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पूरी​​​ जिंदगी में सिर्फ एक बार नहाती हैं इस जनजाति की महिलाएं? लाल रंग की त्वचा और अनोखी परंपरा के पीछे छिपी है दिलचस्प कहानी

पूरी​​​ जिंदगी में सिर्फ एक बार नहाती हैं इस जनजाति की महिलाएं? लाल रंग की त्वचा और अनोखी परंपरा के पीछे छिपी है दिलचस्प कहानी

अफ्रीका में कई ऐसे समुदाय रहते हैं, जिनकी जीवनशैली और परंपराएं दुनिया के दूसरे हिस्सों से काफी अलग हैं। ऐसा ही एक समुदाय है नामीबिया की हिम्बा जनजाति (Himba Tribe)। इस जनजाति की महिलाओं को देखकर सबसे पहले ध्यान उनकी लाल-नारंगी रंग की त्वचा, खास तरह के हेयरस्टाइल और पारंपरिक गहनों पर जाता है।

हिम्बा महिलाओं की खूबसूरती और उनकी जीवनशैली को लेकर इंटरनेट पर एक दावा अक्सर चर्चा में रहता है कि ये महिलाएं पूरी जिंदगी में सिर्फ एक बार नहाती हैं। लेकिन इस दावे को पूरी तरह सच मानना सही नहीं है। दरअसल, नामीबिया के शुष्क इलाके में पानी की सीमित उपलब्धता के कारण हिम्बा समुदाय में शरीर की सफाई के पारंपरिक तरीके विकसित हुए हैं। इनमें खास तरह के लेप और सुगंधित धुएं का इस्तेमाल शामिल है।

आइए जानते हैं हिम्बा जनजाति की महिलाओं की जीवनशैली, उनकी अनोखी परंपराओं और लाल रंग की त्वचा के पीछे की वजह।

कहां रहती है हिम्बा जनजाति?

हिम्बा जनजाति मुख्य रूप से अफ्रीकी देश नामीबिया के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में रहती है। इनका प्रमुख निवास क्षेत्र कुनेने प्रांत है। इस समुदाय के कुछ लोग पड़ोसी देश अंगोला के दक्षिणी हिस्से में भी रहते हैं।

हिम्बा समुदाय पारंपरिक रूप से पशुपालन पर निर्भर रहा है। यहां के लोग गाय, बकरी और भेड़ जैसे पशु पालते हैं। पानी और चरागाह की उपलब्धता के अनुसार कुछ परिवार एक स्थान से दूसरे स्थान पर भी जाते हैं।

रेगिस्तानी और अर्ध-शुष्क वातावरण में रहने के कारण यहां पानी की उपलब्धता कई बार सीमित रहती है। इसी परिस्थिति ने इनके रहन-सहन और दैनिक परंपराओं को प्रभावित किया है।

क्या हिम्बा महिलाएं सच में पूरी जिंदगी में सिर्फ एक बार नहाती हैं?

हिम्बा महिलाओं के बारे में यह दावा काफी मशहूर है कि वे पूरी जिंदगी में केवल एक बार स्नान करती हैं। कुछ लोकप्रिय कहानियों में यह भी कहा जाता है कि शादी के दिन ही उन्हें पानी से नहाने की अनुमति मिलती है।

हालांकि, इस दावे को पूरी जनजाति की महिलाओं पर लागू करना सही नहीं है। उपलब्ध सांस्कृतिक और शोध संबंधी जानकारियां बताती हैं कि पानी की कमी के कारण पारंपरिक हिम्बा जीवनशैली में नियमित पानी से स्नान करने के बजाय शरीर की सफाई के दूसरे तरीके अपनाए जाते रहे हैं।

इनमें सुगंधित पौधों को जलाकर निकलने वाले धुएं से शरीर और कपड़ों को साफ-सुगंधित करने की परंपरा भी शामिल है। इसे स्मोक बाथ कहा जाता है। इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि हिम्बा समुदाय में पानी से स्नान की जगह पारंपरिक सफाई के अलग तरीके प्रचलित रहे हैं।

लाल रंग की त्वचा का क्या है राज?

हिम्बा महिलाओं की सबसे खास पहचान उनकी लाल-नारंगी रंग की त्वचा है। इसके पीछे ‘ओटजिजे’ (Otjize) नामक पारंपरिक लेप का इस्तेमाल होता है।

यह लेप लाल गेरू यानी प्राकृतिक लाल मिट्टी के रंगद्रव्य और पशु की चर्बी या मक्खन जैसे वसायुक्त पदार्थों को मिलाकर तैयार किया जाता है। कुछ पारंपरिक मिश्रणों में सुगंधित पौधों और जड़ी-बूटियों का भी इस्तेमाल किया जाता है।

महिलाएं इस लेप को अपनी त्वचा और बालों पर लगाती हैं। इससे शरीर और बालों को विशिष्ट लाल-नारंगी रंग मिलता है। यह परंपरा सिर्फ सजने-संवरने से जुड़ी नहीं है, बल्कि हिम्बा समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और सौंदर्य की पारंपरिक सोच का भी हिस्सा है।

बालों का अनोखा हेयरस्टाइल भी है खास पहचान

हिम्बा महिलाओं के बालों का अंदाज भी काफी अलग होता है। वे बालों की कई चोटियां बनाती हैं और उन पर लाल रंग का पारंपरिक लेप लगाती हैं।

उनके हेयरस्टाइल से उम्र और सामाजिक स्थिति से जुड़ी पहचान भी दिखाई दे सकती है। लड़कियों, अविवाहित महिलाओं और विवाहित महिलाओं के बालों की सजावट में अंतर देखने को मिलता है।

बालों को सजाने के लिए पारंपरिक आभूषण और दूसरी सजावटी चीजों का भी इस्तेमाल किया जाता है। यह उनकी संस्कृति और समुदाय की परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।

सुगंधित धुएं से करती हैं शरीर की सफाई

हिम्बा समुदाय की एक दिलचस्प परंपरा स्मोक बाथ है। इसमें महिलाएं सुगंधित जड़ी-बूटियों और पेड़ों की राल को जलाकर निकलने वाले धुएं का इस्तेमाल करती हैं।

वे धुएं को शरीर और कपड़ों के आसपास फैलाती हैं। इस प्रक्रिया का संबंध उनकी पारंपरिक स्वच्छता, सुगंध और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों से है।

यह तरीका सामान्य पानी से नहाने जैसा नहीं है, बल्कि शुष्क वातावरण में विकसित हुई एक अलग परंपरा है।

क्या ओटजिजे त्वचा को धूप से भी बचाता है?

हिम्बा महिलाओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले लाल गेरू के लेप पर वैज्ञानिकों ने भी अध्ययन किया है। शोध में पाया गया है कि इसमें मौजूद लौह ऑक्साइड सूर्य की कुछ पराबैंगनी किरणों को रोकने की क्षमता रखता है।

ओटजिजे का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से त्वचा को शुष्क वातावरण से बचाने और सौंदर्य बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है। हालांकि, इसे आधुनिक सनस्क्रीन का पूरी तरह विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

हिम्बा जनजाति की संस्कृति क्यों है इतनी खास?

हिम्बा समुदाय की पहचान सिर्फ उनके पहनावे या लाल रंग की त्वचा तक सीमित नहीं है। पशुपालन, पारिवारिक परंपराएं, आभूषण, बालों की सजावट और प्रकृति के साथ उनका संबंध उनकी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं।

उनकी जीवनशैली यह भी दिखाती है कि अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में रहने वाले समुदाय अपनी जरूरतों और परंपराओं के अनुसार जीवन जीने के अलग तरीके विकसित करते हैं।

इसलिए हिम्बा महिलाओं की कहानी को केवल इस दावे तक सीमित नहीं करना चाहिए कि वे कितनी बार नहाती हैं। उनकी पारंपरिक सफाई की विधियां, ओटजिजे का इस्तेमाल और अनोखी सांस्कृतिक पहचान ही इस समुदाय को दुनिया के दूसरे समुदायों से अलग बनाती हैं।

सत्‍यापन संबंधी नोट: हिम्बा महिलाओं के जीवनभर में केवल एक बार नहाने का दावा प्रमाणित तथ्य नहीं है। पानी की सीमित उपलब्धता और पारंपरिक स्वच्छता के तरीकों को ध्यान में रखते हुए इस विषय को समझना चाहिए।

— Satya Report

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