पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम की घोषणा के बाद भारतीय रियल एस्टेट और घर बनाने वाले लोगों ने बड़ी राहत की सांस ली है. इस तनाव के चलते पिछले कुछ समय में देश के भीतर टाइल्स, सरिया, ईंट और पेंट जैसी जरूरी निर्माण सामग्रियों की कीमतों में 40 फीसदी तक का भारी उछाल देखा गया था. भारत का सबसे बड़ा सिरेमिक हब, गुजरात का मोरबी, गैस संकट की वजह से लगभग घुटनों पर आ गया था. अब जब युद्ध थम गया है, तो अपना आशियाना बना रहे आम उपभोक्ताओं के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या टाइल्स की कीमतें तुरंत कम होंगी या अभी थोड़ा इंतजार करना फायदेमंद रहेगा. आइए समझते हैं कि बाजार की मौजूदा जमीनी हकीकत क्या है.

मोरबी के सिरेमिक हब में आया था बड़ा संकट
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के कारण अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग और गैस आपूर्ति बुरी तरह बाधित हो गई थी. इसका सीधा असर गुजरात के मोरबी पर पड़ा, जो देश का लगभग 80 से 90 प्रतिशत टाइल्स और सैनिटरी वेयर बनाता है. मोरबी का पूरा सिरेमिक उद्योग ईंधन के रूप में प्रोपेन और प्राकृतिक गैस पर निर्भर है, जो खाड़ी देशों से आयात की जाती है.
मार्च 2026 के मध्य से गैस की किल्लत और आसमान छूती कीमतों के कारण मोरबी की लगभग 600 इकाइयों में से 400 से अधिक कारखानों को मालिकों ने स्वेच्छा से हफ्तों के लिए बंद कर दिया था. इस मंदी से जहां 4 लाख श्रमिकों की आजीविका प्रभावित हुई और उनका पलायन हुआ, वहीं अरब देशों को होने वाला 3540% निर्यात भी ठप हो गया. सप्लाई रुकने की वजह से घरेलू बाजार में टाइल्स के दाम अचानक 40% तक बढ़ गए.
सोमानी सेरामिक्स के सीईओ ने दी बड़ी चेतावनी
बाजार के इस संकट को लेकर 5 दिन पहले ही सोमानी सेरामिक्स के प्रबंध निदेशक और सीईओ, अभिषेक सोमानी का एक बड़ा बयान सामने आया था. उन्होंने एक साक्षात्कार में आगाह किया था कि मध्य पूर्व में जारी संकट और महंगी गैस के चलते भारत के लगभग 20% यानी हर 5 में से 1 अक्षम टाइल प्लांट हमेशा के लिए बंद होने की कगार पर पहुंच सकते हैं.
हालांकि, अब युद्धविराम के बाद हालात सुधरने की उम्मीद जगी है. मोरबी के बंद पड़े कारखानों में श्रमिकों को वापस बुलाने की तैयारी शुरू हो गई है. प्लास्टिक और सिरेमिक उद्योग से जुड़े उद्यमी उत्पादन दोबारा शुरू कर रहे हैं, लेकिन वे भी अगले 15 दिनों तक बाजार और वैश्विक रुख को करीब से देखने के बाद ही कोई बड़ा फैसला लेंगे.
गैस सप्लाई पूरी तरह सुधरने में लगेगा लंबा वक्त
होर्मुज जलडमरूमध्य से नाकाबंदी हटने के बावजूद, एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईंधन सप्लाई को युद्ध से पहले की स्थिति में आने में कम से कम दो से तीन महीने का समय लगेगा. कतर, सऊदी अरब, ईरान और इराक जैसे देशों में तेल और गैस के उत्पादन को सामान्य स्तर पर लाने में वक्त लगेगा.
विशेषज्ञों का कहना है कि फारस की खाड़ी में फंसे सैकड़ों तेल टैंकरों को सुरक्षित निकालने, रिफाइनिंग प्रक्रिया पूरी करने और उसे उपभोक्ता तक पहुंचाने में महीनों लगेंगे. इसके अलावा, कतर जैसे देशों में एलएनजी उत्पादन केंद्रों को जो नुकसान पहुंचा है, उसकी भरपाई करने और खत्म हो चुकी वैश्विक इन्वेंट्री को दोबारा बनाने में कुछ साल भी लग सकते हैं.
राहत की बात यह है कि भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय ने खाड़ी देशों पर निर्भरता कम करते हुए 13 अन्य देशों से गैस आयात का वैकल्पिक रास्ता निकाल लिया है, जिससे घरेलू बाजार में गैस का पर्याप्त बैकअप तैयार हो रहा है.
घर बनाने वाले खरीदारों को क्या करना चाहिए
यदि आप अपने घर के लिए टाइल्स खरीदने की सोच रहे हैं, तो आपको थोड़ा व्यावहारिक रुख अपनाना होगा. युद्धविराम होने से कीमतों में और अधिक बढ़ोतरी होने का रास्ता तो रुक गया है, लेकिन दाम रातोंरात पुराने स्तर पर नहीं लौटेंगे.
सप्लाई चेन को पूरी तरह बहाल होने और रिफाइनिंग की धीमी प्रक्रिया से उबरने में कम से कम 2 महीने लगेंगे. बाजार में जब नया स्टॉक पर्याप्त मात्रा में पहुंचेगा, तभी डीलर स्तर पर कीमतों में नरमी आएगी. आर्थिक जानकारों के अनुसार, अगर आपके पास समय है, तो टाइल्स की थोक खरीदारी के लिए 2 से 3 महीने का इंतजार करना समझदारी भरा फैसला हो सकता है.



