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इस बार कम बारिश बिगाड़ेगी आपके घर का बजट, महंगी हो सकती है दाल-रोटी!

Satya Report: भारत में बारिश सिर्फ एक मौसम का बदलाव नहीं है, बल्कि यह पूरी अर्थव्यवस्था को चलाने वाला एक बड़ा स्विच है. अगर आने वाले दिनों में आपके घर की सब्जियों का बिल अचानक बढ़ जाता है, तो इसके पीछे बादलों की चाल जिम्मेदार हो सकती है. हमारी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा आज भी खेती पर निर्भर है. अच्छी बारिश का मतलब है भरपूर फसल, ग्रामीण इलाकों में बेहतर आमदनी और खानेपीने की चीजों के स्थिर दाम. लेकिन, अगर मानसून कमजोर पड़ता है, तो इसका सीधा असर महंगी सब्जियों, दालों और खाद्य तेल के रूप में हमारी थाली पर दिखने लगता है.

इस बार कम बारिश बिगाड़ेगी आपके घर का बजट, महंगी हो सकती है दाल-रोटी!
इस बार कम बारिश बिगाड़ेगी आपके घर का बजट, महंगी हो सकती है दाल-रोटी!

फिलहाल महंगाई दर में कोई बहुत बड़ा उछाल नहीं आया है, लेकिन यह धीरेधीरे ऊपर की तरफ खिसक रही है. मार्च 2026 में खुदरा महंगाई बढ़कर 3.4% हो गई है, जो फरवरी में 3.21% थी. नए 2024 बेस ईयर के हिसाब से यह लगातार तीसरे महीने की बढ़ोतरी है. ऐसे में अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि इस साल महंगाई का कुल ग्राफ ऊपर जा सकता है, और इस दबाव की शुरुआत मौसम से ही हो रही है.

‘अल नीनो’ का साया, क्या सूखेंगे खेत?

इस चिंता के पीछे सबसे बड़ी वजह मौसम विभाग का ताजा अनुमान है. IMD ने 2026 के दक्षिणपश्चिम मानसून को ‘सामान्य से नीचे’ रहने की आशंका जताई है. इसके साथ ही ‘अल नीनो’ का खतरा भी बातचीत के केंद्र में आ गया है. यह एक ऐसा मौसमी बदलाव है, जो प्रशांत महासागर के असामान्य रूप से गर्म होने से पैदा होता है और इसके कारण एशिया के बड़े हिस्सों में सूखा और भीषण गर्मी देखने को मिलती है.

आंकड़े बताते हैं कि 1980 के बाद से 70% ‘अल नीनो’ वाले वर्षों में भारत में सामान्य से कम बारिश हुई है. वैश्विक एजेंसियों का भी मानना है कि मईजून तक अल नीनो का असर दिखने लगेगा और साल के अंत तक यह काफी मजबूत हो सकता है. रेटिंग एजेंसी इक्रा के मुताबिक, यह पिछले 25 सालों के सबसे कमजोर शुरुआती अनुमानों में से एक है. एजेंसी का अनुमान है कि अगर बारिश कम होती है, तो वित्त वर्ष 2027 में खुदरा महंगाई 4.5% के पार जा सकती है और कृषि विकास दर 3% के बेसलाइन से नीचे खिसक सकती है.

जेब पर पड़ेगा भारी दबाव?

कमजोर बारिश का सीधा मतलब है बुवाई और पैदावार में कमी. इससे खानेपीने की चीजों की सप्लाई चेन प्रभावित होती है और रिटेल महंगाई बढ़ जाती है. डेलॉयट इंडिया की अर्थशास्त्री रुमकी मजूमदार का मानना है कि वैश्विक तनाव के कारण ऊर्जा की कीमतें पहले से ही ज्यादा हैं. अब अल नीनो के कारण खाद्य पदार्थों की कीमतों पर फिर से दबाव बन सकता है, जो अभी हाल ही में स्थिर होना शुरू हुए थे.

रिजर्व बैंक ने भी वित्त वर्ष 2027 के लिए अपने अनुमानों में इसका अंदेशा जताया है. RBI के मुताबिक पूरे साल की महंगाई दर 4.6% रह सकती है, लेकिन तीसरी तिमाही में यह उछलकर 5.2% तक जा सकती है. यही वह समय होता है जब मानसून का असर फसलों पर दिखता है और साथ ही त्योहारी सीजन के कारण बाजार में मांग भी चरम पर होती है.

क्या आपको घबराने की जरूरत है?

हालांकि, हर तस्वीर के दो पहलू होते हैं. एसबीआई रिसर्च ने इस बात पर जोर दिया है कि कम बारिश और महंगाई के बीच हमेशा सीधा संबंध नहीं होता. इतिहास गवाह है कि कई बार सामान्य बारिश के बावजूद महंगाई बढ़ी है , और कई बार कमजोर मानसून में भी खाद्य महंगाई दर काफी नीचे रही है.

सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि देश में अनाज का पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है. अकेले चावल का ही 380 लाख मीट्रिक टन का भंडार है, जो खरीफ की फसल में किसी भी कमी की भरपाई करने के लिए काफी है. इसके अलावा, पूरे देश की कुल बारिश से ज्यादा यह मायने रखता है कि किन इलाकों में कितनी बारिश हुई. अगर प्रमुख खेती वाले राज्यों में बारिश सामान्य रहती है, तो महंगाई का असर सीमित रहेगा. इन सब चुनौतियों के बावजूद, घरेलू खपत और निवेश के दम पर भारत की जीडीपी ग्रोथ 6.8% से 7.1% के बीच रहने की उम्मीद है.

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