देश में चावल की सैकड़ों किस्में उगाई जाती हैं, लेकिन जब बात काले चावल की आती है तो चकहाओ का जिक्र होता है. यह काला चावल है जो मणिपुर में पैदा होता है. स्थानीय स्तर पर इसे ब्लैक एरोमैटिक राइस भी कहते हैं. पूर्वोत्तर का मणिपुर काले चावल का गढ़ कहलाता है. चकहाओ की पहचान किसी एक जिले से नहीं, बल्कि पूरे मणिपुर से जुड़ी है. इसका GI रिकॉर्ड भी राज्य स्तर पर दर्ज है.

भौगोलिक क्षेत्र के तौर पर मणिपुर के साथ नागालैंड में भी इसकी पैदावार होती है, लेकिन सही मायने में मणिपुर को इसका गढ़ कहा जाता है.अब सवाल है कि इस चावल का रंग काला क्यों है, यह पूर्वोत्तर में सबसे ज्यादा क्यों उगता है और यह कितना खास है?
चावल का रंग काला क्यों है?
चकहाओ का गहरा रंग इसके प्राकृतिक पिगमेंट एंथोसायनिन के कारण होता है. एंथोसायनिन वो पिंगमेंट है जो कई तरह के पौधों में पाया जाता है और इसे लाल, बैंगनी और नीला रंग देता है. यही पिगमेंट चावल की रंगत को गहरा बनाता है.
मणिपुर में उगने वाले ब्लैक राइस को स्थानीय भाषा में चकहाओ कहते हैं.
त्योहारों और खास मौकों का चावल
मणिपुर में चकहाओ का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से खास मौकों और त्योहारों के व्यंजनों में होता आया है. यह रोज के खाने से ज्यादा उत्सव की थाली का हिस्सा माना जाता है. इसकी खुशबू और रंग इसे आम चावल से बिल्कुल अलग और खास बनाते हैं
चकहाओ को GI का टैग का दर्जा मिल चुका है. GI टैग का मतलब इसके नाम और पहचान पर इसके उत्पादक क्षेत्र का हक माना जाता है. इससे नकली या दूसरी जगह के चावल को चकहाओ बताकर बेचना मुश्किल होता है और किसानों को उनकी मेहनत की पहचान मिलती है.
क्यों खास है यह चावल?
चकहाओ सिर्फ एक अनाज नहीं, मणिपुर की खेती, संस्कृति और खानपान की पहचान है. GI टैग के बाद इसे देश और दुनिया के बाजार में अलग ब्रांड के रूप में पेश करना आसान हुआ है. पूर्वोत्तर के किसानों के लिए यह अपने इलाके की खास उपज को बेहतर दाम दिलाने का एक जरिया भी बन सकता है.
चकहाओ से कई तरह की डिशेज बनाई जाती है.
कितने देश इसके खरीदार?
कई रिपोर्ट्स में दावा किया जाता है कि दुनिया के 80 से अधिक देश भारत के काले चावल के खरीदार हैं. इसमें अमेरिका सबसे बड़ा खरीदार है. इसके अलावा ब्रिटेन, यूरोप, मिडिल ईस्ट के संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब समेत सिंगापुर, मलेशिया, साउथ कोरिया, नॉर्थ अमेरिका और कई अफ्रीकी देशों तक सप्लाई की जाती है.
मणिपुर में काला चावल क्यों उगाया जाता है?
काला चावल मणिपुर का पारंपरिक अनाज है और मैतेई समुदाय की सामाजिकसांस्कृतिक रीतियों में इसकी अहम भूमिका है. ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि राजाओं के दरबार में इसे भोजों और धार्मिक अनुष्ठानों में परोसा जाता था. इसकी पहचान सुगंध और चिपचिपेपन का मेल है, जो दुनिया के दूसरे काले चावलों में आमतौर पर नहीं होता. इसका रंग एंथोसायनिन नाम के पिगमेंट से आता है.
रज्य के बागवानी विभाग ने ऑर्गेनिक वैल्यू चेन मिशन के तहत चार घाटी वाले जिलों में 2000 हेक्टेयर में चकहाओ की खेती करवाई. खेती मुख्यतः बिष्णुपुर, थौबल और इंफाल जिलों में होती है. ऐसा नहीं है कि यह मणिपुर के बाहर पैदा नहीं होता, लेकिन मणिपुर की जो वैरायटी है वो कई मायनों में खास होती है. यही वजह है कि यहां के चावल को ज्यादा पसंद किया गया. मणिपुर में इसकी पैदावार भी ज्यादा होती है.



