दिवाली का इतिहास केवल धार्मिकपौराणिक आख्यानों तक सीमित नहीं है. विदेशी यात्रियों के संस्मरणों, शिलालेखों और मुगलकालीन दस्तावेजों में भी इसका जिक्र हैं. अलबरूनी ने 11वीं सदी में देखा था दीपों का त्योहार. मुगल बादशाहों के किलों में जलते थे दिए. विजयनगर का साम्राज्य भी रहता था खुशियों में शामिल. हर अमीरगरीब का त्योहार है दिवाली. जुड़ी है इससे जुआ खेलने की सदियों पुरानी परंपरा. आतिशबाजी इसे और उल्लास देती है. दिवाली की रात सिर्फ अंधेरे पर रोशनी की जीत का त्योहार नहीं है. इसके साथ कई कहानियां जुड़ी हैं. मंदिरोंमहलों, घरबाजार और डगरडगर को दीपों से रोशन करने का इतिहास बहुत पुराना है.

अलगअलग दौर में दिवाली के त्यौहार में नई धार्मिक और सामाजिक मान्यताएं जुड़ती गईं. कहीं इसे भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी में मनाया गया. कहीं भगवान कृष्ण की नरकासुर पर विजय से जोड़ा गया. कहीं लक्ष्मी पूजा इसका प्रमुख आधार बनी तो कहीं राजा बलि की कथा प्रचलित हुई. जैन परंपरा में भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के रूप में दिवाली का विशेष महत्व है. जैन मान्यता के अनुसार महावीर ने कार्तिक अमावस्या को निर्वाण प्राप्त किया था.
सिख परंपरा में इसी दिन गुरु हरगोबिंद साहिब की ग्वालियर के किले से मुक्ति और अमृतसर वापसी की स्मृति में बंदी छोड़ दिवस मनाया जाता है. इस तरह एक ही त्योहार ने अलगअलग समुदायों की स्मृतियों में अपनी जगह बनाई. दिवाली के इतिहास को खंगालने पर एक बात साफ होती है कि इसका स्वरूप समय के साथ बदलता रहा. लेकिन दीप जलाने, मिलबैठने, उपहार देने और उत्सव मनाने की परंपरा निरंतर चलती रही.
जब अलबरूनी ने देखी ‘दीबाली’
डेढ़ हजार साल पहले. यह महमूद गजनवी के हमलों और लूट का दौर था. उसी दौरान मध्य एशिया से एक यात्री अबू रेहान अलबरूनी भारत के समाज, धर्म, विज्ञान और परंपराओं को समझने आया. लगभग 1030 ईस्वी में उसने अपनी चर्चित कृति ” किताबउलहिंद ” लिखी. किताब में भारत से जुड़ी तमाम बातों के साथ यहां त्योहारों का भी जिक्र किया. दिवाली को उसने ‘दीबाली’ नाम से दर्ज किया. उसके लिखे के मुताबिक कार्तिक अमावस्या को लोग स्नान करते, नए कपड़े पहनते और एकदूसरे को पान तथा सुपारी भेंट करते थे.
मंदिरों में जाते और दान देते थे. दिन में हंसीखुशी का माहौल रहता था. रात होते ही जगहजगह बड़ी संख्या में दीप जलाए जाते थे. अलबरूनी ने उस समय प्रचलित एक मान्यता भी दर्ज की. उसके अनुसार इस दिन लक्ष्मी, बलि को उसके बंधन से मुक्त करती हैं और उसे एक दिन के लिए संसार में आने की अनुमति देती हैं.
हर कोने दिवाली
दिवाली की जगमग सिर्फ उत्तर भारत तक सीमित नहीं थी. 15वीं सदी में दक्षिण भारत का विजयनगर साम्राज्य अपनी संपन्नता और वैभव के लिए मशहूर था. इटली का यात्री निकोलो कॉन्टी 1420 के आसपास विजयनगर पहुंचा था. उसने वहां के उत्सवों का वर्णन किया. उसके मुताबिक एक त्योहार पर मंदिरों के भीतर और छतों पर तेल के असंख्य दीप जलाए जाते थे. ये दीप रातदिन जलते रहते थे. पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पायस ने भी 16वीं सदी में विजयनगर का भ्रमण किया. बाद में इतिहासकार रॉबर्ट सेवेल ने अपनी पुस्तक A Forgotten Empire में इन यात्रियों के विवरणों को संकलित किया. सेवेल ने कॉन्टी के विवरण में वर्णित दीपोत्सव की पहचान दीपावली से की. इस तरह विजयनगर के मंदिरों और घरों में दीप जलाने की परंपरा का विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों में भी उल्लेख मिलता है.
मुगल बादशाहों को भी मोहा
मुगलकाल में दिवाली पर भरपूर रौनक रहती थी. आगरा का किला. लाल बलुआ पत्थर की विशाल दीवारें. ऊंचे बुर्ज और महल. दिवाली के मौके पर इन सबको दीपों से सजाया जाता था. आगरा में उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों और स्थानीय इतिहासकारों के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, अकबर के समय से शुरू हुआ यह आयोजन शाहजहां के शासनकाल तक चलता रहा. इसे ‘जश्नएचरागां’ कहा जाता था.
मुगलों के दौर की दिवाली.
किले की दीवारों पर जलते दीप दूरदूर से दिखाई देते थे. किले के सामने आतिशबाजी होती थी. गरीबों को कपड़े और दान दिया जाता था. अकबर के बारे में यह उल्लेख भी मिलता है कि वह इस अवसर पर पूजादरबार आयोजित करता था. गायों की पूजा के साथ कीमती उपहार लोगों को भेंट करता था. जहांगीर के शासनकाल में भी रोशनी का यह पर्व जारी रहा. उसके संस्मरण तुजुकएजहांगीरी में 1613 से 1623 के बीच दिवाली के अवसर पर मशालें जलाने का उल्लेख है. शाहजहां के बड़े बेटे दारा शिकोह की इस परंपरा में गहरी रुचि थी. वह दिवाली की रात हाथी पर सवार होकर शहर की रोशनी देखने निकलता था.
दिवाली पर जुआ क्यों जरूरी?
वो कैसी दिवाली जिसमें जुआ न खेला जाए! असलियत में दिवाली और जुए का रिश्ता बहुत पुराना है. इसका एक प्रमाण महाराष्ट्र के एलोरा की गुफाओं में भी मिलता है. आठवीं सदी के मंदिरों में शिव और पार्वती को पासे खेलते हुए उकेरा गया है. एक मूर्ति में शिव पार्वती से एक और बाजी खेलने का आग्रह करते दिखाई देते हैं. दूसरी तरफ पार्वती अपनी जीत का संकेत दे रही हैं. यानी उस दौर में शिवपार्वती के द्यूतक्रीड़ा प्रसंग इतने लोकप्रिय थे कि कलाकारों ने उन्हें पत्थरों पर भी उतार दिया.
वात्स्यायन के कामसूत्र में यक्षरात्रि का उल्लेख मिलता है. यक्षों का संबंध धन के देवता कुबेर से था. माना जाता है कि इस उत्सव में रातभर पासे खेले जाते थे. कुछ इतिहासकार इसे दीपावली से जुड़ी जुआ परंपरा का एक पुराना सूत्र मानते हैं. आठवीं सदी के आसपास रचित कश्मीर के नीलमत पुराण में दीपोत्सव से जुड़ी परंपराओं का उल्लेख मिलता है. इसमें घरों, मंदिरों, चौराहों और दुकानों पर दीप जलाने की बात कही गई है. लेकिन रोचक बात अगले दिन की है.
कहानियों में दिवाली में लोगों के जुआ खेलने, संगीत सुनने और दावत करने का भी जिक्र है. फोटो: AI Generated
इसमें लोगों के जुआ खेलने, संगीत सुनने और दावत करने का भी जिक्र है. यहां तक कि जुए में जीत को आने वाले साल के लिए शुभ माना गया है.दसवीं सदी के जैन आचार्य सोमदेव के ग्रंथ यशस्तिलक चंपू में भी दीपोत्सव का वर्णन है. इसमें महलों की छतों पर दीपों की कतारें, संगीत, उत्सव और जुए में व्यस्त महिलाओं का जिक्र मिलता है. यानी जुआ खेलने का संबंध दिवाली से बहुत पुराना है. यह केवल आज के ताश के पत्तों तक सीमित नहीं था. पुराने समय में पासों से भी खेल खेले जाते थे. लोकमान्यता है कि दिवाली की रात जुआ खेलने से साल भर सौभाग्य बना रहता है.
बिना आतिशबाजी कैसी दिवाली!
दिवाली का जिक्र हो और आतिशबाजी की बात न आए, ऐसा कैसे हो सकता है! दीपों के इस त्योहार में पटाखों ने भी धीरेधीरे अपनी अलग जगह बना ली. हालांकि प्राचीन भारतीय परंपराओं में दीप जलाने और उत्सव मनाने के प्रमाण तो मिलते हैं, लेकिन आज जैसी बारूद वाली आतिशबाजी का चलन बहुत बाद में आया. भारत में पटाखों और बारूद के इस्तेमाल का विस्तार मध्यकाल में हुआ.
मुगल दौर में शाही जश्न, शादियों और त्योहारों पर आतिशबाजी का प्रदर्शन होने लगा. रोशनी के फव्वारे, आसमान में छूटती आग की लपटें और रंगबिरंगी चिंगारियां लोगों के लिए कौतूहल का विषय थीं. धीरेधीरे यह शाही शौक आम लोगों के त्योहारों तक पहुंच गया. दिवाली की रात मिट्टी के दीयों के साथ पटाखों की आवाज और आसमान में बिखरती रोशनी भी उत्सव का हिस्सा बन गई. हालांकि आज आतिशबाजी का यह आकर्षण प्रदूषण और पर्यावरण को लेकर बहस के घेरे में है.
आतिशबाजी.
खासकर दिल्लीएनसीआर में पटाखों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के कई आदेश चर्चा में रहे हैं. अदालत ने आतिशबाजी पर पूरी तरह एक जैसा प्रतिबंध लगाने के बजाय प्रदूषण की स्थिति को देखते हुए उसके इस्तेमाल पर समय, स्थान और पटाखों की प्रकृति से जुड़ी शर्तें लगाई हैं.
सुप्रीम अदालत ने 29 अक्टूबर 2026 के ताजा आदेश में दिल्लीएनसीआर में 7 और 8 नवंबर को केवल प्रमाणित ग्रीन पटाखे चलाने की अस्थायी अनुमति दी है. इसके लिए सुबह 6 से 7 बजे और रात 8 से 10 बजे का समय तय किया गया है. अस्पतालों, नर्सिंग होम, वृद्धाश्रम और शैक्षणिक संस्थानों के 300 मीटर के दायरे में आतिशबाजी पर रोक के भी आदेश हैं. लड़ियों और बेरियम वाले पटाखों की भी मनाही है. 9 नवंबर से फिर पूर्ण प्रतिबंध लागू होगा.



