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जाति का नाम लेना अपराध नहीं, उसके आधार पर अपमानित करना जुर्म है… इलाहाबाद हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक केस की सुनवाई करते हुए कहा कि सिर्फ किसी व्यक्ति की जाति का नाम लेने मात्र से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत अपराध नहीं बन जाता. अदालत ने कहा कि यह साबित होना भी जरूरी है कि जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल पीड़ित को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने के इरादे से किया गया था.

जज संतोष राय ने वेगराज सिंह और एक अन्य की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए बरेली की एक अदालत द्वारा 21 मार्च 2025 को जारी समन आदेश को रद्द कर दिया. अधीनस्थ अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 358 के तहत दोनों आरोपियों को मुकदमे में शामिल होने के लिए समन भेजा था.

चमार शब्द बोलने मात्र से नहीं बनता अपराध

13 अगस्त को दिए अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी व्यक्ति के लिए सिर्फ चमार शब्द का इस्तेमाल कर देना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि आरोपी ने पीड़िता को उसके अनुसूचित जाति से संबंधित होने के कारण अपमानित करने के इरादे से यह शब्द कहा था.

अदालत ने कहा कि SC/ST एक्ट के तहत अपराध तय करने के लिए यह भी देखा जाना जरूरी है कि आरोपी के कथित शब्दों और व्यवहार के पीछे जाति के आधार पर अपमानित करने की स्पष्ट मंशा थी या नहीं.

क्या है पूरा मामला?

मामला बरेली के इज्जतनगर थाना क्षेत्र का है, जहां दुष्कर्म और धमकी के आरोपों में एक एफआईआर दर्ज की गई थी. पुलिस जांच के बाद मुख्य आरोपी हिम्मत सिंह के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया था. जबकि उसके पिता वेगराज सिंह और बड़े भाई दौलत सिंह को जांच के दौरान आरोपों से बाहर रखा गया था.

हालांकि, मुकदमे की सुनवाई के दौरान पीड़िता ने आरोप लगाया कि वेगराज सिंह और दौलत सिंह ने उसके लिए चमार शब्द का इस्तेमाल किया था. इस बयान के बाद ट्रायल कोर्ट ने दोनों को मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी कर दिया.इसके खिलाफ दोनों आरोपियों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया.

पहले के बयानों में नहीं था आरोपियों का जिक्र

अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि जातिसूचक टिप्पणी से जुड़े पीड़िता के पहले के बयानों में उनके खिलाफ किसी विशेष भूमिका या कृत्य का उल्लेख नहीं किया गया था. पीड़िता के सीआरपीसी की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज बयानों में भी अपीलकर्ताओं पर ऐसा कोई स्पष्ट आरोप नहीं था.

अदालत ने कहा कि विचारण अदालत ने अपीलकर्ताओं की मिलीभगत की ओर स्पष्ट रूप से संकेत करने वाली किसी विश्वसनीय और ठोस सामग्री या साक्ष्य न होने के बावजूद बीएनएसएस की धारा 358 के तहत उन्हें समन जारी करने में जल्दबाजी की और इस तरह कानूनी भूल की।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला

उच्च न्यायालय ने हरदीप सिंह बनाम पंजाब सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का भी उल्लेख किया. इस फैसले में कहा गया था कि किसी ऐसे व्यक्ति को आरोपी के रूप में मुकदमे में शामिल करने की शक्ति असाधारण है और इसका इस्तेमाल बहुत सावधानी और दुर्लभ मामलों में ही किया जाना चाहिए.

अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को बीच में मुकदमे का सामना करने के लिए बुलाने के लिए केवल आरोप तय करने के स्तर के प्रथम दृष्टया साक्ष्य पर्याप्त नहीं होते. इसके लिए ज्यादा मजबूत और ठोस साक्ष्य की आवश्यकता होती है.

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