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जेट इंजन’ जैसा शोर है बारिश की बूंदें, आवाज सुनकर जाग जाते हैं सोए हुए बीज! हैरान कर देगी साइंस की ये नई खोज

Satya Report: अगली बार जब आप अपनी खिड़की के पास बैठकर बारिश की रिमझिम बूंदों का मजा ले रहे हों, तो एक पल के लिए जमीन के नीचे दबे उन नन्हे बीजों के बारे में जरूर सोचिए. क्या वो भी आपकी तरह इस संगीत को सुनकर सुकून महसूस कर रहे होंगे? मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के इंजीनियरों ने अपनी नई रिसर्च में कुछ ऐसा ही पता लगाया है, जो आपको हैरान कर सकता है. रिसर्च के मुताबिक, बारिश की आवाज सुनकर बीज केवल सुकून ही महसूस नहीं करते, बल्कि वो ‘जिंदा’ हो उठते हैं. वैज्ञानिकों ने चावल के बीजों पर कई महीनों तक गहरे प्रयोग किए हैं. इसमें पाया गया कि गिरने वाली बूंदों की आवाज सोए हुए बीजों को एक गहरी नींद से जगा देती है. यह आवाज उन्हें तेजी से अंकुरित होने के लिए प्रेरित करती है. जिन बीजों को बारिश की आवाज सुनाई दी, वे उन बीजों के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से बढ़े जिन्हें पूरी तरह शांत माहौल में रखा गया था.

जेट इंजन’ जैसा शोर है बारिश की बूंदें, आवाज सुनकर जाग जाते हैं सोए हुए बीज! हैरान कर देगी साइंस की ये नई खोज
साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल में छपी यह स्टडी इस बात का पहला सीधा सबूत है कि पौधों के बीज और नन्हे पौधे कुदरत की आवाजों को महसूस करने की क्षमता रखते हैं. रिसर्च टीम ने इसके लिए चावल के बीजों को उथले पानी में डुबोकर कई जटिल टेस्ट किए. चावल एक ऐसी फसल है जो मिट्टी और पानी दोनों में ही आसानी से पनप सकती है. रिसर्चर्स को पूरा शक है कि सिर्फ चावल ही नहीं, बल्कि इसी तरह के कई अन्य बीज भी बारिश की आवाज पर अपना रिएक्शन देते हैं. यह खोज इस पुरानी वैज्ञानिक धारणा को पूरी तरह बदल देती है कि पौधे केवल सूरज की रोशनी, मिट्टी के पोषक तत्व और पानी पर ही रिएक्ट करते हैं. अब यह पूरी तरह साफ हो गया है कि कुदरत का शोर भी उनकी लाइफ साइकिल और ग्रोथ में एक बहुत ही अहम रोल निभाता है. (Photo : Reuters)
रिसर्चर्स ने एक विस्तृत थ्योरी दी है कि आखिर बीज आवाज को कैसे महसूस करते हैं. उन्होंने अपनी एनालिसिस में पाया कि जब बारिश की एक भी बूंद जमीन या पानी की सतह पर गिरती है, तो वह एक खास साउंड वेव पैदा करती है. यह आवाज अपने आसपास के माहौल में एक तीव्र कंपन यानी वाइब्रेशन पैदा करती है. जमीन के नीचे या उथले पानी में दबे बीज इस वाइब्रेशन को तुरंत महसूस कर लेते हैं. बीजों के अंदर बहुत ही छोटे ‘स्टेटोलिथ’ (statoliths) पाए जाते हैं. ये बीज के अंदर मौजूद ग्रैविटी यानी गुरुत्वाकर्षण को महसूस करने वाले खास अंग होते हैं. बारिश की आवाज से पैदा हुआ यह वाइब्रेशन इतना प्रभावी होता है कि वो इन स्टेटोलिथ को अपनी जगह से हिला देता है. जब ये अपनी जगह से हिलते हैं, तो बीज के भीतर एक बायोलॉजिकल सिग्नल जाता है. यह संकेत बीज को बताता है कि अब बाहर निकलने और तेजी से बढ़ने का सबसे सही समय आ गया है. (Photo : Generative AI)
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प्रोफेसर निकोलस माक्रिस, जो एमआईटी में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के एक्सपर्ट हैं, बताते हैं कि बारिश की आवाज में छिपी एनर्जी एक बीज की ग्रोथ को कई गुना बढ़ाने के लिए काफी होती है. भौतिक विज्ञान के नियमों के अनुसार, पानी हवा के मुकाबले कहीं ज्यादा सघन यानी डेंस होता है. इसलिए जब पानी की बूंद किसी पोखर या गीली मिट्टी पर गिरती है, तो वह हवा के मुकाबले पानी के नीचे बहुत ज्यादा प्रेशर पैदा करती है. प्रोफेसर माक्रिस के अनुसार, अगर आप एक नन्हे बीज हैं और पानी के नीचे दबे हैं, तो बारिश की बूंद से निकलने वाला साउंड प्रेशर आपके लिए उतना ही तेज होगा जितना हवा में किसी जेट इंजन के बिल्कुल पास खड़े होने पर महसूस होता है. यही भारी दबाव और कंपन बीजों के अंदर मौजूद सेल्स को एक्टिव कर देता है और उनमें हलचल शुरू हो जाती है.
अपनी इस थ्योरी को साबित करने के लिए टीम ने करीब 8000 चावल के बीजों पर एक बहुत बड़ा एक्सपेरिमेंट किया. उन्होंने बीजों को पानी के बड़े टबों में रखा और उन पर कृत्रिम तरीके से बूंदों को गिराया. इस दौरान उन्होंने बूंदों के साइज और उनके गिरने की ऊंचाई को बार-बार बदला. ऐसा इसलिए किया गया ताकि हल्की बूंदाबांदी से लेकर भारी बारिश जैसा माहौल तैयार किया जा सके. उन्होंने हाइड्रोफोन जैसे आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल करके पानी के अंदर की आवाज को बारीकी से रिकॉर्ड किया. इन नतीजों ने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को चौंका दिया है. जिन बीजों ने बारिश का शोर सुना, वे उन बीजों की तुलना में 30 से 40 परसेंट ज्यादा तेजी से अंकुरित हुए जिन्हें बिल्कुल शांत रखा गया था. रिसर्च में यह भी देखा गया कि जो बीज पानी की सतह के ज्यादा करीब थे, उन्होंने आवाज को बेहतर तरीके से सुना और ज्यादा तेज रिस्पॉन्स दिया. (Photo : Generative AI)
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पौधे अपनी सुरक्षा और बेहतर ग्रोथ के लिए माहौल के हिसाब से खुद को ढालने में माहिर होते हैं. कुदरत ने उन्हें जीवित रहने के लिए कई अद्भुत हथियार दिए हैं. उदाहरण के तौर पर, कुछ पौधे छूने पर अपनी पत्तियां बंद कर लेते हैं, तो कुछ जहरीली गंध मिलते ही खुद को सिकोड़ लेते हैं. लगभग सभी पौधे सूरज की रोशनी की तरफ अपना रुख मोड़ लेते हैं. इसी तरह ग्रैविटी को सेंस करना भी उनकी एक जन्मजात खूबी है. जड़ें हमेशा नीचे की ओर गहरी जाती हैं और तना हमेशा ऊपर की ओर बढ़ता है. यह सब उन्हीं छोटे स्टेटोलिथ की वजह से संभव होता है. जब बारिश इन स्टेटोलिथ को हिलाती है, तो बीज को यह समझ आ जाता है कि ऊपर पानी मौजूद है और उसे भरपूर नमी मिलने वाली है. यह उनके बचने यानी सर्वाइवल के लिए एक कुदरती चालाकी है. अगर बीज को सही समय पर पता चल जाए कि बाहर बारिश हो रही है, तो वह सही गहराई पर रहकर नमी सोख सकता है और सुरक्षित तरीके से जमीन की सतह तक पहुंच सकता है
एमआईटी के रिसर्चर्स का मानना है कि बारिश की आवाज की तरह ही हवा की सरसराहट और अन्य कुदरती हलचलें भी पौधों को प्रभावित कर सकती हैं. वे अब इस बात पर गहराई से रिसर्च करने की प्लानिंग कर रहे हैं कि क्या पौधे अन्य तरह के म्यूजिक या प्राकृतिक वाइब्रेशन को भी पहचानते हैं. प्रोफेसर माक्रिस कहते हैं कि यह स्टडी पौधों की ग्रैविटी सेंस करने वाली पुरानी रिसर्च को एक पूरी तरह नया आयाम और दिशा देती है. यह रिसर्च जापान की उस सदियों पुरानी कहावत को भी साइंटिफिक रूप से सच साबित करती है जिसमें कहा गया है कि ‘गिरती हुई बारिश मिट्टी को गहरी नींद से जगा देती है’. अब मॉडर्न साइंस ने भी आधिकारिक तौर पर मान लिया है कि बारिश सिर्फ प्यास बुझाने के काम नहीं आती, बल्कि वह सोई हुई जिंदगी को पुकारने और उसे नया जीवन देने का एक बहुत बड़ा जरिया भी है.
इस रिसर्च के परिणाम भविष्य में खेती करने के तरीकों को पूरी तरह बदल सकते हैं. अगर हम यह जान गए हैं कि खास तरह की आवाजें बीजों को जल्दी उगाने में मदद करती हैं, तो इसका इस्तेमाल पैदावार बढ़ाने में किया जा सकता है. वैज्ञानिक अब ऐसे ‘साउंड ट्रीटमेंट’ पर विचार कर रहे हैं, जो बिना किसी केमिकल के बीजों की ग्रोथ को तेज कर सकें. इससे कम समय में ज्यादा फसल उगाने में मदद मिल सकती है. खासकर उन इलाकों में जहां बारिश कम होती है, वहां साउंड वाइब्रेशन तकनीक का इस्तेमाल करके बीजों को जल्दी अंकुरित किया जा सकता है. यह तकनीक पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित है क्योंकि इसमें किसी भी तरह के खाद या कीटनाशक का उपयोग नहीं होता. आने वाले समय में किसान शायद अपने खेतों में खास तरह के ‘साउंड सिस्टम’ का इस्तेमाल करते हुए नजर आएं.
अक्सर लोग कहते हैं कि पौधों से बात करने या उन्हें संगीत सुनाने से वे बेहतर तरीके से बढ़ते हैं. पहले इसे सिर्फ एक अंधविश्वास माना जाता था, लेकिन एमआईटी की इस नई स्टडी ने इस बहस को फिर से जिंदा कर दिया है. अगर बीज बारिश के शोर पर रिएक्ट कर सकते हैं, तो यह मुमकिन है कि वे घर के अंदर होने वाले शोर या संगीत पर भी अपनी प्रतिक्रिया देते हों. हालांकि घर के अंदर की आवाजें बारिश जितनी शक्तिशाली नहीं होतीं, लेकिन उनके सूक्ष्म वाइब्रेशन पौधों के सेल्स को प्रभावित जरूर कर सकते हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि पौधों के पास कान नहीं होते, लेकिन उनकी पूरी बॉडी एक रिसीवर की तरह काम करती है जो वातावरण में होने वाली हर छोटी हलचल को महसूस करती है.
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