फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस ने एविएशन टर्बाइन फ्यूल के मौजूदा मूल्य निर्धारण तरीके की समीक्षा की मांग की है. संगठन ने कहा कि घरेलू एटीएफ की कीमत इंटरनेशनल स्टैंडर्ड प्राइसिंग के बजाय रियल कॉस्ट और उचित मार्जिन के आधार पर तय की जानी चाहिए. एफआईए ने कहा कि भूराजनीतिक तनाव और रुपए में गिरावट के कारण ईंधन की लागत में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, जिससे एयरलाइन कंपनियों के नकदी प्रवाह पर भारी दबाव पड़ रहा है. आंकड़ों को देखें तो बीते तीन महीने में एटीएफ की कीमत में 25 फीसदी का इजाफा देखने को मिल चुका है.

कॉस्ट में हुआ इजाफा
पिछले महीने के अंत में नागर विमानन मंत्रालय को लिखे एक पत्र में एफआईए ने यह भी कहा कि अगर समय पर राहत नहीं मिली, तो एयरलाइंस कई गैरव्यावहारिक मार्गों से अपनी सेवाएं वापस लेने के लिए मजबूर हो सकती हैं. एयर इंडिया, इंडिगो और स्पाइसजेट एफआईए के सदस्य हैं. संगठन ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में एयरलाइन कंपनियों की परिचालन लागत लगभग 3040 प्रतिशत से बढ़कर करीब 5560 प्रतिशत हो गई है, जिसमें एटीएफ सबसे बड़ा खर्च बना हुआ है. पश्चिम एशिया में मौजूदा संघर्ष ने ब्रेंट क्रूड को 72 डॉलर प्रति बैरल से 118 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा दिया है. इसके चलते एटीएफ की कीमत 87.24 डॉलर से बढ़कर 260.24 डॉलर प्रति बैरल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई और इस समय यह 175.33 डॉलर प्रति बैरल पर है, जो मार्च, 2025 की तुलना में काफी अधिक है.
सरकार से क्या किया अनुरोध
एफआईए ने सरकार से अनुरोध किया कि वह एटीएफ के लिए अपनाए जा रहे मूल्य निर्धारण के तरीके की समीक्षा करे और औसत 1012 डॉलर प्रति बैरल के मुकाबले 60 डॉलर प्रति बैरल के असामान्य मार्जिन को कम करे. संस्था ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क मूल्य निर्धारण के बजाय लागत और उस पर उचित लाभ के मूल्य निर्धारण मॉडल को अपनाकर इसे हासिल किया जा सकता है. आपको बता दें कि अक्टूबर के महीने में जेट फ्यूल के दाम में 13 फीसदी से ज्यादा का इजाफा देखने को मिला था. अक्टूबर के महीने में जेट फ्यूल के दाम में लगातार तीसरे महीने इजाफा हुआ. इस दौरान जेट फ्यूल की कीमत में 25 फीसदी का इजाफा देखने को मिल चुका है.



