
डिजिटल डेस्क। राजधानी लखनऊ से कुछ ही दूरी पर एक ऐसी दुनिया भी है, जहां बारिश का मौसम सिर्फ बादल और पानी लेकर नहीं आता, बल्कि अपने साथ उजड़ने का डर भी लेकर आता है। यह तस्वीर सीतापुर जिले के उन गांवों की है, जहां घाघरा नदी का कटान लोगों के लिए हर साल एक नई त्रासदी लिखता है।
सीतापुर की तीन तहसीलें हर साल बाढ़ की चपेट में आती हैं। इनमें महमूदाबाद तहसील का रामपुर मथुरा क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में शामिल है। यहां रहने वाले हजारों परिवारों के लिए बाढ़ अब अचानक आने वाली प्राकृतिक आपदा नहीं रह गई है। यह उनके जीवन का ऐसा हिस्सा बन चुकी है, जिसका सामना उन्हें हर साल करना पड़ता है।
जब घर से पहले जमीन छिन जाती है
घाघरा का पानी बढ़ता है तो सबसे पहले खेतों पर संकट आता है। देखते ही देखते उपजाऊ जमीन नदी की धारा में समाने लगती है। इसके बाद कटान घरों तक पहुंचता है और जिन आशियानों को परिवारों ने वर्षों की मेहनत से बनाया, उन्हें छोड़कर सुरक्षित जगह की तलाश में निकलना पड़ता है।
हालात ऐसे हैं कि साल के करीब छह महीने प्रभावित परिवारों के सामने सिर्फ रोजीरोटी का सवाल नहीं होता। उन्हें अपने सिर पर सुरक्षित छत और परिवार को सुरक्षित रखने की चिंता भी सताती रहती है।
बुचऊपुरवा में नदी ने निगल लिए आशियाने
इन दिनों शुकुलपुरवा ग्राम पंचायत का बुचऊपुरवा इसी दर्द की कहानी कह रहा है। यहां घाघरा नदी ने संतोषी, मनोहर और गयाप्रसाद के घरों को अपनी धारा में समा लिया है।
घर छूटे तो सामान समेटकर लोग नावों के सहारे सुरक्षित ठिकानों की ओर निकलने को मजबूर हैं। जिन आंगनों में कभी परिवार की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब नदी का पानी और कटान दिखाई देता है।
नागेश्वर पुरवा भी खतरे के मुहाने पर
खतरा सिर्फ बुचऊपुरवा तक सीमित नहीं है। नागेश्वर पुरवा से घाघरा नदी की दूरी अब महज 50 मीटर रह गई है। यानी नदी की बढ़ती धार और कटान के बीच यहां बसे लोगों की चिंता लगातार बढ़ रही है।
ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ कुछ मीटर जमीन का सवाल नहीं है। यह उनके घर, खेत, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है।
राहत मिलती है, लेकिन जिंदगी फिर वहीं लौट आती है
बाढ़ आने पर राहत सामग्री और तिरपाल प्रभावित परिवारों के लिए तत्काल सहारा जरूर बनते हैं, लेकिन इससे उस समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता, जो हर साल दोबारा सामने खड़ी हो जाती है।
हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद कटान और विस्थापन का संकट खत्म नहीं हो सका है। नदी किनारे रहने वाले परिवारों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कब तक उन्हें अपने घर और जमीन बचाने की लड़ाई लड़नी पड़ेगी?
राजधानी से दूरी कम, लेकिन विकास की तस्वीर अलग
लखनऊ से सटे सीतापुर के इन गांवों की कहानी सिर्फ बाढ़ की कहानी नहीं है। यह उस दूरी की कहानी भी है, जो राजधानी की विकास योजनाओं और ग्रामीण इलाकों की जमीनी हकीकत के बीच दिखाई देती है।
राजधानी से कुछ घंटों की दूरी पर बसे परिवार आज भी इस इंतजार में हैं कि राहत के बजाय उन्हें ऐसा स्थायी समाधान मिले, जिससे हर साल नदी के डर के साथ जिंदगी न गुजारनी पड़े।
घाघरा की धारा सिर्फ जमीन नहीं काट रही, वह उन परिवारों की उम्मीदों और वर्षों की मेहनत को भी अपने साथ बहा ले जा रही है। सवाल अब यह नहीं कि अगली बाढ़ कब आएगी, सवाल यह है कि अगली बाढ़ से पहले इन परिवारों को स्थायी सुरक्षा कब मिलेगी।
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