दंतेवाड़ा.

बैलाडीला सिर्फ लौह अयस्क का पहाड़ नहीं, बल्कि भारतजापान के रिश्तों की एक अहम कहानी भी अपने भीतर समेटे है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान को अपनी अर्थव्यवस्था और उद्योग को फिर से खड़ा करना था.
इसी दौर में उसकी नजर बस्तर के बैलाडीला में मौजूद उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क पर पड़ी. 1957 में जापानी प्रतिनिधिमंडल ने भारत पहुंचकर अलगअलग लौह अयस्क क्षेत्रों का अध्ययन किया. असादा के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन के बाद बैलाडीला को लेकर जापान की दिलचस्पी और बढ़ी. इसके बाद मार्च 1960 में भारत और जापानी इस्पात मिलों के संगठन के बीच महत्वपूर्ण समझौता हुआ. समझौते के तहत बैलाडीला से 40 लाख टन लौह अयस्क जापान भेजने की व्यवस्था तय हुई. इस खनिज को विशाखापट्टनम तक पहुंचाने के लिए किरंदुलकोत्तावलसा रेल संपर्क भी इसी दौर में महत्वपूर्ण बना.
बैलाडीला का लोहा रेल से विशाखापट्टनम पहुंचा और वहां से समुद्री रास्ते जापान भेजा गया. यानी बस्तर का पहाड़ सिर्फ भारत के औद्योगिक विकास का हिस्सा नहीं बना, बल्कि जापान की औद्योगिक वापसी में भी इसकी भूमिका रही. इससे पहले पीएन बोस जैसे भूगर्भशास्त्रियों ने बैलाडीला के खनिज भंडार की पहचान की थी. बाद में सर्वेक्षणों ने यहां लौह अयस्क से समृद्ध कई पहाड़ी क्षेत्रों को चिन्हित किया. आज भी बैलाडीला भारत के प्रमुख लौह अयस्क क्षेत्रों में गिना जाता है और जापान से जुड़ी इसकी कहानी इसे और खास बनाती है. यही वजह है कि बैलाडीला बस्तर की धरती पर खड़े एक ऐसे अध्याय का नाम है, जिसने दो देशों की औद्योगिक कहानी को जोड़ा.



