर बेहद खास है. यह शहर के सबसे पुराने और बड़े धार्मिक स्थलों में गिना जाता है. लोग यहां दूर दूर से दर्शन करने आते हैं.

अपनी पुरानी वास्तुकला और गहरी आस्था के कारण यह मंदिर हर किसी का मन मोह लेता है. इस मंदिर से कई पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियां जुड़ी हुई हैं. आइए जानते हैं 1000 साल पुराने इस पावन शिवधाम का पूरा इतिहास.

ओंकारेश्वर से लाया गया था मुख्य शिवलिंग

मंदिर के महंत सूरज भट्ट बताते हैं कि यहां स्थापित मुख्य शिवलिंग बेहद पवित्र है. इसे और इसके आसपास मौजूद 12 ज्योतिर्लिंगों को ओंकारेश्वर से लाकर यहां स्थापित किया गया था. मंदिर परिसर सिर्फ शिव जी तक सीमित नहीं है.

यहां भगवान गणेश, कार्तिकेय, राम जानकी और राधा कृष्ण की बहुत सुंदर प्रतिमाएं मौजूद हैं. इसके अलावा भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्राचीन मूर्तियां भी दर्शन के लिए रखी गई हैं.

राजा नल से लेकर सिंधिया परिवार तक का नाता

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का नाता राजा नल के दौर से है. यही वजह है कि मंदिर परिसर में आज भी राजा नल की छत्रियां देखी जा सकती हैं. बाद में 19वीं सदी में ग्वालियर के महाराजा दौलतराव सिंधिया की पत्नी महारानी बैजाबाई सिंधिया ने इसका जीर्णोद्धार कराया.

उन्होंने शिवपुरी के कई मंदिरों को संवारने का काम किया था. कुछ साल पहले पूर्व कलेक्टर ओमप्रकाश श्रीवास्तव और एसडीएम रूपेश उपाध्याय की मदद से इसे फिर से नया रूप दिया गया.

गुरु गोरखनाथ की पवित्र तपोभूमि

सिद्धेश्वर मंदिर के ठीक पीछे गुरु गोरखनाथ का एक प्राचीन मंदिर भी बना हुआ है. ऐसा माना जाता है कि नाथ संप्रदाय की शुरुआत करने वाले गुरु गोरखनाथ ने यहां बैठकर कठिन तपस्या की थी.

इस मंदिर की सबसे खास बात यहां मौजूद गुरु गोरखनाथ की दुर्लभ मूर्ति है. पत्थर की यह अनोखी मूर्ति 12वीं सदी की बताई जाती है. श्रद्धालुओं के लिए यह जगह बहुत ही शांत और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरी हुई लगती है.

अर्जुन के बाण से बह निकली थी बाणगंगा

मंदिर से बिल्कुल सटा हुआ बाणगंगा इलाका अपने 52 कुंडों के लिए पूरे क्षेत्र में जाना जाता है. इसके पीछे महाभारत काल की एक बहुत पुरानी कहानी जुड़ी है. कहा जाता है कि जब पांडव अज्ञातवास काट रहे थे, तब वे शिवपुरी और बैराड़ के जंगलों में ठहरे थे.

प्यास लगने पर जब कहीं पानी नहीं मिला, तो अर्जुन ने जमीन पर बाण चला दिया. बाण लगते ही वहां से पानी की धारा बह निकली, जिससे इस जगह का नाम बाणगंगा पड़ा.

आस्था और शांति का बड़ा केंद्र

आज सिद्धेश्वर महादेव मंदिर शिवपुरी की पहचान बन चुका है. यहां आने वाले हर भक्त को एक अजीब सी दिमागी शांति महसूस होती है. त्यौहारों के दौरान यहां भारी भीड़ उमड़ती है और मेले जैसा माहौल रहता है.

अगर आप इतिहास और अध्यात्म में रुचि रखते हैं, तो यह जगह आपके देखने लायक है. 1000 साल पुरानी यह धरोहर आज भी अपने गौरवशाली अतीत की कहानी खुद बयां करती है.

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply