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14​​​​​​ महीने तक दुनिया से कटा रहा पूरा गांव, प्लेग से बचने के लिए लोगों ने उठाया ऐसा कदम जिसकी कीमत सैकड़ों जानों से चुकाई

14​​​​​​ महीने तक दुनिया से कटा रहा पूरा गांव, प्लेग से बचने के लिए लोगों ने उठाया ऐसा कदम जिसकी कीमत सैकड़ों जानों से चुकाई

इयाम, इंग्लैंड: आज से करीब 360 साल पहले इंग्लैंड के एक छोटे से गांव में ऐसा संकट आया, जिसने वहां के लोगों की जिंदगी बदल दी। उस दौर में न आधुनिक अस्पताल थे और न ही बीमारी से बचाव के लिए आज जैसी सुविधाएं। प्लेग फैलने के बाद गांववालों ने खुद को बाहरी दुनिया से अलग करने का फैसला किया। इस फैसले की कीमत सैकड़ों लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी, लेकिन इयाम गांव की कहानी इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गई।

इंग्लैंड के पीक डिस्ट्रिक्ट में स्थित इयाम को आज भी ‘प्लेग विलेज’ के नाम से जाना जाता है। साल 1665-1666 के दौरान यहां फैली महामारी और गांववालों के सामूहिक क्वारंटीन की कहानी आज भी लोगों को हैरान करती है।

कपड़ों के एक बक्से से शुरू हुई तबाही

इतिहास में दर्ज विवरणों के मुताबिक, 1665 में लंदन में बुबोनिक प्लेग का प्रकोप फैला हुआ था। इसी दौरान इयाम गांव में लंदन से कपड़ों का एक बक्सा पहुंचा। माना जाता है कि कपड़ों में मौजूद संक्रमित पिस्सुओं के कारण गांव में बीमारी फैलने की शुरुआत हुई।

गांव के दर्जी के सहायक जॉर्ज विकर्स की तबीयत बिगड़ने के बाद मौत हो गई। इसके बाद संक्रमण फैलता गया और एक के बाद एक लोग इसकी चपेट में आने लगे। उस समय लोगों को इस बीमारी के फैलने के तरीकों की पूरी जानकारी नहीं थी। ऐसे में गांव के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि महामारी को और फैलने से कैसे रोका जाए।

पादरी की अपील पर गांववालों ने लिया बड़ा फैसला

जब संक्रमण तेजी से बढ़ने लगा, तो कुछ लोग गांव छोड़कर सुरक्षित जगहों पर जाने के बारे में सोचने लगे। इसी बीच गांव के पादरी विलियम मॉम्पेसन ने लोगों से अपील की कि वे बीमारी को दूसरे इलाकों तक पहुंचने से रोकने के लिए गांव की सीमा के भीतर ही रहें।

स्थानीय पादरी थॉमस स्टेनली ने भी इस प्रयास में भूमिका निभाई। दोनों के प्रयासों से गांववालों ने खुद को बाहरी दुनिया से अलग रखने का फैसला किया। यह निर्णय आसान नहीं था, क्योंकि इसका मतलब था कि संक्रमित होने का खतरा गांव के भीतर ही बना रहेगा और बाहर निकलकर सुरक्षित स्थान तलाशना भी संभव नहीं होगा।

गांव की सीमाओं पर लगाए गए सख्त प्रतिबंध

गांववालों ने बाहर आने-जाने पर रोक लगा दी। आसपास के इलाकों के लोगों को भी गांव में प्रवेश नहीं करना था। गांव की सीमा के पास पत्थरों से चिह्नित स्थान बनाए गए, जहां बाहर से आने वाले लोग खाने-पीने का सामान छोड़ जाते थे।

इसके बदले गांव के लोग पैसे वहीं रख देते थे। ऐतिहासिक विवरणों में बताया जाता है कि सिक्कों को सिरके वाले पानी में रखने की व्यवस्था भी अपनाई गई थी। उस समय लोगों को उम्मीद थी कि इससे संक्रमण का खतरा कम किया जा सकेगा।

हालांकि, उस दौर की चिकित्सा संबंधी समझ सीमित थी। इसलिए इन उपायों को आज के वैज्ञानिक मानकों के अनुसार पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता।

अपने ही परिवार के सदस्यों को दफनाने की नौबत

महामारी का असर इतना भयावह था कि कई परिवारों ने अपने प्रियजनों को खो दिया। संक्रमण के कारण अंतिम संस्कार की सामान्य व्यवस्थाएं प्रभावित हुईं और लोगों को अपने परिवार के सदस्यों को खुद दफनाना पड़ा।

कुछ परिवारों में कई लोगों की मौत हुई। गांव की आबादी का बड़ा हिस्सा बीमारी की चपेट में आ गया। पादरी विलियम मॉम्पेसन की पत्नी कैथरीन की भी प्लेग से मृत्यु हो गई। इन घटनाओं ने गांववालों के फैसले को और दर्दनाक बना दिया।

कितने लोगों की गई जान?

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इयाम में प्लेग के प्रकोप के दौरान करीब 260 लोगों की मौत हुई थी। यह संख्या उस समय गांव की आबादी का लगभग एक तिहाई मानी जाती है। महामारी का सबसे भयावह दौर 1665 से 1666 के बीच रहा।

हालांकि, यह कहना मुश्किल है कि गांव को अलग रखने के फैसले से आसपास के शहरों में संक्रमण पूरी तरह रुक गया था। इस फैसले का उद्देश्य बीमारी को फैलने से रोकना था, लेकिन इसके वास्तविक प्रभाव को लेकर इतिहासकारों के पास सीमित प्रमाण हैं।

आज भी याद की जाती है इयाम गांव की कहानी

इयाम की घटना को संक्रामक बीमारी के दौर में सामुदायिक जिम्मेदारी और आत्म-अलगाव के ऐतिहासिक उदाहरण के रूप में देखा जाता है। गांव के स्मारक और ऐतिहासिक स्थल उन लोगों की याद दिलाते हैं, जिन्होंने बेहद कठिन परिस्थितियों में रहने का फैसला किया।

कोविड-19 के दौरान दुनिया के कई देशों में लॉकडाउन और क्वारंटीन लागू हुए थे। ऐसे में इयाम गांव की करीब साढ़े तीन सौ साल पुरानी कहानी फिर चर्चा में आई। यह इतिहास याद दिलाता है कि महामारी के समय लिए गए फैसले केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के जीवन को प्रभावित कर सकते हैं।

Satya Report डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। महामारी के प्रभाव और गांव को अलग रखने के फैसले के परिणामों से जुड़े कुछ विवरणों में ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार अंतर हो सकता है।

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