नई दिल्ली के जंतरमंतर पर भूख हड़ताल के करीब तीन हफ्ते बाद पुलिस ने शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को अस्पताल में भर्ती करवा दिया है. कहा जा रहा है कि पुलिस ने सोनम को उनकी मर्जी से नहीं बल्कि दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद भर्ती करवाया है. उनके समर्थकों का आरोप है कि सोनम को जबरन अस्पताल में दाखिल करवाया गया है.

इस बीच सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि ने दिल्ली हाई कोर्ट से मांग की है कि सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल की जगह दिल्ली के किसी प्राइवेट अस्पताल में शिफ्ट किया जाए, उन्हें सफदरजंग अस्पताल पर भरोसा नहीं है.आइए, सोनम वांगचुक के बहाने समझते हैं कि मरीज इलाज से मना करे तो डॉक्टर क्या कर सकते हैं? यह भी जान लें कि आपके मेडिकल कनसेन्ट राइट्स क्या हैं?
क्या मरीज़ को ऐसा अधिकार है?
इलाज के दौरान डॉक्टर और मरीज़ के बीच भरोसा बहुत जरूरी होता है. डॉक्टर बीमारी की जानकारी देता है. मरीज़ अपनी इच्छा बताता है. कई बार डॉक्टर किसी ऑपरेशन, दवा, टेस्ट या भर्ती की सलाह देते हैं. लेकिन मरीज़ इलाज लेने से मना कर सकता है. सक्षम वयस्क मरीज़ को इलाज स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार होता है. इसे मेडिकल कंसेंट यानी चिकित्सीय सहमति का अधिकार कहा जाता है. कुछ विशेष स्थितियों में नियम अलग हो सकते हैं. जैसे दुर्घटना, बेहोशी, मानसिक क्षमता की कमी या जानलेवा आपात स्थिति.
सोनम वांगचुक.
मेडिकल कंसेंट क्या होता है?
मेडिकल कंसेंट का अर्थ है इलाज के लिए मरीज़ की स्वेच्छा से दी गई अनुमति. यह अनुमति जानकारी समझने के बाद दी जानी चाहिए. केवल हस्ताक्षर कर देना ही कंसेंट नहीं है. सही कंसेंट के लिए मरीज़ को यह पता होना चाहिए कि उसे कौनसी बीमारी या समस्या है. कौनसा इलाज सुझाया जा रहा है. इलाज का उद्देश्य क्या है. इलाज से क्या लाभ हो सकते हैं. इलाज के क्या जोखिम या साइड इफेक्ट हो सकते हैं. इलाज न कराने पर क्या असर पड़ सकता है. क्या कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध है. इलाज का संभावित खर्च कितना हो सकता है? जब मरीज़ यह सब समझकर अपनी इच्छा से हां कहता है, तो उसे इनफॉर्म्ड कंसेंट कहा जाता है.
क्या मरीज़ इलाज से मना कर सकता है?
एक वयस्क मरीज़, जो अपने फैसले को समझने की मानसिक क्षमता रखता है, इलाज से मना कर सकता है. वह दवा, सर्जरी, टेस्ट, रक्त चढ़ाने, अस्पताल में भर्ती होने या किसी अन्य प्रक्रिया से भी इनकार कर सकता है. मरीज़ का फैसला डॉक्टर को गलत या जोखिम भरा लग सकता है. फिर भी डॉक्टर को मरीज़ की इच्छा का सम्मान करना चाहिए. उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को ऑपरेशन की सलाह दी गई है. डॉक्टर ने बताया कि ऑपरेशन से फायदा होगा. फिर भी मरीज़ ऑपरेशन नहीं कराना चाहता. वह मना कर सकता है, लेकिन डॉक्टर को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि मरीज़ ने फैसला पूरी जानकारी के साथ लिया है.
हड़ताल के बाद उनके ऑर्गन फेल्योर का खतरा बढ़ गया है.
डॉक्टर की जिम्मेदारी क्या होती है?
मरीज़ के मना करने पर डॉक्टर का काम केवल इलाज बंद कर देना नहीं है. डॉक्टर की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होती हैं.
1 बीमारी और इलाज को सरल भाषा में समझाना
डॉक्टर को मरीज़ को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि बीमारी क्या है? इलाज क्यों जरूरी है? इलाज से क्या फायदा होगा? इलाज न कराने पर क्या नुकसान हो सकता है? बहुत कठिन मेडिकल शब्दों से मरीज़ भ्रमित हो सकता है, इसलिए डॉक्टर को आसान भाषा का उपयोग करना चाहिए.
2 मरीज़ की समझ की जांच करना
डॉक्टर को देखना चाहिए कि मरीज़ बात समझ रहा है या नहीं. मरीज़ डर, दर्द, तनाव, नशे, बेहोशी या मानसिक परेशानी में हो सकता है. ऐसी स्थिति में उसका फैसला पूरी तरह स्वतंत्र या समझदारी भरा नहीं माना जा सकता. डॉक्टर मरीज़ से पूछ सकते हैं कि उसने क्या समझा.
3 विकल्प बताना
कई इलाजों के एक से अधिक विकल्प हो सकते हैं. डॉक्टर को उपलब्ध विकल्पों की जानकारी देनी चाहिए. जैसे दूसरी दवा, कम जोखिम वाली प्रक्रिया, दूसरे विशेषज्ञ की राय या केवल लक्षणों का इलाज. मरीज़ चाहे तो सेकंड ओपिनियन भी ले सकता है यानी किसी दूसरे योग्य डॉक्टर की सलाह ले सकता है.
4 जोखिम के बारे में बताना
यदि मरीज़ इलाज से मना कर रहा है, तो डॉक्टर को संभावित खतरे बताने चाहिए. उदाहरण के लिए, बीमारी बढ़ सकती है. दर्द बढ़ सकता है. अंग को नुकसान हो सकता है. गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है. यह जानकारी डराने के लिए नहीं होनी चाहिए. इसका उद्देश्य मरीज़ को समझदारी से निर्णय लेने में मदद करना है.
5 लिखित रिकॉर्ड रखना
डॉक्टर या अस्पताल मरीज़ के मना करने की बात मेडिकल रिकॉर्ड में लिख सकते हैं. कई मामलों में मरीज़ से रिफ्यूज़ल ऑफ ट्रीटमेंट या इलाज से इनकार का फॉर्म साइन करने को कहा जा सकता है. इस फॉर्म में यह दर्ज हो सकता है कि डॉक्टर ने इलाज, जोखिम और विकल्प समझाए थे. मरीज़ ने अपनी इच्छा से इलाज न लेने का निर्णय किया. यदि मरीज़ हस्ताक्षर नहीं करना चाहता, तो डॉक्टर इस बात का भी रिकॉर्ड बना सकते हैं. जरूरत पड़ने पर गवाह की मौजूदगी दर्ज की जा सकती है.
क्या डॉक्टर मरीज़ को जबरन इलाज दे सकते हैं?
आम परिस्थितियों में नहीं. किसी सक्षम वयस्क मरीज़ को उसकी इच्छा के खिलाफ इलाज देना उचित नहीं माना जाता. मरीज़ के शरीर और व्यक्तिगत निर्णय का सम्मान जरूरी है. डॉक्टर का दायित्व सलाह देना है. अंतिम निर्णय सामान्यतः मरीज़ का होता है, लेकिन कुछ अपवाद हो सकते हैं. यह हर मामले के तथ्य और लागू कानून पर निर्भर करता है.
आपात स्थिति में क्या होता है?
कई बार मरीज़ बेहोश होता है. वह बोल नहीं सकता. उसके पास कोई परिजन भी नहीं होता और इलाज में देरी से जान को खतरा हो सकता है. ऐसी आपात स्थिति में डॉक्टर जरूरी जीवन रक्षक इलाज शुरू कर सकते हैं. इसे आम तौर पर अनुमानित सहमति के आधार पर किया जाता है. माना जाता है कि अगर मरीज़ होश में होता, तो वह जान बचाने वाला उपचार स्वीकार करता.
नाबालिग मरीज़ के मामले में कौन फैसला करता है?
बच्चों के मामले में आम तौर पर मातापिता या कानूनी अभिभावक इलाज के लिए सहमति देते हैं. डॉक्टर बच्चे की उम्र और समझ के अनुसार उसकी राय भी पूछ सकते हैं. लेकिन यदि बच्चे की जान को गंभीर खतरा है और अभिभावक जरूरी इलाज से मना कर रहे हैं, तो मामला जटिल हो सकता है. अस्पताल संबंधित कानूनी प्रक्रिया या बाल संरक्षण व्यवस्था की मदद ले सकता है।
परिवार की भूमिका क्या है?
परिवार भावनात्मक सहारा दे सकता है. वे सवाल पूछ सकते हैं. वे मरीज़ को विकल्प समझने में मदद कर सकते हैं, लेकिन सक्षम वयस्क मरीज़ की इच्छा सबसे महत्वपूर्ण होती है. परिवार मरीज़ की जगह अपनी इच्छा नहीं थोप सकता. यदि मरीज़ इलाज नहीं चाहता और निर्णय लेने में सक्षम है, तो डॉक्टर को उसी की बात सुननी चाहिए. हां, मरीज़ चाहे तो किसी परिजन को अपनी मेडिकल जानकारी और निर्णय प्रक्रिया में शामिल कर सकता है.
सरल शब्दों में कहें तो मेडिकल कंसेंट मरीज़ की गरिमा और स्वतंत्रता से जुड़ा अधिकार है. एक सक्षम वयस्क मरीज़ आम तौर पर इलाज स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है. डॉक्टर का दायित्व है कि वह बीमारी, इलाज, लाभ, जोखिम और विकल्पों को सरल भाषा में समझाए. आपात स्थिति, बेहोशी, नाबालिग या मानसिक क्षमता की कमी जैसे मामलों में अलग नियम लागू हो सकते हैं.



