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​संविधान के एक शब्द की ताकत… कैसे बिना जनमत संग्रह के बंट गया आंध्र प्रदेश? बना 29वां राज्य तेलंगाना

2014 में आंध्र प्रदेश दो हिस्सों में बंट गया. तेलंगाना भारत का 29वां राज्य बना. उसकी अपनी सरकार थी, अपनी विधानसभा थी और उसकी अपनी राजधानी थी. संसद ने कानून बनाया. देश के नक्शे पर एक सीमा बदल गई. कई दशकों से साथ रहा एक राज्य अब पहले जैसा नहीं रहा. इसके लिए प्रभावित राज्यों में कोई जनमत संग्रह नहीं कराया गया. दोनों राज्यों की विधानसभाओं की सर्वसम्मति भी जरूरी नहीं थी. संसद ने, संविधान से मिली अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए, देश के भीतर एक राज्य की सीमा बदल दी.

​संविधान के एक शब्द की ताकत… कैसे बिना जनमत संग्रह के बंट गया आंध्र प्रदेश? बना 29वां राज्य तेलंगाना

अगर आपको यह पहली नजर में ऐसा लगता है कि ऐसा कानूनी तौर पर संभव नहीं होना चाहिए, तो इसका जवाब हमारे संविधान की पहली ही पंक्ति में छिपा है. संविधान कहता है, India, that is Bharat, shall be a Union of States. यानी भारत, राज्यों का एक संघ होगा. ध्यान देने वाली बात यह है कि संविधान ने भारत को केवल राज्यों का फेडरेशन नहीं कहा. उसने Union शब्द चुना. यह केवल भाषा का फर्क नहीं था. इस शब्द पर संविधान सभा में बहस हुई थी और डॉ. बी. आर. आंबेडकर, जो संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे, उन्होंने समझाया था कि Union शब्द जानबूझकर चुना गया था.

अमेरिका बनाम भारत: कितनी अलग है स्थिति?

एक सामान्य फेडरेशन की कल्पना यह होती है कि पहले से स्वतंत्र राज्य अपनी इच्छा से एक साथ आते हैं और एक संघ बनाते हैं. अमेरिका की तेरह कॉलोनियां 1787 में इसी तरह एक संघीय व्यवस्था में आई थीं. अगर कोई व्यवस्था स्वतंत्र इकाइयों के आपसी समझौते से बनती है, तो आगे एक सवाल भी उठ सकता है. अगर वे अपनी इच्छा से साथ आई थीं, तो क्या वे अपनी इच्छा से अलग भी हो सकती हैं? अमेरिका में यही सवाल 1861 में एक बड़ा विवाद बना. दक्षिणी राज्यों ने अलग होने का दावा किया और फिर अमेरिकी गृहयुद्ध हुआ. आखिरकार यह सवाल युद्ध के जरिए तय हुआ.

डॉ. भीमराव आंबेडकर.

आंबेडकर इस इतिहास से परिचित थे. भारत के संविधान निर्माताओं ने शुरू से ही इस सवाल को खुला नहीं छोड़ना चाहा. भारत के राज्य उस तरह स्वतंत्र देश नहीं थे जो अपनी संप्रभु इच्छा से बैठकर एक समझौता करते और फिर भारत नाम का संघ बनाते. जिन क्षेत्रों से भारत बना, उनमें ब्रिटिश भारत के प्रांत थे और सैकड़ों रियासतें थीं. वे अलगअलग स्वतंत्र देशों की तरह किसी समझौते पर हस्ताक्षर करके भारत में शामिल नहीं हुई थीं. वे एक बड़े राजनीतिक और संवैधानिक एकीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा बनीं.

इसलिए आंबेडकर का तर्क था कि जब शुरुआत में राज्यों के बीच ऐसा कोई समझौता था ही नहीं, तो बाद में किसी राज्य को उस समझौते से बाहर निकलने का अधिकार भी नहीं हो सकता. भारत का संघ इसलिए Union है क्योंकि उसका अस्तित्व किसी ऐसे समझौते पर निर्भर नहीं है जिसे कोई राज्य बाद में वापस ले सके.

इसे समझने का एक और सीधा तरीका है. अमेरिका के बारे में संवैधानिक बहस में अक्सर यह कहा गया कि वहां एक ऐसा संघ बना जिसमें राज्य अपनी जगह मजबूत संवैधानिक इकाइयां थे. भारत ने इसके विपरीत व्यवस्था बनाई. भारत का संघ अटूट है, लेकिन उसके भीतर के राज्य बदले जा सकते हैं. देश को कोई राज्य खत्म नहीं कर सकता. लेकिन संसद किसी राज्य को बांट सकती है, उसे दूसरे राज्य के साथ मिला सकती है, उसका नाम बदल सकती है या उसकी सीमाएं बदल सकती है.

भारत का संघ अटूट है, लेकिन उसके भीतर के राज्य बदले जा सकते हैं. फोटो: AI Generated

आंध्र प्रदेश का 2014 में बंटना इसका एक उदाहरण है. 1956 में भाषाई आधार पर भारत के नक्शे में जो बड़े बदलाव हुए, वे भी इसी संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा थे. यह कोई छोटी कानूनी बात नहीं है. यही वह व्यवस्था है जिसने भारत को सैकड़ों रियासतों को एक देश में शामिल करने, समयसमय पर अपनी अंदरूनी सीमाएं बदलने और नए राज्यों को बनाने की क्षमता दी.

भारत का नक्शा कई बार बदला

भारत का नक्शा एक बार नहीं बदला. वह कई बार बदला है. नए राज्य बने हैं. पुराने राज्यों की सीमाएं बदली हैं. राज्यों के नाम बदले हैं. कई बार पूरे इलाके की राजनीतिक पहचान बदली है. लेकिन इन बदलावों के साथ यह सवाल कभी नहीं उठा कि क्या भारत को एक देश बने रहने का अधिकार है. भारत ने अपनी अंदरूनी रेखाएं बदलीं, लेकिन खुद को खत्म नहीं किया.

इसका यह मतलब भी नहीं है कि केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति का सवाल खत्म हो गया. जिस राज्य की सीमा संसद बदल सकती है, या जिसकी विशेष संवैधानिक व्यवस्था में संसद बदलाव कर सकती है, उस राज्य की सरकार स्वाभाविक रूप से अपने अधिकारों और अपनी स्वायत्तता को लेकर सवाल उठा सकती है. केंद्र के पास कितनी शक्ति होनी चाहिए, राज्यों के पास कितनी शक्ति होनी चाहिए और राज्यों की स्वायत्तता की सीमा क्या होनी चाहिए, यह भारत की राजनीति में आज भी बहस का विषय है.

भारतीय संविधान.

समयसमय पर नए राज्यों की मांग उठी

Union शब्द ने केवल एक मूल संवैधानिक बात साफ की थी. किसी राज्य को भारत से अलग होने का अधिकार नहीं है. इस शब्द ने केंद्र और राज्यों के बीच हर दिन की हर शक्ति का सवाल हमेशा के लिए तय नहीं किया.

लेकिन भारत की यह मूल संवैधानिक रचना पिछले पचहत्तर वर्षों में बनी रही. विभाजन हुआ. पांच सौ से अधिक रियासतों का भारत में एकीकरण हुआ. भाषा को लेकर आंदोलन हुए. अलगअलग हिस्सों में विद्रोह और असंतोष हुआ. नए राज्यों की मांग बारबार उठी. हर बार भारत ने अपने भीतर की रेखाओं को बदला. कहीं राज्य बने, कहीं सीमाएं बदलीं, कहीं नाम बदले. लेकिन भारत के बने रहने पर सवाल नहीं उठाया गया. देश ने अपने नक्शे को बदलने की क्षमता दिखाई, अपने अस्तित्व को बदलने की नहीं.

इसलिए अगली बार जब किसी नए राज्य की मांग उठे, या किसी पुराने राज्य की सीमा बदलने की बात हो, तो यह याद रखना जरूरी है कि वास्तव में वहां क्या हो रहा है. यह भारत के टूटने की प्रक्रिया नहीं है. यह उस संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल है जो भारत के संविधान ने शुरू से अपने संघ को दी थी. 1949 में संविधान बनाते समय Union शब्द सोचसमझकर चुना गया था. भारत अपने भीतर के नक्शे को बदल सकता है. कोई राज्य भारत के नक्शे से भारत को मिटा नहीं सकता.

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