BusinessIndia

​₹21 का शेयर 16 महीने में ₹488 पर पहुंचा, महिला की कमाई पर IT विभाग का सवाल, लगा ₹95 लाख का टैक्स

मुंबई की एक निवेशक ने नवंबर 2012 में 4.41 लाख रुपए के शेयर खरीदे. लगभग 16 महीने बाद, उन्होंने अपनी होल्डिंग का एक बड़ा हिस्सा 92 लाख रुपए से अधिक में बेच दिया. इस निवेश से बहुत बड़ा रिटर्न मिला. निवेशक ने दावा किया कि यह मुनाफा ‘लॉन्गटर्म कैपिटल गेन’ है और उस समय लागू नियमों के तहत इस पर कोई टैक्स नहीं लगता. लेकिन आयकर विभाग ने इस दावे को नहीं माना.

​₹21 का शेयर 16 महीने में ₹488 पर पहुंचा, महिला की कमाई पर IT विभाग का सवाल, लगा ₹95 लाख का टैक्स

विभाग को संदेह था कि ये शेयर ‘पेनी स्टॉक’ से जुड़ी उस व्यवस्था का हिस्सा थे, जिसका इस्तेमाल आर्टिफिशियल रूप से टैक्सफ्री कैपिटल गेन बनाने के लिए किया जाता है. विभाग ने 92.03 लाख रुपए की पूरी बिक्री राशि को ‘अनएक्सप्लेंड कैश क्रेडिट’ माना और इसमें कमीशन के भुगतान का अनुमान भी जोड़ दिया. निवेशक ने इन अतिरिक्त जोड़ को चुनौती दी. उन्होंने तर्क दिया कि ये लेनदेन असली थे, जिसके समर्थन में बैंक स्टेटमेंट, डीमैट रिकॉर्ड और स्टॉक एक्सचेंज के कॉन्ट्रैक्ट नोट मौजूद थे.

अब, आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण , मुंबई ने उनकी अपील खारिज कर दी है और विभाग द्वारा किए गए इन अतिरिक्त जोड़ को बरकरार रखा है. यह मामला बताता है कि क्यों आयकर विभाग शेयरों से मिलने वाले असामान्य रूप से हाई रिटर्न पर सवाल उठा सकता है, भले ही ये लेनदेन स्टॉक एक्सचेंज के जरिए हुए हों और पैसा बैंकिंग चैनलों से आया हो.

4.4 लाख रुपए का निवेश कैसे 92 लाख रुपए में बदल गया

यह मामला संध्या राकेश शर्मा और असेसमेंट ईयर 201415 से जुड़ा है. ट्रिब्यूनल के आदेश के अनुसार, शर्मा ने 19 नवंबर 2012 को ‘संतोषीमा ट्रेडलिंक्स लिमिटेड’ के 21,000 शेयर खरीदे. ये शेयर ‘सिल्वरआइस मल्टी ट्रेडिंग प्राइवेट लिमिटेड’ से 21 रुपए प्रति शेयर के भाव पर, ऑफमार्केट खरीदे गए थे. कुल निवेश 4,41,000 रुपए का था.

बाद में, कॉर्पोरेट पुनर्गठन के बाद इस कंपनी का नाम बदलकर ‘सनराइज एशियन लिमिटेड’ हो गया. शर्मा ने 25 नवंबर 2013 से 12 मार्च 2014 के बीच बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज पर 14 लेनदेन के जरिए 18,850 शेयर बेचे. ये शेयर एक रजिस्टर्ड ब्रोकर के माध्यम से बेचे गए थे. बिक्री की औसत कीमत लगभग 488.50 रुपए प्रति शेयर थी. कुल बिक्री मूल्य 92,03,421 रुपए रहा.

शर्मा ने 88,07,571 रुपए का लॉन्गटर्म कैपिटल गेन घोषित किया और आयकर अधिनियम की धारा 10 के तहत इस राशि को टैक्सफ्री बताया. यह धारा उस संबंधित निर्धारण वर्ष के दौरान लिस्टेड इक्विटी शेयरों से होने वाले पात्र लॉन्गटर्म कैपिटल गेन पर लागू होती थी. आयकर विभाग ने इस बात पर सवाल उठाया कि इतने कम समय में शेयरों की कीमत में इतनी भारी बढ़ोतरी कैसे हो गई.

आयकर विभाग को पेनी स्टॉक में हेरफेर का संदेह क्यों हुआ?

कोलकाता में आयकर विभाग के इन्वेस्टिगेशन विंग से जानकारी मिलने के बाद, इस मामले की फिर से जांच शुरू की गई. जांच में ‘सनराइज एशियन लिमिटेड’ नाम की एक पेनी स्टॉक कंपनी का पता चला. आरोप है कि ऑपरेटरों ने इस कंपनी का इस्तेमाल फर्जी लॉन्गटर्म कैपिटल गेन और शॉर्टटर्म कैपिटल लॉस दिखाने के लिए किया था. विभाग ने कंपनी के शेयर की कीमत, ट्रेडिंग वॉल्यूम और वित्तीय स्थिति की जांच की.

ट्रिब्यूनल के सामने रखे गए असेसमेंट ऑर्डर के अनुसार, जांच की अवधि के दौरान कंपनी के शेयर की कीमत लगभग 50 रुपए से बढ़कर 615 रुपए से अधिक हो गई थी. कीमत में यह उछाल कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन, संपत्ति या बिजनेस फंडामेंटल में किसी सुधार के कारण नहीं था. विभाग ने यह भी पाया कि इन शेयरों में ट्रेडिंग बहुत कम थी. ज्यादातर ट्रेडिंग दिनों में, केवल 50 से 100 शेयरों का ही लेनदेन हुआ. ऑर्डर में बताया गया है कि अक्सर एक दिन में केवल एक या दो ट्रेड ही होते थे. शेयर की कीमत में बदलाव भी अक्सर लगभग 4.9 फीसदी से 4.99 फीसदी की सर्किट लिमिट के करीब रहता था.

असेसिंग ऑफिसर का मानना ​​था कि कीमत में यह उछाल बनावटी था और ये लेनदेन इस तरह से किए गए थे ताकि निवेशक टैक्सफ्री कैपिटल गेन का दावा कर सकें. ऑर्डर में कहा गया है कि शेयर की कीमत में यह बदलाव बाजार के व्यापक रुझानों के अनुरूप नहीं था. जांच के दौरान, विभाग ने कथित ‘एंट्री ऑपरेटरों’ और अन्य लोगों के बयान भी दर्ज किए.

इन बयानों से पता चला कि कैसे कुछ कंपनियों और शेयरों का इस्तेमाल कथित तौर पर ‘अकोमोडेशन एंट्री’ देने के लिए किया गया था. आसान शब्दों में कहें तो, विभाग को संदेह था कि निवेशक कागजों पर बड़ा मुनाफा दिखा सकते हैं, और साथ ही अपने बेहिसाब पैसे को शेयर बेचने से मिली रकम के रूप में बैंकिंग सिस्टम में ला सकते हैं.

SEBI को सनराइज एशियन के बारे में क्या पता चला?

ट्रिब्यूनल ने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के निष्कर्षों पर भी विचार किया. SEBI ने कथित तौर पर शेयर की कीमतों में हेरफेर और ट्रेडिंग नियमों के उल्लंघन के लिए सनराइज एशियन लिमिटेड और उससे जुड़ी यूनिट्स की जांच की थी. ट्रिब्यूनल के आदेश के अनुसार, 2022 में SEBI ने कंपनी, पांच पूर्व निदेशकों और 80 जुड़ी यूनिट्स पर संयुक्त रूप से 1 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया था.

कंपनी और कुछ निदेशकों को एक साल के लिए प्रतिभूति बाजार से भी प्रतिबंधित कर दिया गया था. इस जांच में अक्टूबर 2012 से सितंबर 2015 के बीच की ट्रेडिंग गतिविधियों को शामिल किया गया था. शर्मा के शेयर लेनदेन इसी अवधि के दौरान हुए थे.

SEBI की जांच में पाया गया कि जुड़ी यूनिट्स ने कथित तौर पर आपस में ही ट्रेडिंग की और शेयरों की कीमतों को आर्टिफिशियल रूप से बढ़ाने में मदद की. जांच में ऐसी यूनिट्स की भी पहचान की गई, जिन्होंने बढ़ी हुई कीमतों पर शेयर बेचने के मामले में दूसरी तरफ काम किया था. ट्रिब्यूनल ने गौर किया कि जांच में कंपनी और उससे जुड़ी यूनिट्स द्वारा कीमतों में हेरफेर करने का एक पैटर्न सामने आया था. ये निष्कर्ष आयकर विभाग के मामले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए.

निवेशक का तर्क: शेयर सही प्रॉपर चैनल्स से खरीदे और बेचे गए थे

शर्मा ने तर्क दिया कि वह एक वास्तविक निवेशक हैं और कथित हेरफेर में उनकी कोई भूमिका नहीं थी. उन्होंने ट्रिब्यूनल को बताया कि शेयर बैंकिंग माध्यमों से खरीदे गए थे और इन लेनदेन के समर्थन में दस्तावेज भी मौजूद हैं.

उन्होंने ब्रोकर द्वारा जारी किए गए कॉन्ट्रैक्ट नोट, शेयरों की आवाजाही दिखाने वाले डीमैट स्टेटमेंट और बिक्री से प्राप्त रकम को दर्शाने वाले बैंक स्टेटमेंट पेश किए. उनका तर्क था कि ये लेनदेन स्टॉक एक्सचेंज पर एक रजिस्टर्ड ब्रोकर के माध्यम से हुए थे. उन्होंने यह भी बताया कि SEBI की जांच में उनका नाम नहीं था और उनके लेनदेन में शामिल ब्रोकर इस कथित घोटाले का हिस्सा नहीं थे.

निवेशक ने आगे तर्क दिया कि आयकर विभाग ने तीसरे पक्षों के बयानों पर भरोसा किया, जबकि ये बयान उन्हें नहीं दिखाए गए थे. उन्होंने कहा कि उन्हें उन लोगों से जिरह करने का मौका नहीं दिया गया.

ट्रिब्यूनल के आदेश में उनके इस तर्क का भी जिक्र है कि सहायक दस्तावेज मौजूद होने के बावजूद, विभाग ने शेयरों की बिक्री से मिली रकम को ‘अस्पष्ट नकद क्रेडिट’ मान लिया था.

ट्रिब्यूनल ने निवेशक के स्पष्टीकरण को क्यों खारिज कर दिया?

ITAT मुंबई ने दस्तावेजों और उससे जुड़ी परिस्थितियों की जांच की. उसने देखा कि कॉन्ट्रैक्ट नोट्स, डीमैट स्टेटमेंट और बैंक स्टेटमेंट से पता चलता है कि लेनदेन किस तरह से किए गए थे. लेकिन ट्रिब्यूनल ने माना कि केवल इन दस्तावेजों से यह साबित नहीं होता कि असल लेनदेन वास्तविक थे. आदेश में बताया गया है कि निवेशक ने 4.41 लाख रुपए में 21,000 शेयर फिजिकल रूप में खरीदे थे. बाद में, उसने BSE के जरिए 14 लेनदेन में 18,850 शेयर बेच दिए.

ट्रिब्यूनल ने कीमतों में असामान्य उछाल, कंपनी की कमजोर वित्तीय स्थिति, कम ट्रेडिंग वॉल्यूम और SEBI की जांच के नतीजों पर भी गौर किया. उसने पाया कि इन बातों से ‘कैपिटल गेन्स’ के दावे की वास्तविकता पर गंभीर संदेह पैदा होता है. ट्रिब्यूनल ने यह भी ध्यान दिया कि असेसिंग ऑफिसर ने शर्मा को व्यक्तिगत रूप से पेश होने और वेरिफिकेशन के लिए समन भेजा था. आदेश के अनुसार, वह समन मिलने के बाद भी पेश नहीं हुईं. उनके अधिकृत प्रतिनिधि के जरिए लिखित जवाब दाखिल किए गए, लेकिन विभाग का कहना था कि जरूरी स्पष्टीकरण और पुष्टि नहीं दी गई.

असेसिंग ऑफिसर ने ‘एग्जिट प्रोवाइडर्स’ को भी नोटिस भेजे थे. इन नोटिसों का कोई जवाब नहीं मिला. ट्रिब्यूनल ने जांच सामग्री के साथसाथ इन परिस्थितियों पर भी विचार किया. ट्रिब्यूनल इस नतीजे पर पहुंचा कि निवेशक विभाग के निष्कर्षों का उचित तरीके से खंडन नहीं कर पाईं. ट्रिब्यूनल ने इस निष्कर्ष को बरकरार रखा कि दावा किया गया ‘कैपिटल गेन्स’ वास्तविक नहीं था और ये लेनदेन केवल ‘अकोमोडेशन एंट्री’ थे.

आयकर विभाग ने क्या अतिरिक्त राशियां जोड़ीं?

डिटेलअमाउंट
बिक्री से प्राप्त रकम को धारा 68 के तहत ‘अस्पष्ट कैश क्रेडिट’ माना गया92,03,421 रुपए
अनुमानित कमीशन को धारा 69C के तहत ‘अस्पष्ट खर्च’ माना गया2,76,103 रुपए
शेयरों में किया गया अस्पष्ट निवेश56 रुपए
कुल जोड़ी गई राशि94,79,580 रुपए

विभाग ने बिक्री से प्राप्त पूरी 92.03 लाख रुपये की रकम को धारा 68 के तहत ‘अस्पष्ट कैश क्रेडिट’ माना.इसके अलावा, विभाग ने बिक्री से प्राप्त रकम का 3% कमीशन होने का अनुमान लगाया, जो 2.76 लाख रुपए बनता है. विभाग का तर्क था कि इस तरह की ‘अकोमोडेशन एंट्री’ कराने के लिए एंट्री प्रोवाइडर कमीशन लेते हैं. शर्मा ने ऐसा कोई भी कमीशन देने से इनकार किया.

ट्रिब्यूनल ने विभाग के इस निष्कर्ष को सही माना कि मुख्य लेनदेन असली नहीं था, और जोड़ी गई इन राशियों को बरकरार रखा. 56 रुपए की राशि ‘एस्सार इंडिया लिमिटेड’ के दो शेयरों से जुड़ी थी. असेसिंग ऑफिसर ने इस कंपनी के शेयर की कीमत में आए उतारचढ़ाव पर भी सवाल उठाए थे और इस निवेश को ‘अस्पष्ट’ माना था.

बैंक स्टेटमेंट और डीमैट रिकॉर्ड पर्याप्त क्यों नहीं थे?

यह मामला दिखाता है कि पैसे और शेयरों के लेनदेन को साबित करने वाले दस्तावेज हमेशा टैक्स विवाद को सुलझाने के लिए काफी नहीं होते. हो सकता है कि किसी निवेशक के बैंक स्टेटमेंट में बिक्री से प्राप्त रकम दिख रही हो, और डीमैट अकाउंट में भी यह दिख रहा हो कि शेयर स्टॉक एक्सचेंज पर बेचे गए थे. लेकिन फिर भी, आयकर विभाग यह जांच कर सकता है कि क्या ये लेनदेन वास्तव में असली थे या नहीं.

इस मामले में, विभाग ने कंपनी की वित्तीय स्थिति, शेयर की कीमत में अचानक आई भारी तेजी, कम ट्रेडिंग वॉल्यूम और जांच के नतीजों पर सवाल उठाए. ट्रिब्यूनल ने इन सभी बातों पर एक साथ विचार किया. ट्रिब्यूनल ने इस तर्क को नहीं माना कि लेनदेन सिर्फ इसलिए असली थे क्योंकि वे एक ब्रोकर के जरिए किए गए थे और बिक्री से मिली रकम बैंकिंग सिस्टम के माध्यम से आई थी. ट्रिब्यूनल ने निवेशक के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित मौका नहीं दिया गया था.

ट्रिब्यूनल ने पाया कि असेसिंग ऑफिसर ने असेसमेंट के प्रोसेस के दौरान मौके दिए थे, लेकिन निवेशक ने समन का पूरी तरह पालन नहीं किया और न ही मांगी गई सभी स्पष्टीकरण पेश किए. इसलिए, ट्रिब्यूनल को इस अपील में कोई दम नहीं लगा.

निवेशकों के लिए इस फैसले का क्या मतलब है

इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि किसी छोटी कंपनी से ज्यादा रिटर्न पाने वाले हर निवेशक पर अतिरिक्त टैक्स लगाया जाएगा. अहम बात यह है कि क्या निवेश और बिक्री के लेनदेन असली हैं, और क्या निवेशक सबूतों के साथ इन्हें साबित कर सकता है. शेयर की कीमत में अचानक भारी उछाल आने पर जांच हो सकती है, खासकर तब जब कंपनी का वित्तीय प्रदर्शन इस तेजी को सही न ठहराता हो.

निवेशकों को शेयर की मूल खरीद, भुगतान, डीमैट ट्रांसफर, बिक्री और पैसे मिलने के रिकॉर्ड संभाल कर रखने चाहिए. साथ ही, जब आयकर विभाग की ओर से कोई नोटिस मिले या जानकारी मांगी जाए, तो उसका जवाब देना चाहिए और जरूरी स्पष्टीकरण देना चाहिए. अगर विभाग जांच में मिले सबूतों या किसी तीसरे पक्ष के बयानों के आधार पर कोई सवाल उठाता है, तो निवेशकों को उन आरोपों को ध्यान से देखना चाहिए और सही सबूतों के साथ अपना जवाब देना चाहिए.

जोटवानी एसोसिएट्स के पार्टनर दिनकर शर्मा ने एफई की रिपोर्ट में कहा कि निवेशकों को यह नहीं मान लेना चाहिए कि केवल बैंक स्टेटमेंट और कॉन्ट्रैक्ट नोट दिखा देने से टैक्स से जुड़े सवाल सुलझ जाएंगे. जब किसी लेनदेन पर सवाल उठाया जाता है, तो निवेशकों को उचित रिकॉर्ड के साथ अपने निवेश, कीमत में आए बदलाव और फंड के स्रोत के बारे में बताना होता है. नोटिस का समय पर जवाब देना और जरूरी दस्तावेज तैयार रखना बहुत जरूरी है.

यह फैसला असेसमेंट ईयर 201415 और उस दौरान लागू टैक्स नियमों से जुड़ा है. इसे एक सामान्य नियम के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए कि पेनी स्टॉक में किया गया हर निवेश या ज्यादा रिटर्न देने वाला हर शेयर का लेनदेन फर्जी ही होता है. शर्मा के मामले में, ट्रिब्यूनल ने पाया कि मौजूद सबूत ‘असली लॉन्गटर्म कैपिटल गेन’ के दावे का समर्थन नहीं करते हैं. ITAT मुंबई ने उनकी अपील खारिज कर दी और आयकर विभाग द्वारा लगाए गए अतिरिक्त टैक्स को सही ठहराया.

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply