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​बेतवा के तट पर अनोखा चमत्कार : पितृ पक्ष में मत्स्य रूप में आते हैं पूर्वज, कालपी के परासन गांव में उमड़ती है श्रद्धा

​बेतवा के तट पर अनोखा चमत्कार : पितृ पक्ष में मत्स्य रूप में आते हैं पूर्वज, कालपी के परासन गांव में उमड़ती है श्रद्धा

अमृत विचार ।   27 सितंबर  उत्तर प्रदेश में जालौन जिले की कालपी तहसील मुख्यालय से करीब 18 किलोमीटर दूर स्थित परासन गांव में पितृ पक्ष के दौरान बेतवा नदी के किनारे एक अनूठी धार्मिक परंपरा देखने को मिलती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यहां पितृ ऋण से मुक्ति और पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्रद्धालु नदी में मछलियों को आटे के पिंड खिलाते हैं। ग्रामीणों का विश्वास है कि पितृ पक्ष के दौरान पुरखे मत्स्य रूप में यहां आते हैं और श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित आहार ग्रहण करते हैं।

 वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. हरिमोहन पुरवार के अनुसार, परासन में मछलियों को भोजन कराने की परंपरा सदियों पुरानी बताई जाती है। उनके मुताबिक, स्थानीय धार्मिक मान्यता में इन मछलियों को पितरों के मत्स्य रूप से जोड़ा जाता है। इसी विश्वास के चलते पितृ पक्ष के दौरान भोर पहर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पराशर ऋषि की तपोस्थली के निकट बहने वाली बेतवा नदी के तट पर पहुंचते हैं और मछलियों को आटा खिलाकर अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, पितृ पक्ष शुरू होने के आसपास बेतवा नदी में बड़ी और विशालकाय मछलियां दिखाई देने लगती हैं। उनका दावा है कि पितृ पक्ष समाप्त होने के बाद ये मछलियां फिर दिखाई नहीं देतीं और अगले वर्ष पितृ पक्ष के आसपास दोबारा नजर आती हैं। इस दावे की वैज्ञानिक पुष्टि का उल्लेख स्थानीय स्तर पर नहीं मिलता, लेकिन यह घटना क्षेत्र की धार्मिक आस्था और लोकविश्वास का हिस्सा बनी हुई है। 

महर्षि पराशर धाम: पौराणिक मान्यताएं और स्थानीय परंपराएं

स्थानीय लोगों का कहना है कि नदी में आने वाली मछलियां मनुष्यों से भयभीत नहीं होतीं। श्रद्धालु पानी के किनारे पहुंचकर जब आटे के पिंड अर्पित करते हैं तो मछलियां उनके काफी करीब आकर उन्हें ग्रहण करती हैं। ग्रामीण इस व्यवहार को पितरों की उपस्थिति से जोड़कर देखते हैं। परासन को लेकर पौराणिक मान्यता है कि महर्षि पराशर ने कालपी के निकट बेतवा नदी के किनारे स्थित घने जंगलों में आश्रम बनाकर तपस्या की थी। इसी वजह से यह स्थान महर्षि पराशर की तपोस्थली के रूप में श्रद्धा का केंद्र माना जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, धार्मिक महत्व के कारण यहां वर्षभर श्रद्धालुओं का आनाजाना रहता है। धार्मिक ग्रंथों में उन्हें शक्ति मुनि का पुत्र, महर्षि वशिष्ठ का पौत्र और भगवान वेदव्यास का पिता बताया गया है। परासन और बेतवायमुना क्षेत्र को लेकर एक अन्य पौराणिक मान्यता महर्षि पराशर और सत्यवती, जिन्हें मत्स्यगंधा के नाम से भी जाना जाता है, के प्रसंग से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार इसी क्षेत्र के आसपास दोनों की भेंट हुई थी और उनके मिलन से भगवान वेदव्यास का जन्म हुआ। हालांकि इन प्रसंगों को स्थानीय धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के रूप में ही देखा जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, परासन और आसपास का क्षेत्र पंचकोसीय धार्मिक क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है। 

यहां मार्कण्डेय, वाल्मीकि, च्यवन और वशिष्ठ जैसे ऋषियों से जुड़ी मान्यताएं भी प्रचलित हैं। ग्रामवासी मनीष, पुजारी प्रेम नारायण तिवारी, जगतनारायण तिवारी, मोहर सिंह दाऊ, राजा राम दाऊ, शिवशंकर सिंह, राधे पाठक, रज्जन सिंह, मनोज पाठक और शिवप्रसाद सिंह के अनुसार, मछलियों को आटा खिलाने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यह स्थान धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के बावजूद अपेक्षित संरक्षण और विकास से वंचित है। ग्रामीणों का मानना है कि यदि महर्षि पराशर धाम और बेतवा नदी तट का समुचित विकास किया जाए तो परासन धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है।

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