
देवास, मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश के देवास शहर में स्थित माता टेकरी श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का प्रमुख केंद्र है। करीब 300 फीट ऊंची इस पहाड़ी पर मां तुलजा भवानी और मां चामुंडा के मंदिर स्थित हैं। दोनों देवियों को स्थानीय परंपरा में क्रमशः बड़ी मां और छोटी मां के नाम से जाना जाता है। इस धाम की खासियत केवल दोनों देवियों के मंदिर ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी प्राचीन मान्यताएं, लोककथाएं और ऐतिहासिक परंपराएं भी हैं।
मालवा क्षेत्र में माता टेकरी को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है। सालभर यहां भक्त दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं, जबकि नवरात्रि के दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। पहाड़ी पर स्थित दोनों देवियों के धाम लंबे समय से स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा रहे हैं।
माता सती के रक्त से जुड़ी है रक्तपीठ की मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवास की माता टेकरी को शक्तिपीठ और रक्तपीठ के रूप में भी देखा जाता है। पौराणिक कथा के मुताबिक, जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को कई भागों में विभाजित किया था। लोकमान्यता है कि इसी प्रसंग के दौरान माता सती के रक्त की बूंदें देवास की इस पहाड़ी पर गिरी थीं।
हालांकि, इस कथा को धार्मिक मान्यता और लोकपरंपरा के रूप में ही देखा जाना चाहिए। माता टेकरी की प्रसिद्धि का प्रमुख आधार यहां सदियों से चली आ रही देवी उपासना और श्रद्धालुओं की आस्था है।
एक ही पहाड़ी पर विराजती हैं बड़ी मां और छोटी मां
देवास माता टेकरी की सबसे खास बात यह है कि यहां मां तुलजा भवानी और मां चामुंडा के मंदिर एक ही पहाड़ी पर स्थित हैं। दोनों देवियों को अलग-अलग पवार राजघरानों की कुलदेवी के रूप में भी पूजा जाता रहा है।
मां तुलजा भवानी को बड़ी मां कहा जाता है। मंदिर में स्थापित उनकी प्रतिमा को स्थानीय श्रद्धालु स्वयंभू यानी स्वयं प्रकट हुई मानते हैं। तुलजा भवानी का संबंध महाराष्ट्र के तुलजापुर स्थित प्रसिद्ध देवी मंदिर की परंपरा से भी जोड़ा जाता है। मराठा इतिहास में मां तुलजा भवानी का विशेष स्थान रहा है और छत्रपति शिवाजी महाराज की आराध्य देवी के रूप में भी उनकी व्यापक श्रद्धा रही है।
वहीं, मां चामुंडा को छोटी मां के नाम से जाना जाता है। स्थानीय मान्यताओं में उन्हें पहाड़ी को चीरकर प्रकट होने वाली देवी बताया जाता है। इसी वजह से उनके स्वरूप को रक्तवाहिनी चामुंडा के नाम से भी संबोधित किया जाता है। देवास के पवार राजपरिवार की परंपराओं में मां चामुंडा की पूजा का विशेष महत्व रहा है।
दोनों देवियों के बीच विवाद की अनोखी लोककथा
माता टेकरी से जुड़ी सबसे चर्चित लोककथाओं में बड़ी मां और छोटी मां के बीच विवाद का प्रसंग भी शामिल है। स्थानीय पुजारियों और जनश्रुतियों के अनुसार, दोनों देवियों को बहनों के समान माना जाता है। कथा कहती है कि एक बार किसी बात को लेकर दोनों के बीच विवाद हो गया और नाराज होकर वे अपने-अपने स्थान से जाने लगीं।
मान्यता के मुताबिक, बड़ी मां तुलजा भवानी धरती के भीतर समाने लगीं, जबकि छोटी मां चामुंडा पहाड़ी छोड़कर आगे बढ़ने लगीं। यह देखकर टेकरी के रक्षक माने जाने वाले भगवान हनुमान और भैरव बाबा ने दोनों देवियों से वहीं रुकने और अपना क्रोध शांत करने की प्रार्थना की।
कथा के अनुसार, उनकी प्रार्थना स्वीकार करने के बाद दोनों देवियां वहीं रुक गईं। स्थानीय लोग इस लोककथा को दोनों प्रतिमाओं की बनावट से भी जोड़ते हैं। कहा जाता है कि मां तुलजा भवानी की प्रतिमा का कुछ हिस्सा जमीन के भीतर दिखाई देता है, जबकि मां चामुंडा की प्रतिमा का झुकाव ऐसा प्रतीत होता है, मानो वे आगे बढ़ रही हों। यह प्रसंग स्थानीय धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, न कि प्रमाणित ऐतिहासिक घटना।
बालिका के रूप में दर्शन देने की मान्यता
देवास माता टेकरी से जुड़ी जनश्रुतियों में देवी के बालिका रूप में दर्शन देने की कथाएं भी सुनने को मिलती हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से प्रार्थना और तपस्या करने वाले भक्तों पर माता विशेष कृपा करती हैं।
कुछ स्थानीय कथाओं में रात के समय पहाड़ी पर पायल की आवाज सुनाई देने और दिव्य प्रकाश दिखाई देने का भी उल्लेख मिलता है। इन बातों को श्रद्धालु देवी की उपस्थिति से जोड़ते हैं, हालांकि ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है।
मन्नत का धागा बांधने आते हैं श्रद्धालु
माता टेकरी पर बड़ी मां और छोटी मां के दर्शन के लिए दूर-दूर से भक्त पहुंचते हैं। धार्मिक विश्वास के अनुसार, श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं और मन्नत का धागा बांधते हैं। इच्छा पूरी होने पर कई भक्त दोबारा मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और देवी को भोग अर्पित करते हैं।
संतान सुख, परिवार की खुशहाली, रोजगार और कारोबार से जुड़ी परेशानियों को लेकर भी लोग माता के दरबार में प्रार्थना करते हैं। हालांकि, बीमारी या अन्य समस्याओं के समाधान के लिए धार्मिक आस्था के साथ जरूरी चिकित्सा और व्यावहारिक सहायता लेना भी महत्वपूर्ण है।
टेकरी पर भैरव बाबा और हनुमान मंदिर का भी महत्व
माता टेकरी केवल दो प्रमुख देवी मंदिरों तक सीमित नहीं है। पहाड़ी पर और उसके आसपास कई अन्य धार्मिक स्थल भी श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े हैं। इनमें भैरव बाबा और हनुमान मंदिर का विशेष महत्व माना जाता है।
स्थानीय परंपरा में भैरव बाबा को टेकरी का रक्षक माना जाता है। कई श्रद्धालु माता के दर्शन के बाद भैरव बाबा के दर्शन भी करते हैं। हनुमान मंदिर का संबंध उस लोककथा से जोड़ा जाता है, जिसमें भगवान हनुमान दोनों देवियों से पहाड़ी पर रुकने की प्रार्थना करते हैं।
इसके अलावा, यहां महाकाली और खो-खो माता से जुड़े धार्मिक स्थल भी बताए जाते हैं। खो-खो माता के मंदिर को लेकर स्थानीय मान्यता है कि बच्चों की खांसी और मौसमी परेशानियों से राहत की कामना के लिए परिवार यहां पूजा-अर्चना करते हैं।
नवरात्रि में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
देवास की माता टेकरी पर वर्षभर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान यहां विशेष रौनक देखने को मिलती है। इन दिनों मंदिरों में पूजा-पाठ, आरती और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु दोनों देवियों के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
देवास माता टेकरी की पहचान यहां की धार्मिक मान्यताओं, पवार राजघरानों से जुड़ी परंपराओं और बड़ी मां-छोटी मां की अनोखी लोककथा के कारण बनी हुई है। एक ही पहाड़ी पर दोनों देवियों के मंदिर इस स्थान को मालवा के प्रमुख आस्था केंद्रों में शामिल करते हैं।
सत्य रिपोर्ट डिस्क्लेमर: इस लेख में वर्णित चमत्कारों और देवी से जुड़ी कथाओं का आधार स्थानीय मान्यताएं एवं धार्मिक लोकपरंपराएं हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक नहीं कि उपलब्ध हो।



