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बिच्छू घास छूते ही होती है तेज जलन, फिर भी औषधीय गुणों के लिए है बेहद खास.

बिच्छू घास छूते ही होती है तेज जलन, फिर भी औषधीय गुणों के लिए है बेहद खास.

उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में कई ऐसी जड़ी-बूटियां और वनस्पतियां पाई जाती हैं, जिनका इस्तेमाल स्थानीय लोग लंबे समय से पारंपरिक उपचार और भोजन में करते आए हैं। इन्हीं में एक नाम बिच्छू घास का भी है। इसे कई जगहों पर कंडाली के नाम से जाना जाता है।

इस पौधे की खासियत यह है कि इसे छूने पर त्वचा में तेज चुभन, जलन और खुजली महसूस हो सकती है। यही वजह है कि लोग इससे दूरी बनाकर रखते हैं। हालांकि, सही तरीके से प्रसंस्करण करने के बाद इस पौधे का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से भोजन और कई अन्य उपयोगों में किया जाता रहा है।

छूते ही क्यों होती है जलन?

बिच्छू घास की पत्तियों और तनों पर बेहद बारीक बाल जैसे ढांचे होते हैं, जिन्हें ट्राइकोम कहा जाता है। इनके संपर्क में आने पर त्वचा में जलन और खुजली हो सकती है। इन संरचनाओं से निकलने वाले कुछ रसायन इस प्रतिक्रिया के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं।

यह पौधे की प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है, जो इसे जानवरों और कीड़ों से बचाने में मदद करती है।

पोषक तत्वों से भरपूर मानी जाती है बिच्छू घास

बिच्छू घास की पत्तियों में कई पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसमें आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम और विटामिन ए, सी व के जैसे पोषक तत्व मौजूद हो सकते हैं। इसमें प्रोटीन भी पाया जाता है।

इसी कारण कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी पत्तियों को उचित तरीके से तैयार करके साग, सूप और अन्य पारंपरिक व्यंजनों में इस्तेमाल किया जाता है।

हालांकि, इसे सीधे कच्चा खाना या बिना सही तरीके से तैयार किए इस्तेमाल करना सुरक्षित नहीं माना जाता, क्योंकि इसके रेशों और बालों से त्वचा तथा मुंह में जलन हो सकती है।

पारंपरिक चिकित्सा में भी होता रहा है इस्तेमाल

पहाड़ी क्षेत्रों की पारंपरिक चिकित्सा में बिच्छू घास का इस्तेमाल लंबे समय से किया जाता रहा है। खासतौर पर जोड़ों और मांसपेशियों से जुड़ी तकलीफों के लिए इसके विभिन्न पारंपरिक प्रयोग बताए जाते हैं।

कुछ जगहों पर इसके पत्तों को प्रभावित हिस्से से संपर्क कराने की पारंपरिक विधि का भी उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि इससे स्थानीय स्तर पर रक्त संचार बढ़ सकता है और दर्द में कुछ राहत महसूस हो सकती है।

हालांकि, ऐसे पारंपरिक उपायों को आधुनिक चिकित्सा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

सूजन और अन्य स्वास्थ्य लाभों पर हो रही है रिसर्च

बिच्छू घास में कई जैव सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं और इसके संभावित एंटी-इंफ्लेमेटरी प्रभावों पर शोध हुआ है। कुछ अध्ययनों में इसके अर्क को सूजन और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों के संदर्भ में जांचा गया है।

इसके अलावा, रक्त शर्करा, मूत्रवर्धक प्रभाव और त्वचा व बालों से जुड़े संभावित उपयोगों पर भी शोध मौजूद है। लेकिन इन सभी दावों को पक्के इलाज के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। इंसानों में इसके प्रभाव, सही मात्रा और लंबे समय तक इस्तेमाल की सुरक्षा को लेकर अभी और वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत है।

कैंसर को लेकर क्या है दावा?

बिच्छू घास के कुछ यौगिकों पर प्रयोगशाला स्तर पर शोध हुआ है और उनमें संभावित जैविक गतिविधियां देखी गई हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बिच्छू घास कैंसर का इलाज करती है।

कैंसर रोधी प्रभाव से जुड़े दावों के लिए अभी पर्याप्त मानव-आधारित प्रमाण नहीं हैं। इसलिए इसे कैंसर के इलाज या दवा के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

कपड़े और दूसरे उत्पादों में भी हो सकता है इस्तेमाल

बिच्छू घास की एक और खासियत इसके मजबूत रेशे हैं। इनसे धागे और कपड़ा तैयार करने की संभावनाओं पर भी काम हुआ है। पहाड़ी क्षेत्रों में इसके रेशों से पारंपरिक रूप से अलग-अलग वस्तुएं तैयार किए जाने की जानकारी मिलती है।

पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच प्राकृतिक रेशों की मांग बढ़ रही है। ऐसे में बिच्छू घास भविष्य में स्थानीय लोगों के लिए छोटे स्तर के उद्योग और रोजगार का जरिया बन सकती है।

उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों के लिए बन सकता है रोजगार का साधन

अगर इसकी खेती, कटाई और प्रसंस्करण को वैज्ञानिक और टिकाऊ तरीके से विकसित किया जाए तो बिच्छू घास स्थानीय समुदायों के लिए अतिरिक्त आय का माध्यम बन सकती है।

इससे खाद्य उत्पाद, प्राकृतिक फाइबर और पारंपरिक उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। हालांकि, इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सुरक्षित प्रसंस्करण पर विशेष ध्यान देना जरूरी होगा।

बिच्छू घास देखने में भले ही आम और चुभने वाला पौधा लगे, लेकिन इसके पोषण, पारंपरिक उपयोग और प्राकृतिक रेशों की वजह से इसमें कई संभावनाएं छिपी हैं। यही वजह है कि पहाड़ी इलाकों में पाई जाने वाली यह वनस्पति अब सिर्फ एक जंगली घास नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, खाद्य और स्थानीय रोजगार के लिहाज से संभावनाओं वाला पौधा मानी जा रही है।

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